अनवरत जलती मशाल है रामकथा : डॉ.अभिषेक शुक्ल

Gorakhpur News: दिग्विजयनाथ महाविद्यालय में आयोजित दिल्ली की साहित्यिक संस्था 'कस्तूरी' द्वारा आयोजित शहर-संवाद श्रृंखला में ख्यातिलब्ध कथाकार मनोज सिंह की शोधपरक पुस्तक "मैं रामवंशी हूँ" पर बतौर वक्ता बोलते हुए हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय के डॉ. अभिषेक शुक्ल ने कहा कि रामकथा अनवरत जलती मशाल है. अपने समय कि जटिलताओं का सामना करने हुए प्रत्येक दौर कि बदली हुई परिस्थितियों में रामकथा का नया सृजन होता रहा है. रामकथा की इसी निरंतरता की वर्तमान कड़ी है 'मैं रामवंशी हूं'.

इस अवसर पर अंग्रेजी विभाग के डॉ. आमोद राय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लौकिक जगत में राम भले ही पूज्य व्यक्तित्व हों किंतु व्यावहारिक जगत में मर्यादा पुरुषोत्तम राम धर्म के वह स्तंभ हैं जिन पर समाज जीवन की आधारशीला स्थित है.

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बतौर मुख्यवक्ता डॉ. सुधा राजलक्ष्मी ने कहा कि राम
केवल व्यक्ति नहीं है अपितु विचार हैं। आज राम को प्रतीक वाद से मुक्त कर आचरण में उतारने की आवश्यकता है। राम सबके हैं.

परिचर्चा में अपना सानिध्य प्रदान करते हुए दिग्विजयनाथ पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ ओ पी सिंह ने कहा कि राम के प्रति निष्ठा रखने वाले सच्चे रामवंशी का यह परम कर्तव्य बनता है कि वे लोग जीवन में राम की प्राण प्रतिष्ठा सद्भावना के साथ करें। क्योंकि राम भारतवर्ष की सांस्कृतिक अस्मिता के प्राण हैं। उनके बिना आदर्श कल्याणकारी राज्य की कल्पना भी निरर्थक सी प्रतीत होती है।

पुस्तक के रचनाकार व कथाकार मनोज सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए अपनी पुस्तक के कुछ प्रमुख अंशों का पाठ किया और पुस्तक की रचना करते समय अपने मन में चल रहे विचारों को साझा करते हुए पुस्तक लिखने की प्रेरणा पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार व उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. सदानंद गुप्त ने कहा कि साहित्य के साधक का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी लेखनी के माध्यम से वैचारिक रूप से मृत हो चुके समाज को पुर्नजागृत करने का कार्य करें। और यह लेखक और उसकी कलम का सौभाग्य होता है कि उसे अपने जीवन काल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी महाराज पर कुछ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हो। संपूर्ण भारतवर्ष में आध्यात्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से जितने भी आदर्श व मूल्य केंद्रित साहित्य रचे गए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र की उपस्थिति सहज व स्वाभाविक रही। आने वाले कठिन समय में नागरिकों में अनैतिकता और अराजकता की दुष्प्रवृत्तियों का निवारण यदि करना है तो उन्हें रामवंशी बनाने का संस्कार देना ही होगा। उन्हें यह बताना होगा कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की वंश परंपरा के साधक हैं और उन्हें असत्य पर सत्य की और अन्याय पर न्याय की विजय का यदि साहस विकसित करना है तो उन्हें रामवंशी बनना ही होगा।

कार्यक्रम का आरम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन से हुआ। इसके उपरान्त ललित कला एवं संगीत विभाग की छात्रा अदिति शुक्ला ने रामस्तुति का गान किया।
परिचर्चा का संचालन विशाल पांडेय ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महानगर के साहित्य प्रेमी व गणमान्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।

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