आनंद मोहन बनाम पप्पू यादव : राजनीति की वो धार और गोलियों की बौछार
नई दिल्ली, 17 मई। बिहार के पूर्व बाहुबली नेता आनंद मोहन ने आज उम्रकैद की सजा पूरी कर ली। कृष्णैया हत्याकांड में उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली थी। 17 मई को 14 साल की सजा पूरी हो गयी। अब उनके जेल से बाहर आने की उम्मीद बढ़ गयी है। कानूनी प्रक्रिया के पूरा होने में अभी कुछ वक्त लगेगा। ये देरी कोरोना के चलते होगी। सोशल मीडिया पर आनंद मोहन को जल्द रिहा करने की मांग तेज हो गयी है।

यह संयोग है कि इसी समय पप्पू यादव की रिहाई की मांग भी सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही है। पप्पू यादव 32 साल पुराने अपहरण के एक मामले में 14 दिनों के लिए जेल भेजे गये हैं। कोशी इलाके के दो बाहुबली नेता जब जेल से बाहर आएंगे तब बिहार की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ? 1990 के दशक में पप्पू यादव और आनंद मोहन के बीच जानी दुश्मनी थी। राजनीतिक अदावत में बात-बात पर गोलियां जल जाती थीं। लाशें गिर जाती थीं। लेकिन 2021 में हालात पूरी तरह बदले हुए हैं। जिस लालू यादव के खिलाफ आवाज बुलंद कर आनंदमोहन हीरो बने थे आज वही लालू यादव उनके पुत्र चेतन आनंद के रहननुमा हैं। जिस लालू यादव की हनक के लिए पप्पू यादव ने उस समय बंदूक की ताकत दिखायी थी अब वे उनके खिलाफ हैं। राजनीति की धारा भले बदल गयी हो लेकिन उनका आधार नहीं बदला है। कोशी इलाके में राजपूत और यादव समाज की राजनीति, नयी करवट ले सकती है।

आनंद मोहन और पप्पू यादव में समानता
आंनद मोहन और पप्पू यादव में बहुत समानताएं हैं। दोनों पहली बार 1990 में विधायक बने। दोनों की राजनीति का आधार बाहुबल है। एक राजपूत समाज के नेता दूसरे यादव समाज के नेता। 1990-91 में जब मंडलवाद की लहर थी तब बैकवार्ड-फॉरवार्ड की लड़ाई में दोनों की बंदूकें गरजती थीं। पप्पू यादव विधायक अजीत सरकार हत्याकांड जेल गये। आनंद मोहन डीएम कृष्णैया हत्याकांड में जेल गये। जेल जा कर दोनों साहित्यकार हो गये। पप्पू यादव ने जेल में रह किताब लिखी- द्रोहकाल का पथिक। आनंद मोहन ने सलाखों के पीछे रह कर एक काव्य संग्रह लिखा- कैद में आजाद कलम। महात्मा गांधी पर भी तीन किताबें लिखीं। पप्पू यादव को अजीत सरकार हत्याकांड में उम्रकैद की सजा मिली लेकिन बाद में बरी हो गये। आनंद मोहन को कृष्णैया हत्याकांड में पहले मिली थी फांसी की सजा। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे उम्र कैद में बदल दिया। अब संयोग देखिए कि दोनों फिलहाल जेल में हैं और उनकी रिहाई के लिए सोशल मीडिया पर बहुत तेज मुहिम चल रही है।

1990 का राजनीतिक परिदृश्य
1990 में बिहार विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और निर्दलियों के समर्थन से लालू यादव (जनता दल) मुख्यमंत्री बने थे। आनंद मोहन को महिषी से जनता दल का टिकट मिल गया था। वे विधायक चुने गये थे। पप्पू यादव को कोशिश के बाद भी लालू यादव ने जनता दल का टिकट नहीं दिया था। तब तक पप्पू बाहुबली बन चुके थे। उन्होंने सिंहेश्वर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत गये। सहरसा जिले की महिषी सीट और मधेपुरा जिले की सिंहेश्वर सीट भौगोलिक रूप से आसपास हैं। करीब 53 किलोमीटर का फसला है। मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव पिछड़ावाद की लहर पर सवार हो कर बड़े नेता बनने की राह पर थे। ऐसे में निर्दलीय पप्पू यादव, लालू यादव के करीब आ गये। आनंद मोहन राजपूत समेत अन्य अगड़ी जातियों के नेता के रूप में स्थापित हो रहे थे। आनंद मोहन जनता दल में रह कर भी लालू यादव से दूर थे। इसी बीच 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आरक्षण को लागू करने की घोषणा कर दी। इसके बाद बिहार समेत पूरे देश में अगड़ों और पिछड़ों के बीच लड़ाई शुरू हो गयी। आरक्षण के विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे। बिहार में तो गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गयी। पप्पू यादव के मुताबिक, तब लालू यादव ने इस सामाजिक संघर्ष में पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पप्पू यादव को आगे कर दिया। पप्पू यादव ने अपने हथियारबंद गिरोह के साथ मोर्चा संभाल लिया। दूसरी तरफ अगड़ी जातियों की रक्षा के लिए आनंदमोहन ने बंदूक उठा ली।

