Gujarat Election 2022: सूरत के हीरा कारीगर किसके साथ ? निकाय चुनावों में AAP ने बदला था समीकरण
गुजरात विधानसभा चुनाव में सूरत के आसपास की कम से कम आधा दर्जन सीटों पर हार और जीत का फैसला करने में हीरा कारीगरों की भूमिका प्रभावी रहती है। हीरा कारीगरों का मूड क्या है, इसका सौराष्ट्र के भी कुछ सीटों पर थोड़ा-बहुत प्रभाव पड़ सकता है। पिछले साल सूरत नगर निगम के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 27 सीटों पर कब्जा करके वहां का समीकरण ही बदल दिया था। तब से अबतक में क्या बदलाव हुआ है? क्या आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनावों में भी वैसा ही उलटफेर कर सकती है? अभी वहां पर क्या संभावनाएं बनती दिख रही हैं ? आइए जमीन पर मौजूद लोगों के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं।

हीरा कारीगर करीब आधा दर्जन सीटों पर डाल सकते हैं प्रभाव
गुजरात चुनावों के सिलसिले में विशेषज्ञों ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा है कि सूरत के हीरा कारीगर कम से कम 6 विधानसभा चुनावों में हार या जीत तय करने में सक्षम हैं। वह जिसका साथ देंगे, चुनावी पलड़ा उसी के पक्ष में झुक सकता है। गुजरात में लगभग 15 लाख हीरा कारीगर हैं। इनमें से करीब 7 लाख सूरत में हीरा तराशने या उसपर पॉलिशिंग के काम में लगे हैं। बाकी हीरा कारीगर भावनगर, राजकोट, अमरेली, जूनागढ़ और थोड़े-बहुत राज्य के उत्तरी जिलों में चलने वाली हीरा कटिंग यूनिट में काम करते हैं। सूरत के हीरा कारीगरों के प्रतिनिधियों ने बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सभी से स्थानीय निकाय द्वारा उनसे वसूले जाने वाले करीब 200 रुपए के प्रोफेशनल टैक्स पर आपत्ति जतायी थी, लेकिन उनके समस्या का हल नहीं हुआ है। वे हीरा उद्योग में श्रम कानून लागू करने की भी मांग कर रहे हैं।

किसी भी दल के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं हीरा कारीगर
सूरत में कोई भी चुनाव हो तो हीरा कारीगरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2021 में सूरत नगर निगम चुनाव में कुल 120 सीटों में से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को जो 27 सीटें मिली थीं, उसमें हीरा कारीगरों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक राजनीतिक विश्लेषक दिलीप गोहिल ने बताया है कि सूरत के हीरा कारीगर जो रत्न कलाकार भी कहलाते हैं, उनके बीच एक साझा बात देखने को मिलती है। वे ज्यादातर सौराष्ट्र क्षेत्र से हैं और वह भी पाटीदार समाज से ताल्लुक रखते हैं। सौराष्ट्र के जो हीरा कारीगर सूरत में व्यवस्थित हो चुके हैं, वो अगर पाटीदार नहीं भी हैं तो भी उनके बीच अपना एक आपसी तालमेल देखा जा सकता है। गोहिल कहते हैं, 'वे एक-दूसरे को अच्छे से जानते हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। हीरा कारीगरों के लिए यह आसान है कि वह किसी एक खास राजनीतिक दल के पक्ष में गोलबंदी करें। डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग यूनिट के मालिक जो कि परंपरागत तौर पर बीजेपी को समर्थन देते रहे हैं, वे भी अपने कारीगरों पर प्रभाव डाल सकते हैं कि वे किसका समर्थन करें।'

आम आदमी पार्टी इन सीटों को सबसे सुरक्षित समझ रही है
वराछा रोड, कतारगाम, करंज, कामरेज और सूरत (उत्तर) विधानसभा सीटों पर हीरा कारोबार से जुड़े सौराष्ट्र के लोगों का प्रभाव रहता है। गोहिल के मुताबिक पिछले साल निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी जो 27 सीटों पर जीती थी, उसमें पाटीदार समाज और बड़ी संख्या में हीरा कारीगरों का समर्थन शामिल था। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी इन सीटों को अभी गुजरात में अपने लिए सबसे सुरक्षित सीटों में आंक रही है और इसलिए प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया को कतारगाम और महासचिव मनोज सोरथिया को करंज से टिकट दिया है। पाटीदार कोटा आंदोलन के प्रमुख नेता अल्पेश कथिरिया को वराछा रोड और सूरत के आम आदमी पार्टी चीफ महेंद्र नावादिया को सूरत (उत्तर) और पार्टी के एक और कार्यकर्ता राम धदुक को कामरेज से टिकट दिया है, जो 2017 में हार चुके हैं। 2017 में भाजपा ये सारी सीटें जीत गई थी। लेकिन, इस बार वह संभलकर चुनाव मैदान में उतरी है और कामरेज छोड़कर सभी सीटिंग विधायकों को टिकट दिया है। कामरेज में प्रफुल पनसेरिया को उतारा है।

बीजेपी ही मजबूत- हीरा कारोबारी
हीरा कारोबारी और जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के रीजनल चेयरमैन दिनेश नावादिया ने दावा किया है कि इन सीटों पर आम आदमी पार्टी की जीत की उतनी संभावना नहीं है, जितनी की दिख रही है। उन्होंने कहा, 'आम आदमी पार्टी की ओर से चुनाव में कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं दिख रही है। डायमंड यूनिट के मालिक बीजेपी को अपना समर्थन देना जारी रखेंगे। निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की सीटें जीती थीं और बीजेपी पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा था। यदि हम वोट शेयर देखें तो कुछ नया नहीं हुआ है, सिर्फ पार्टी बदली है।' नावादिया खुद भी वराछा रोड से बीजेपी से टिकट चाहते थे, लेकिन पार्टी ने नहीं दिया।

'जमीन पर काम नहीं कर रही है आम आदमी पार्टी'
सूरज हीरा कारीगर संघ के उपाध्यक्ष भवेश टांक ने कहा कि लोग कहते हैं कि सूरत में आम आदमी पार्टी का प्रभाव है, लेकिन पार्टी जमीन पर काम नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि 'विपक्ष में होते हुए भी आम आदमी पार्टी प्रोफेशनल टैक्स जैसे मुद्दों पर जिससे हीरा कारीगर प्रभावित हो रहे हैं, उस मुद्दे को उठाने में नाकाम रही है।' दूसरा मुद्दा है कि श्रम कानून हीरा उद्योग में नहीं लागू हो रहा है, जिससे कारीगरों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

दूसरे जिलों में भी हीरा कारीगर का दिख सकता है असर
सूरत में करीब 5,000 हीरा कटिंग और पॉलिशिंग यूनिट हैं, जहां करीब सात लाख कारीगर काम करते हैं। टांक के मुताबिक इनमें से सिर्फ 300 यूनिट ही ऐसी हैं, जिनके पास स्टेट फैक्ट्रीज ऐक्ट का लाइसेंस है। इसके अभाव में कारीगरों की सही संख्या का पता लगा पाना मुश्किल है। उन्हें बोनस और छुट्टियों से भी वंचित रहना पड़ता है। हमने मुख्यमंत्री को लिखा था और 16 कंपनियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। सूरत के हीरा कारीगर कुछ हद तक दूसरे जिलों में भी चुनाव प्रभावित कर सकते हैं। ये वो हैं, जिनका नाम अपने गृह जिलों की वोटर लिस्ट में दर्ज है और चुनाव से एक दिन पहले वह वहां जाकर वोट डाल सकते है।












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