Haryana Election: BSP-चंद्रशेखर ने दलित वोटों का बदला समीकरण, कांग्रेस या बीजेपी में किसे ज्यादा नुकसान?

Haryana Chunav: हरियाणा विधानसभा चुनावों में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी बीजेपी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के बीच ही है। लेकिन, इस बार यहां दलितों और जाट वोट बैंक पर आधारित दो और गठबंधन भी बने हैं, जिनमें खुद सरकारें बनाने का माद्दा भले ही न हो, लेकिन ये कांग्रेस और बीजेपी में से किसी की भी लुटिया डुबोने का दम जरूर रखते हैं।

हरियाणा विधानसभा चुनाव में इस बार मायावती की बीएसपी और अभय चौटाला की इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) ने गठबंधन किया है। दूसरा गठबंधन पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (JJP) और यूपी की नगीना सीट से लोकसभा सांसद चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी का है।

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जाट-दलित वोटरों की उम्मीद में बने दो गठबंधन
इनमें से आईएनएलडी और जेजेपी के मुख्य आधार वोटर जाट बिरादरी के लोग हैं, जिनकी आबादी हरियाणा में करीब 27% बताई जाती है। वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में दलित या अनुसूचित जाति (SC) की आबादी 20% से ज्यादा है, जिनके लिए राज्य की 90 में से 17 सीटें रिजर्व हैं।

आईएनएलडी और बीएसपी के बीच हुए सीटों के तालमेल के अनुसार अभय चौटाला की पार्टी 53 सीटों पर और मायावती की पार्टी 37 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जिनमें सभी आरक्षित सीटें भी शामिल हैं। वहीं, दुष्यंत चौटाला की पार्टी 70 विधानसभा सीटों पर और चंद्रशेखर की पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रही है।

कांग्रेस और बीजेपी की अपनी-अपनी उम्मीदें
लोकसभा चुनावों में बीजेपी से राज्य की 10 में से 5 संसदीय सीटें छीनने के बाद कांग्रेस को यकीन है कि वह उसी तरह से विधानसभा चुनावों में जाट, दलित और मुसलमान वोटरों का समीकरण बिठाकर 10 साल बाद हरियाणा की सत्ता फिर से हथिया लेगी। लेकिन, बीजेपी को दो वजहों से भरोसा है कि अबकी बार कांग्रेस की लोकसभा चुनाव जैसी दाल नहीं गल पाएगी।

भाजपा को लोकसभा चुनावों वाला समीकरण बदलने की आशा
बीजेपी को लगता है कि कांग्रेस सांसद और दलित नेता कुमारी शैलजा की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षी और इसको लेकर कांग्रेस के अंदर में होने वाली गुटबाजी का उसे फायदा मिलेगा। दूसरी तरफ वह यह मानकर भी चल रही है कि आईएनएलडी-बीएसपी और जेजेपी-आजाद समाज पार्टी गठबंधनों को जितने भी वोट मिलेंगे, वह कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिले फायदे को नुकसान में बदलने का काम करेंगे।

हरियाणा में मिर्चपुर कांड (2010 में जाटों पर वाल्मीकि (दलित) परिवारों के घरों को जलाने का आरोप) की वजह से दलित कभी जाटों के साथ वोट नहीं डालते थे। लेकिन, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से बीजेपी को लेकर 'संविधान बदलने' का जो दावा किया गया था, उसका उसे बहुत भारी लाभ मिला और करीब 68% दलित वोट उसकी ओर शिफ्ट हो गए। भाजपा को लगता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

कांग्रेस के लिए क्यों है चिंता की वजह?
तथ्य यह है कि हरियाणा में दलितों की जो 20% से ज्यादा आबादी है, उनमें आधे के करीब अकेले जाटव जाति के लोग हैं। मायावती और चंद्रशेखर दोनों इसी जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। हरियाणा की 49 विधानसभा सीटों पर इनकी जनसंख्या 10% से ज्यादा है; और यह बात कांग्रेस के लिए चिंता की वजह हो सकती है।

2019 के विधानसभा चुनाव में इन 49 सीटों में से बीजेपी को 21, कांग्रेस को 15, जेजेपी को 8 और अन्य को 5 सीटें मिली थीं। लेकिन, अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षित 17 सीटों की बात करें तो कांग्रेस ने 7, बीजेपी ने 5, जेजेपी ने 4 और अन्य ने 1 सीट जीती थी।

लेकिन, दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर जीत के इन आंकड़ों में भी एक बड़ा पेच है। उन्हीं सीटों पर औसत वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी को 33%, कांग्रेस को 30%, आईएनएलडी 1%, जेजेपी को 22%, बीएसपी को 3% और अन्य को 11% वोट मिले थे।

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