1991 में मधेपुरा लोकसभा उपचुनाव
चंद्रशेखर सरकार के पतन के बद 1991 में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गयी। मई-जून में चुनाव हुए। लेकिन मधेपुरा लोकसभा सीट की निर्दलीय उम्मीदवार राज कुमारी देवी के निधन के कारण चुनाव रद्द कर दिया था। चुनाव के बाद कांग्रेस के नरसिम्हा राव की अलपमत सरकार बनी। मधेपुरा लोकसभा सीट पर नवम्बर 1991 में उपचुनाव कराये जाने की घोषणा हुई थी। मंडल आरक्षण को लागू करवाने में शरद यादव की भी अहम भूमिका थी। लेकिन 1991 में वे उत्तर प्रदेश की बदायूं सीट पर लोकसभा का चुनाव हार गये थे। शरद यादव ने इस हार के लिए मुलायम सिंह यादव को जिम्मेवार ठहराया था। मंडल राजनीति का बड़ा चेहरा होने के बाद भी शरद यादव की हार से जनता दल में खलबली मच गयी थी। तब लालू यादव समेत अन्य नेताओं ने शरद यादव को मधेपुरा से उपचुनाव लड़ने की पेशकश की। शरद चुनाव लड़ने के लिए मधेपुरा पहुंचे। जनता दल में भी आंतरिक विभाजन हो चुका था। इस चुनावी लड़ाई में आनंद मोहन, लालू यादव (शरद यादव) के खिलाफ थे।

चुनावी रंजिश में आठ घंटे तक गोलीबारी
पप्पू यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि शरद यादव की इस चुनावी लड़ाई में उनको आनंद मोहन के खिलाफ खड़ा किया गया था। पप्पू यादव के मुताबिक एक दिन लालू यादव मधेपुरा में चुनावी सभा कर रहे थे। उसके कुछ देर बाद आनंदमोहन के समर्थकों ने कई दुकानों और ऑफिसों को जला दिया था। इसके बाद मधेपुरा में बवाल शुरू हो गया। तभी पता चला कि मधेपुरा के वामा गांव में दबंगों ने दलितों के घर जला दिये थे। जब विधायक पप्पू यादव पीड़ित लोगों से मिलने उस गांव में गये तो उन पर फायरिंग शुरू हो गयी। करीब आठ घंटे तक पप्पू यादव और विरोधी गुट में गोलीबारी होती रही। पप्पू यादव के तीन समर्थकों को गोली लगी। पप्पू यादव के मुताबिक, अगर उस रात डीएम और एसपी सुरक्षा बलों के साथ नहीं पहुंचते तो उनकी जान जान जा सकती थी। रात के ग्यारह बजे जब बड़े अधिकारी पहुंचे तब वे वहां से निकल कर घर लौटे थे।

गोली के जवाब में गोली
7 नवम्बर 1991 को आनंद मोहन अपने हथियारबंद समर्थकों के साथ चुनावी सभा कर मुरलीगंज (मधेपुरा) लौट रहे थे। आनंद मोहन का काफिला जब जानकीनगर के पास पहुंचा तो अचानक फायरिंग शुरू हो गयी। दोनों तरफ से दनादन गोलियां चलने लगीं। इस अंधाधुंध फायरिंग में आनंद मोहन के दो समर्थक मारे गये। एक घाय़ल समर्थक के बयान पर पप्पू यादव और उनके 11 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया। इस मामले की पूर्णिया की अदालत में सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई लंबी चली। 2017 में जब आनंद मोहन जेल में बंद थे तब उन्होंने इस केस में पप्पू यादव के खिलाफ गवाही दी थी। उन्हें पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के बीच जेल से अदालत लाया गया था। आनंद मोहन ने 17 सितम्बर 2017 को पप्पू यादव के खिलाफ गवाही दी। इसके पांच दिन बाद ही पप्पू यादव, आनंद मोहन से मिलने पूर्णिया के सेंट्रल जेल पहुंच गये थे। वैसे तो उन्होंने इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया था। लेकिन कह जाता है कि पप्पू यादव ने रिश्तों में नये रंग भरने के लिए ये मुलाकात की थी। अब देखना है कि जब ये दोनों नेता जेल से बाहर आएंगे तो सियासत की तस्वीर कैसी शक्ल अख्तियार करती है।
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