Arab League: क्या है अरब लीग, सीरिया के फिर जुड़ने से अमेरिका और इजराइल को क्या है चिंता?
सीरिया को 12 साल पहले आंतरिक गृह युद्ध के कारण अरब लीग से निलंबित कर दिया गया था। लेकिन, अब सीरिया की इसमें वापसी तय है।

अरब देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों ने तकरीबन 12 साल के निलंबन के बाद सीरिया को अरब लीग में वापस लाने के लिए रविवार को मतदान किया। अब फिलहाल लीग के सदस्य देशों ने सीरिया की वापसी को पूर्ण बहुमत से मंजूरी दे दी है। मिस्र की राजधानी काहिरा में हुए इस मतदान के कुछ दिन पहले शीर्ष स्थानीय राजनयिकों की जॉर्डन में मुलाकात हुई थी, जिसमें सीरिया को अरब लीग में वापस लाने की बात की गई थी। 19 मई को सऊदी अरब की मेजबानी में अरब लीग सम्मेलन होने वाला है।
क्यों अरब लीग से बाहर हुआ था सीरिया?
साल 2011 में सीरिया को उस वक्त अरब लीग से बाहर कर दिया गया था। जब सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद ने मार्च 2011 में प्रदर्शनकारियों पर कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था। राष्ट्रपति असद के इस फैसले के बाद सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ गया था।
सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स (SOHR) की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस गृहयुद्ध में मार्च 2023 तक 503,064 लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि 22 मिलियन लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। 6.8 मिलियन लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो गये और दो मिलियन से अधिक लोग बुनियादी सेवाओं की कमी के साथ तम्बू (शिविर) में रहने को मजबूर हैं। लिहाजा, सीरिया की अरब लीग की सदस्यता रद्द कर दी गई थी।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स ये बताती हैं कि सीरिया को अरब लीग से बाहर करने का फैसला अमेरिका के दबाव में लिया गया था। क्योंकि, उस समय अरब लीग के अधिकतर देशों के साथ अमेरिका के बहुत अच्छे रिश्ते थे। जबकि सीरिया की नजदीकी रूस के साथ बहुत ज्यादा थी।
क्या है अरब लीग?
अरब लीग, जिसे लीग ऑफ अरब स्टेट्स (LAS) भी कहा जाता है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के सभी अरब देशों का एक अंतर-सरकारी समग्र-अरब संगठन (Pan-Arab Organisation) है। अरब लीग का गठन छह देशों ने मिलकर 22 मार्च 1945 को काहिरा (मिस्र) में किया था। इन देशों में मिस्र, इराक, लेबनान, सऊदी अरब, सीरिया और ट्रांसजॉर्डन (1949 में जॉर्डन का नाम बदला गया) थे। 5 मई 1945 को यमन भी इस ग्रुप में शामिल हो गया। वहीं वर्तमान में, अरब लीग में 22 सदस्य हैं। बड़ी बात यह है कि सीरिया इस लीग के फाउंडर देशों में से है। इसके बावजूद सीरिया की भागीदारी को 16 नवंबर 2011 से 7 मई 2023 तक निलंबित कर दिया गया था और अब इसे फिर से बहाल कर दिया गया है।
कितने हैं अरब लीग के सदस्य देश?
वर्तमान में इस लीग में 22 अरब देश शामिल हैं। इसमें अल्जीरिया, बहरीन, कोमोरोस, जिबूती, मिस्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, लीबिया, मॉरिटानिया, मोरक्को, ओमान, फिलिस्तीन, कतर, सऊदी अरब, सोमालिया, सूडान, सीरिया, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन शामिल हैं।
अरब लीग के गठन के पीछे क्या उद्देश्य क्या था?
अरब लीग का राज्य उद्देश्य आम हित के मामलों पर अपने सदस्यों के बीच घनिष्ठ सहयोग की तलाश करना है। विशेष रूप से, अर्थशास्त्र, संचार, संस्कृति, राष्ट्रीयता, सामाजिक कल्याण और स्वास्थ्य; अरबी भाषी देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने, संचार में सुधार करने और सामान्य हितों को बढ़ावा देने के लिए। लेकिन, सच यह है कि जब इसका गठन हुआ था तब 1945 में अरब देशों को औपनिवेशिक शासन से बचाने के मुख्य उद्देश्य से की गई थी।
दरअसल उन्नीसवीं के शुरुआत में अरब के देशों पर तुर्की (ऑटोमन्स) अपनी भाषा और संस्कृति को लागू करने का प्रयास कर रहा था। तब प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, मक्का के शरीफ ने ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर ओटोमन्स के खिलाफ विद्रोह किया। ब्रिटिश सरकार ने अरबों को आश्वासन दिया कि उनके समर्थन को एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना के साथ पुरस्कृत किया जाएगा। लेकिन, ऐसा हो न सका। जिसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध में, ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर अरब एकता के लिए 'पूर्ण समर्थन' का वादा किया, जिसे मई 1941 में विदेश सचिव एंथनी ईडन ने अपने मैन्शन हाउस भाषण में व्यक्त किया था।
इस खबर से उत्साहित होकर अरब के नेताओं ने एक पैन-अरब संघ के लिए बातचीत शुरू की, जोकि फिलिस्तीनियों के समर्थन को और मजबूत करेगा और साथ ही यहूदियों के बढ़ते वर्चस्व को कम करने का प्रण लिया। इसके तहत ही अरब लीग के संस्थापक देशों ने साल 1944 में 'अलेक्जेंड्रिया प्रोटोकॉल' को अपनाया और बाद में इस लीग का गठन हुआ था। अलेक्जेंड्रिया, मिस्त्र का एक शहर है जहां इस पर फैसला लिया गया था।
अरब लीग के सदस्यों के बीच ही है संघर्ष?
