Polygamy in India: क्या है असम में बहुविवाह को लेकर विवाद? जानें विभिन्न धर्मों में बहुविवाह के प्रावधान
असम में हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार बाल विवाह के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाने के बाद अब बहुविवाह पर अंकुश लगाने की तैयारी में है।

तीन तलाक, हलाला के बाद अब भारत में बहुविवाह की चर्चाएं जोरो पर हैं। असम में हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने बहुविवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यह विशेषज्ञ समिति अध्ययन करेगी कि राज्य विधायिका के पास बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने के अधिकार हैं या नहीं? यह समिति अगले छह महीनों के भीतर रिपोर्ट दाखिल करेगी।
वैसे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में बहुविवाह की प्रथा भले पहले के मुकाबले कम हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई है। खासकर अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों में यह प्रथा अब भी बरकरार दिखती है। हालांकि, बहुविवाह को खत्म करने की बहस पुरानी है। इस मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं।
क्या है बहुविवाह का मतलब?
जब एक पुरुष अपनी जीवित पत्नी को बिना तलाक दिए किसी अन्य महिला या महिलाओं को अपनी पत्नी बना लेता है, तो इसे बहुविवाह या पॉलीगैमी कहते हैं। इसी प्रकार यदि एक महिला के कई पति हों, तो इसे बहुपतित्व कहते हैं। सामान्यतया एक पुरुष की एक पत्नी या फिर एक महिला का एक पति होता है, तो इसे एकल विवाह या मोनोगैमी कहा जाता है।
अलग-अलग धर्मों में बहुविवाह के प्रावधान व मान्यताएं?
हिंदू धर्म - हिंदू धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतरण का संबंध माना गया है। इसलिए विवाह के वक्त पति और पत्नी अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं। हिंदू धर्म में एक से अधिक शादी अमान्य है। दरअसल साल 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बना था, जिसमें तीन शर्त पर एक से अधिक शादी की छूट दी गई। पहला पत्नी के निधन पर, दूसरा तलाक हो जाने पर और तीसरा पत्नी के सात साल से अधिक समय तक गायब रहने पर।
इस्लाम धर्म - इस्लाम धर्म में शादी अथवा निकाह करना एक कर्तव्य माना गया है और अपनी पीढ़ी बढ़ाने का तरीका। भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत चार निकाहों की मंजूरी दी गयी है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि अगर कोई विधवा है या बेसहारा औरत है तो उसे सहारा दिया जा सके। समाज में ऐसी औरतों को बुरी नजर से बचाने के लिए उसके साथ निकाह की इजाजत दी गई थी। हालांकि, यह अनुमति सिर्फ पुरुषों को है। इस कानून को लेकर समय-समय पर काफी विवाद होता रहा है। क्योंकि समय के साथ इस कानून का खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है।
ईसाई धर्म - ईसाई धर्म में शादी को समझौते के साथ ही एक संस्कार माना गया है। चर्च में शादी के दौरान दूल्हा और दुल्हन अंतिम सांस तक एक-दूसरे के प्रति वफादार रहने की शपथ लेते हैं। वहीं ईसाई मैरिज एक्ट 1872 के मुताबिक ईसाईयों में दूसरी शादी करने की मनाही है। यहां भी दूसरी शादी तभी हो सकती है, जब पत्नी की मौत हो जाए या दोनों का एक-दूसरे से तलाक ले लें।
धर्म के आधार पर वर्तमान बहुविवाह के आंकड़ें
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के 2019-2021 के आंकड़ों में बताया गया था कि पूरे देश में धर्म के आधार पर देखा जाए तो ईसाइयों में बहुविवाह की संख्या अधिक है। ईसाइयों में 2.1 प्रतिशत, मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत, बौद्ध में 1.5 प्रतिशत, हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत और सिखों में 0.5 प्रतिशत बहुविवाह के मामले सामने आये हैं। जबकि पूरे भारत में बहुविवाह का औसत 1.4 प्रतिशत है।
असम में बहुविवाह पर हंगामा क्यों?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बीते दिनों बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन की घोषणा की। तब उन्होंने कहा था कि हम कोई यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं कर रहे है। हम असम में यूनिफॉर्म सिविल कोड के एक घटक के रूप में राज्य अधिनियम के माध्यम से बहुविवाह को असंवैधानिक और अवैध घोषित करना चाहते हैं।
दरअसल एनएफएचएस-5 (2019-2021) के आंकड़ों के अनुसार असम में हिंदुओं में बहुविवाह की दर लगभग 1.8 प्रतिशत है। जबकि मुसलमानों में यह दर सर्वाधिक 3.6 प्रतिशत है। इसके बाद ओडिशा का नंबर आता है। वहां हिंदुओं में बहुविवाह की दर लगभग 2.1 प्रतिशत और मुसलमानों में 3.9 प्रतिशत है।
बहुविवाह और भारत का कानून
प्रतिबंधित होने के बाद भी भारत में बहुविवाह एक चुनौती बन गया है। अधिकतर मामले सामने नही आते। किसी विवाद के चलते ही ऐसे केस पुलिस की नजर में आते हैं। फिलहाल भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में एक पत्नी के रहते दूसरी शादी को अपराध माना गया है। इसमें दोषी पुरुष को सात साल की सजा का प्रावधान है। जबकि इस दंड संहिता में मुसलमानों को छूट दी गई है।
बहुविवाह पर दुनिया का हाल
दिसंबर 2020 में प्यू रिसर्च सेंटर की बेवसाइट पर छपे एक लेख के मुताबिक दुनिया की लगभग दो प्रतिशत आबादी बहुविवाह वाले परिवारों में अपना जीवन बसर कर रही है। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति का कहना है कि बहुविवाह महिलाओं की गरिमा का उल्लंघन करता है। यह नियम जहां कहीं भी मौजूद है, निश्चित रूप इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
अफ्रीकी देशों में बहुविवाह दर
प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार बहुविवाह उप-सहारा अफ्रीका में बहुत ज्यादा है। जहां 11 प्रतिशत आबादी ऐसी व्यवस्था में रहती है। यहां के देशों में बुर्किना फासो में 36 प्रतिशत, माली में 34 प्रतिशत और नाइजीरिया 28 प्रतिशत लोगों में बहुविवाह की प्रथा है। वहीं कुछ देशों में यह लोक प्रथा यानि संस्कृति मानी जाती है। जैसे बुर्किना फासो में 45 प्रतिशत लोग इन प्रथाओं का पालन करते है। इनमें सर्वाधिक 40 प्रतिशत मुसलमान और 24 प्रतिशत ईसाई हैं।
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