Chaitra Navratri 2023: मां दुर्गा का एक ऐसा अनोखा मंदिर जहां ताड़ के पेड़ से निकलने लगा था खून, यह है मान्यता
गोरखपुर- देवरिया मार्ग के किनोर स्थित तरकुलहा देवी का मंदिर चारों तरफ से ताड़ के घने जंगलों से आच्छादित था। यह स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था। जो आज आस्था का केंद्र बना हुआ है।

Maa Tarkulha Devi Temple Gorakhpur: गोरखपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर देवरिया मार्ग पर स्थित तरकुलहा देवी का मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। इस मंदिर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ साल भर तक लगी रहती है। लेकिन चैत्र व शारदीय नवरात्रि पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। तरकुल जिसे ताड़ भी कहते हैं इन पेड़ों के बीच स्थित यह मंदिर स्वतंत्रा आंदोलन का केद्र रहा है। आजादी की लड़ाई में शहीद होने वाले बाबू बंधू सिंह मां के भक्त थे। उसने जुड़ी कई मान्यातएं प्रचलित हैं।
जब ताड़ से बहने लगा खून मान्यता के अनुसार, गोरखपुर के चौरी- चौरा तहसील में स्थित यह मंदिर डुमरी रियासत में पड़ता था। इसी रियासत के बाबू बंधू सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और उन्होंने देश की आजादी के लिए जंग लड़ते हुए अपने प्राण दे दिए थे। यह कहा जाता है कि बाबू बंधू सिंह ताड़ के घने जंगलों में पेड़ के नीचे पिंडी बनाकर मां की अराधाना करते थे। वह यहां अंग्रेजों की बलि भी दिया करते थे। इससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनायी और धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजो ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। अंग्रेजों ने उन्हे सात बार फांसी पर लटकाया लेकिन फंदा टूट जाता था। अंग्रेज परेशान हो गए। तब बंधु सिंह ने तरकुलहा देवी से आग्रह किया कि मां अपनी चरणों में जगह दें। आठवीं बार बंधू सिंह ने स्वंय फांसी का फंदा अपने गले में डाला और शहीद हो गए। जैसे ही बंधू सिंह फांसी पर लटके तो दूसरी तरफ स्थित ताड का पेड टूट गया और उसमें से खून निकलने लगा। बाद में इसी स्थान पर भक्तों ने मंदिर का निर्माण कराया और तभी से यह आस्था का केंद्र बन गया।

नेपाल, बिहार से भी आते हैं श्रद्धालु पुजारी दिनेश त्रिपाठी ने बताया कि यह स्थान भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां नेपाल, बिहार सहित देश के कई हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं। मां सभी की मुरादें पूरी करती है। लेकिन नवरात्र के अवसर पर यहां भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। यहां मांगलिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है जो वर्ष भर चलता रहता है।

बहुत खास है यहां का प्रसाद यहां जो प्रसाद लोग ग्रहण करते हैं वह बहुत खास है। ऐसा अन्य मंदिरों पर जल्दी नहीं देखने को मिलता है। यहां लोग दूर- दूर से आते हैं और बकरे की बलि देते हैं। इसी का मीट बनाते हैं। यही यहां का प्रसाद माना जाता है।












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