Generic Medicine: क्या अंतर है जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं में, डॉक्टर्स को जेनेरिक दवाएं लिखना जरूरी क्यों
चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता व आवश्यक सुधार हेतु गठित संगठन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने हाल ही में डॉक्टरों को नये दिशा-निर्देश जारी किये हैं। जिसमें कहा गया है कि डाक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखना अब जरूरी है। ऐसा न करने पर उन पर कार्यवाही होगी और उनका लाइसेंस भी निरस्त किया जा सकता है। वहीं 15 अगस्त के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जेनेरिक दवा के प्रचार-प्रसार हेतु जन औषधि केंद्रों (गुणवत्तापूर्ण और सस्ती जेनेरिक दवाओं की खुदरा दुकान) की संख्या 25000 करने का लक्ष्य दिया है। जिसके चलते अब जेनेरिक दवा की पहुंच सभी वर्गों, खासकर गरीब वर्गों तक सुलभ होगी।

क्या होती है जेनेरिक दवा
विभिन्न अध्ययनों व शोध के उपरांत किसी बीमारी के इलाज के लिए एक रसायन अथवा सॉल्ट तैयार किया जाता है। इस रसायनिक सॉल्ट का जेनेरिक नाम उसके शोध, अध्ययन व बीमारी को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है, जो पूरी दुनिया में एक ही होता है। इस सॉल्ट को ही आमजन हेतु उपलब्ध कराने के लिए दवा का रूप दिया जाता है। उसके उपरांत उसका पेटेंट (एकाधिकार संबंधी कानून) उस कंपनी/संस्था/व्यक्ति द्वारा किया जाता है। इसके कारण वह ब्रांडेड दवा बनकर महंगी हो जाती है।
ब्रांडेड दवा के पेटेंट की अवधि समाप्त होने के पश्चात ब्रांडेड दवाओं का रसायनिक सॉल्ट व फार्मूला सार्वजनिक हो जाता है अथवा पेटेंटधारक को रॉयल्टी देकर रसायनिक सॉल्ट बेचने का अधिकार मिल जाता है। इस रसायनिक सॉल्ट को ही जेनेरिक दवा कहते है। इस प्रकार जेनेरिक दवा, अन्य ब्रांडेड दवाओं की रासायनिक संरचना के समान ही होती है, परंतु उनकी बिक्री रासायनिक नाम से ही की जाती है। जेनेरिक दवा के निर्माण अथवा वितरण के लिये किसी पेटेंट की आवश्यकता नहीं होती। जैसे क्रोसिन अथवा पैनाडॉल ब्रांडेड दवाएं हैं, जबकि पैरासिटामोल इसकी जेनेरिक दवा है। क्योंकि इन दवाओं का केमीकल सॉल्ट पैरासिटामोल है।
इस प्रकार हम कह सकते है कि जेनेरिक दवा रसायन सॉल्ट के आधार पर मिलने वाली दवा है, जो वही काम करती है जो ब्रांडेड दवा करती है और ब्रांडेड दवा से काफी सस्ती भी होती है। जैसे ब्रांडेड मलेरिया की किट का मूल्य लगभग ₹100 है, जबकि जेनेरिक मलेरिया किट का मूल्य ₹29.30 है। इसी प्रकार ब्लड कैंसर के इलाज हेतु ग्लाईकेव का बाजार में ब्रांडेड दवा का खर्च ₹3833 प्रतिदिन है। जबकि जेनेरिक दवा का खर्च ₹380 प्रतिदिन आता है।
कुछ मामलों में जेनेरिक दवा बनाने वाली कुछ कंपनियों ने अपना ब्रांड भी बना लिया है, लेकिन ये दवाएं फिर भी जेनेरिक श्रेणी में आती है और काफी सस्ती हैं। इन दवाओं को ब्रांडेड जेनेरिक दवा भी कहा जाता है।
इस प्रकार जेनेरिक दवाएं, ब्रांडेड दवाओं के समान होती है। जेनेरिक दवाओं को भी अगर ब्रांडेड दवाओं की तरह ही लिया जाये, जैसे एक समान खुराक, मात्रा और समान तरीका इत्यादि, तो जेनेरिक दवा का असर ब्रांडेड दवा के समान ही होगा। जेनेरिक और ब्रांडेड दवा में मुख्य रूप से ब्रांडिंग, पैकेजिंग, स्वाद और रंगों का अंतर होता है। इसके साथ-साथ इनकी कीमतों में भी बहुत अंतर होता है।
जेनेरिक दवा से आमजन को फायदा
जेनेरिक दवा के फायदे की अगर बात करें तो सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि यह अन्य दवाओं से लगभग 80 प्रतिशत सस्ती होती है। दरअसल, मंहगी ब्रांडेड दवा, जो गरीब वर्ग की पहुंच से दूर थी, अब जेनेरिक रूप में उनको फायदा पहुंचा रही है। यानि कहने का तात्पर्य यह है कि जिन बीमारियों की महंगी दवा के चलते गरीब वर्ग उसका इलाज कराने में असमर्थ था, अब जेनेरिक दवा के चलते उससे लाभ प्राप्त कर रहा है।
भारत में जेनेरिक दवा उत्पादन
रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री भगवंत खूबा के अनुसार, भारत का दवा उद्योग दुनिया में उत्पादन की दृष्टि से तीसरा और मूल्य के हिसाब से 13वां सबसे बड़ा उद्योग है। भारत लगभग 60,000 से अधिक जेनेरिक दवाओं का उत्पादन करता है। जेनेरिक दवा उत्पादन में भारत अग्रणी देश है और दुनिया भर की लगभग 20 प्रतिशत जेनेरिक दवा की आपूर्ति भारत करता है। वहीं अमरीका की कुल जेनेरिक दवा मांग की लगभग 40 प्रतिशत व यूके की लगभग 25 प्रतिशत मांग की आपूर्ति भारत द्वारा ही होती है।
जेनेरिक दवा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) शुरू की हुई है। जिसके तहत भारत के लगभग सभी जिलों में जन औषधि केंद्र खोले गये है, जिन पर जेनेरिक दवा मिलती है। 31 मार्च 2023 तक देश भर में 9303 जन औषधि केंद्र खोले जा चुके है। इन केंद्रों पर वित्तीय वर्ष 2022-23 में लगभग ₹1100 करोड़ की जेनेरिक दवा की बिक्री हुई थी।












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