हरियाणा में फेल हुए 'बेटी बचाओ' अभियान? बेटे की चाहत में 5 बच्चियों की मां ने ले ली खुद की जान

Haryana Women Dead by Suicide: हरियाणा में बेटियों के जन्म को लेकर मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव की एक भयावह तस्वीर सामने आई है। राज्य में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जहां महिलाओं को बेटा न होने की वजह से गहरी चिंता और अवसाद का सामना करना पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाओं के माध्यम से लड़कियों के प्रति समाज के नजरिए को बदलने का प्रयास किया है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी कुछ और ही बयां कर रही है।

हरियाणा के रायपुर गांव में 14 फरवरी को किरण (33) ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। किरण पांच बेटियों की मां थी, जिनमें सबसे छोटी अंश महज 13 महीने की थी। परिवार का कहना है कि उस पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि उसे बेटे की चाहत को लेकर चिंता थी।

Haryana Woman

नीलम ने दो बेटियों संग नहर में कूदकर दी जान

साहू गांव की नीलम (30) ने 23 जनवरी को अपनी दो नाबालिग बेटियों के साथ सानियाना गांव के पास एक नहर में छलांग लगा दी। बताया जा रहा है कि वह भी बेटे न होने के कारण परेशान थी। नीलम की चार बेटियां थीं।
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दो नवजात बच्चियों के शव मिले

बेटियों के प्रति समाज में फैली नकारात्मक सोच का एक और उदाहरण 17 फरवरी को सामने आया जब भिवानी जिले के जमालपुर गांव की एक सड़क पर नवजात बच्ची का शव मिला। इसी तरह, एक सप्ताह पहले जींद जिले के नरवाना कस्बे की नहर में भी एक नवजात बच्ची का शव पाया गया था।

परिवार ने किया भेदभाव से इनकार

किरण के पति, धर्म सिंह (40), जो हिसार के ऑटो मार्केट में मैकेनिक हैं, ने कहा कि उनकी पत्नी ने कभी बेटियों को लेकर असंतोष जाहिर नहीं किया। हालांकि, परिवार के एक अन्य सदस्य ने स्वीकार किया कि बेटा न होने की चिंता किरण को परेशान कर सकती थी, भले ही उन पर सामाजिक दबाव न रहा हो।

धर्म सिंह का कहना है कि उन्होंने अपनी चार बेटियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना और एलआईसी कन्यादान पॉलिसी जैसी वित्तीय योजनाओं में निवेश किया है। उनकी सबसे बड़ी बेटी अदिति आठवीं कक्षा में पढ़ती है, जबकि दूसरी बेटी अक्षी (8) दूसरी कक्षा में, अमन (6) नर्सरी में, जबकि वर्षा (4) और अंश (13 महीने) अभी पढ़ाई शुरू नहीं कर पाई हैं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना की विफलता?

हरियाणा में इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि समाज में अभी भी बेटियों को लेकर नकारात्मक सोच बनी हुई है। यह स्थिति तब है जब करीब दस साल पहले पानीपत से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' (BBBP) योजना की शुरुआत की गई थी। यह योजना लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव को खत्म करने और लिंगानुपात सुधारने के लिए बनाई गई थी, लेकिन ये घटनाएं दिखाती हैं कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

हरियाणा के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात (SRB) में अब तक कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है। 2017 में यह अनुपात 914 लड़कियों प्रति 1,000 लड़कों का था। उसके बाद वर्षों में यह थोड़ा बहुत बदला - 914 (2018), 923 (2019), 922 (2020), 914 (2021), 913 (2022) और 914 (2023) लेकिन 2024 के अंत तक यह गिरकर 910 हो गया।

सामाजिक और आर्थिक दबाव सबसे बड़ी समस्या

महिला अधिकार कार्यकर्ता जगमती सांगवान का कहना है कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों को आर्थिक तंगी और सामाजिक रूढ़ियों का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, "कोई नहीं समझ सकता कि पांच बेटियों को पालने वाली महिला पर समाज का कितना दबाव होता है। सरकारी योजनाएं होने के बावजूद डिजिटलाइजेशन की वजह से कई लोग इन तक पहुंच नहीं बना पाते हैं।"

उन्होंने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वह बेटियों वाले परिवारों में विश्वास पैदा करने में असफल रही है, जिससे ऐसे परिवारों में भय और असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
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