Gujarat Elections 2022: क्या मोरबी हादसे के बाद नरेन्द्र मोदी चुनावी ‘ब्रांड वैल्यू’ महफूज रख पाएंगे ?
Gujarat Elections 2022: गुजरात विधानसभा चुनाव मोरबी पुल हादसे की पीड़ा के बीच होगा। इतनी बड़ी त्रासदी के राजनीतिक असर से इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इस हादसे को चुनावी मुद्दा बनाने वाली है। पुल हादसे को भ्रष्टाचार से जोड़ कर उसने राजनीतिक अभियान की योजना बनायी है। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल की चुनौती पहले से ज्यादा बढ़ गयी है। मोरबी पुल हादसे ने भाजपा की चुनावी रणनीति को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

ये सही है कि गुजरात में भाजपा की सत्ता के करीब 27 साल होने वाले हैं। लेकिन 2022 में उसे विकट परिस्थतियों में चुनाव लड़ना पड़ेगा। इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गयी है। क्या इस हादसे के बाद भी उनके प्रति जनसमर्थन बना रहेगा ? इस सवाल के जवाब से ही उनके राजनीतिक भविष्य का फैसला होने वाला है। यानी 2022 पर ही 2024 का भविष्य निर्भर है।

पुरानी कामयाबी कितने काम की ?
गुजरात में भाजपा एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित है। 1998 में 117 सीटें जीती थीं। तब से वह लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। चुनावी राजनीति में भाजपा की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। गुजरात विधानसभा में कुल 182 सीटें हैं। बहुमत के लिए 92 सीटें चाहिए। 2002 में भाजपा ने 127 सीटें जीती थीं। इसके बाद उसे तीन बार और बहुमत मिला लेकिन वह फिर कभी 127 का अंकड़ा नहीं छू सकी। उसकी सदस्य संख्या इससे नीचे ही रही। 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल 99 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन जोड़तोड़ की राजनीति से भाजपा मजबूत होती चली गयी। अब उसके 111 विधायक हैं। कांग्रेस के 77 विधायक थे जो अब घट कर 63 रह गये हैं। भाजपा कैसे मजबूत होती गयी ? 2002 का दंगा गुजरात की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था। इसके बाद भाजपा यहां महाशक्ति के रूप में स्थापित हुई। 2022 का मोरबी पुल हादसा भी गुजरात चुनाव के लिए एक नया मोड़ साबित हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो गुजरात की राजनीति एक बार फिर बदल सकती है।

नरेन्द्र मोदी के लिए विपरित परिस्थितियां
गुजरात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गृह राज्य है। इसलिए यहां की राजनीति का राष्ट्रीय महत्व है। अगर गुजरात में मोदी की साख पर आंच आएगी तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना लाजिमी है। मोरबी पुल हादसे के लिए सरकारी तंत्र की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार और भ्रष्टाचारियों के समझौते के कारण 141 लोगों की जान चली गयी। सरकारी अफसरों और ठेकेदारों के बीच भ्रष्टाचार के सबूत हैं। अब हम गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार को जनता के बीच ले जाएंगे। हम आम जनता को बताएंगे कि कैसे राज्य सरकार ने अपने चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए आम लोगों की जान की कीमत लगा दी। इन आरोपों के कारण भूपेन्द्र पटेल सरकार कठघरे मे खड़ा हो गयी है। सच क्या है ये तो जांच के बाद पता चलेगा लेकिन इस भयंकर हादसे से राज्य सरकार की छवि प्रभावित हुई है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी के लिए अपने गृहराज्य में भाजपा का चुनावी प्रबंधन आसान नहीं होगा।

जितने कड़वे बोल मोदी उतने मजबूत
भाजपा के सामने एक नया संकट जरूर दिख रहा है लेकिन कांग्रेस को एक बात का ध्यान रखना होगा। नरेन्द्र मोदी की अतिशय आलोचना कांग्रेस के लिए भारी पड़ जाती है। बिना तथ्यों के अगर कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी पर निजी हमले किये तो इससे उसे नुकसान हो सकता है। गुजरात के बहुसंख्यक लोग मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से उनकी संस्कृति को राष्ट्रीय सम्मान मिला है। गुजराती समुदाय की यह भावना ही नरेन्द्र मोदी की ताकत का आधार है। जब वे 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तब वे एक सामान्य नेता थे। भाजपा ने उन्हें कामचलाऊ व्यवस्था के तहत मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन 2002 के दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी को अपार जनसमर्थन मिला। वे एक सामान्य नेता से शक्तिशाली नेता के रूप में बदल गये। कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी पर गुजरात दंगों को लेकर कई गंभीर आरोप लगाये। कांग्रेस नरेन्द्र मोदी के लिए जितने कड़वे बोल बोलती, जनता में उनकी लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती जाती। कांग्रेस के रोज-रोज की राजनीतिक निंदा से ऊब कर एक बार नरेन्द्र मोदी ने कहा था, अगर में दंगों का दोषी हूं तो मुझे फांसी पर लटका दो। इस साहसिक बयान ने उन्हें गुजरात की राजनीति का बरगद बना दिया।

2022 पर निर्भर है 2024 का भविष्य
मोरबी पुल हादसे के लिए कांग्रेस राज्य सरकार को घेर सकती है लेकिन नरेन्द्र मोदी पर निजी टिपण्णी से समीकरण बदल सकते हैं। कोई भी दल अगर गुजरात में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करता है तो एक तरह से वह भाजपा की मदद ही करता है। इस गलती को कांग्रेस ने बार-बार दोहरा कर गुजरात में भाजपा को अजेय बना दिया दिया। जहां तक 2022 के चुनाव की बात है तो नरेन्द्र मोदी विपरित परिस्थितियों में चुनाव लड़ने के अभ्यस्त रहे हैं। 2017 में बनासकांठा में भयंकर बाढ़ आयी थी। इसकी वजह से चुनाव की घोषणा में कुछ देर हुई थी। उस समय भी भाजपा सरकार पर बाढ़ रहत में विफल रहने का आरोप लगा था। लेकिन चुनाव में सरकार बनाने लायक बहुमत मिल गया था। वैसे गुजरात में 2022 का चुनाव भाजपा के लिए बहुत अहम है। इसकी कामयाबी पर ही उसके मिशन 2024 का भविष्य निर्भर है।
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