कहने को तो यह लीग अरब देशों को एकजुट करने के लिए है। लेकिन, सच यह भी है कि अरब लीग के सदस्य देशों के बीच ही भारी मनमुटाव है। जैसे शीत युद्ध के दौरान कई देशों ने पश्चिमी देशों का समर्थन किया, जबकि अन्य सोवियत संघ के पक्ष में थे। जैसे मिस्र, सीरिया, इराक, लीबिया और दक्षिण यमन जैसे देशों ने खुलकर रूस का साथ दिया। वहीं बाकियों ने अमेरिका का साथ दिया।
वहीं इस लीग की स्थापना में कहीं-न-कहीं यहूदियों को वर्चस्व को कम करना भी एक उद्देश्य था लेकिन आज की तारीख में इजराइल से इस लीग के संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों के साथ राजनीतिक, डिप्लोमैटिक और आर्थिक रिश्ते हैं।
जर्मनी की DW वेबसाइट के मुताबिक दिसंबर, 2022 में मोरक्को के शहर रबात में अमेरिका की पहल पर इजरायल और अरब देशों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया था। जिसमें उन देशों ने इजरायल के साथ विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसे 'N7 पहल' करार दिया गया, इसमें अरब लीग के छह सदस्य देश (मिस्र, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान, मोरक्को) अब इजराइल के साथ खड़े हैं।
अरब लीग में धार्मिक टकराव क्या है?
अरब लीग में शामिल सभी मुस्लिम देश हैं। वहीं सच ये है कि इन देशों की धार्मिक सोच में भी अंतर है। जैसे कि ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब इस्लाम के जन्मस्थान के लिए और खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता आ रहा है। लेकिन, सच ये है कि सूडान जैसा देश अब खुद को मुस्लिम देश के कॉन्सेप्ट से अलग कर रहा है और साल 2020 में सूडान की सरकार ने अपने शासन से धर्म को अलग करने का फैसला किया था।
सऊदी अरब सुन्नी प्रभुत्व वाला देश है और इस वजह से सऊदी अरब खुद को प्रमुख सुन्नी मुस्लिम शक्ति के रूप में देखता है। जबकि इस लीग में शामिल कई देश (इराक, बहरीन जैसे) शिया बहुल हैं। इस वजह से भी इस लीग के देशों के बीच टकराव होते रहते हैं।
सीरिया पर कैसे शांत हुए अरब देश?
कई रिपोर्टों के मुताबिक सीरिया की अरब लीग में वापसी की अटकलें कुछ महीनों पहले तब शुरू हुईं थीं। जब अरब और ईरान बातचीत के लिए एक टेबल पर आए थे। इसके पीछे चीन और रूस का दिमाग था। इसके बाद से ही सऊदी अरब और सीरिया के बीच शांति वार्ता शुरू हो गई थी।
हाल ही में 6 फरवरी 2023 को जब तुर्किये और सीरिया में भूकंप आया तो दुनिया ने तुर्किये की खुलकर मदद की लेकिन सीरिया को मदद नहीं मिली। भूकंप की वजह से सीरिया में कुल 8 हजार से ज्यादा लोग मारे गये। इस वजह से अब अरब देश सीरिया को लेकर नर्म रवैया अपना रहे हैं।
क्या अमेरिका और इजराइल के लिए यह झटका है?
सीरिया की अरब लीग में वापसी को अमेरिका और इजराइल के लिए एक झटके के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि सीरिया के लीग में आने से फिलिस्तीन मामले पर इजरायल कमजोर पड़ सकता है। वहीं रूस की पकड़ खाड़ी के अरब देशों पर मजबूत हो जाएगी। क्योंकि सीरिया इस इलाके का इकलौता देश है, जहां 21 साल से रूस का मिलिट्री बेस है। कई मामलों में वो यहां अमेरिका और इजराइल से ताकतवर है। सीरिया ने हमेशा से इजराइल को दुश्मन माना है। दूसरी तरफ चीन पहले ही सऊदी अरब और ईरान के बीच डिप्लोमैटिक रिश्ते बनाना शुरू कर चुका है। लिहाजा, यह भी अमेरिका के लिए एक खतरा बन सकता है।












Click it and Unblock the Notifications