Parliamentary Committees: क्या होती हैं संसदीय समितियां और कैसे करती हैं काम?
कांग्रेस नेता व वायनाड से सांसद राहुल गांधी को उनकी लोकसभा सदस्यता बहाल होने के बाद अब रक्षा मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति के लिए नामांकित किया गया है। लोकसभा सचिवालय की ओर से बुधवार (16 अगस्त) को यह जानकारी दी गयी। साथ ही पंजाब से कांग्रेस सांसद अमर सिंह को भी समिति में शामिल किया गया है।
आम आदमी पार्टी के नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्य सुशील कुमार रिंकू को कृषि, पशुपालन और फूड प्रोसेसिंग समिति और एनसीपी के फैजल पी.पी मोहम्मद को उपभोक्ता मामले, भोजन और सार्वजनिक वितरण समिति के लिए नामित किया गया है।

क्या होती है संसदीय समितियां?
संसदीय समिति सांसदों का उस पैनल को कहा जाता है, जिसे सदन द्वारा नियुक्त या निर्वाचित किया जाता है। या फिर अध्यक्ष/सभापति द्वारा नामित किया जाता है। मुख्य रूप से सांसद दो काम करता है। पहला काम है कानून बनाना और दूसरा काम सरकार की कार्यात्मक शाखा की देखरेख करना।
अब संसद के अंदर इन्हीं कामों को बेहतर तरीके से पूरा करने के लिए इन समितियों को इस्तेमाल किया जाता है। ये समितियां अध्यक्ष/सभापति के निर्देशन में कार्य करती है। साथ ही ये अपनी रिपोर्ट सदन या अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत करती हैं।
संसदीय स्थायी समितियों में छोटे-छोटे समूह (कम से कम 10 सांसदों की संख्या) होते हैं। ये समूह अलग-अलग दलों के सांसदों के होते हैं। इन संसदीय समितियों में शामिल होने वाले सांसदों को उनकी व्यक्तिगत रुचि और विशेषज्ञता के आधार पर बांटा जाता है, ताकि वे किसी भी विषय पर विचार-विमर्श कर सकें।
हालांकि, भारतीय संसद प्रणाली के ज्यादातर नियम या प्रथाएं ब्रिटिश संसद से ली गयी हैं। वहीं इस तरह की संसदीय समिति बनाने का विचार भी ब्रिटिश संसद से ही लिया गया था। भारत में अप्रैल, 1950 में पहली लोक लेखा समिति का गठन किया गया था।
समितियों का क्या है महत्व?
दरअसल इन समितियों के पास बहुत ताकत होती है। ये संसदीय समितियां जनता और संसद के बीच की अहम कड़ी मानी जाती हैं। क्योंकि, ये समितियां ही हैं जो जनता से किसी भी मुद्दे पर विचार-विमर्श करके सुझाव मांग सकती (किसी कानून व अन्य विषयों पर) हैं। ये समितियां हमेशा एक्टिव रहती हैं। संसद के नहीं चलने पर भी ये समितियां काम करती हैं। इन समितियों को अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 118 के तहत अधिकार दिए गए हैं। अनुच्छेद 105 सांसदों के विशेषाधिकारों से संबंधित है। जबकि अनुच्छेद 118 संसद को अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन को विनियमित करने के लिये नियम बनाने का अधिकार देता है।
संसद है तो इसकी आवश्यकता क्यों?
संसद को संसदीय समितियों की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि, विधायी कार्य शुरू करने के लिये संसद के किसी भी सदन में एक विधेयक प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन कानून बनाने की प्रक्रिया अक्सर जटिल होती है तथा संसद के पास विस्तृत चर्चा के लिये सीमित समय होता है।
आसान भाषा में समझे तो जब संसद के पास कोई मामला आता है तो वह कुछ मौकों पर उस पर गहराई से विचार नहीं कर पाती। ऐसे में उन मामलों को गहराई से देखने और समझने के लिए इन समितियों को बनाया जाता है। जिससे ये किसी तरह के कानून या मसले को सही तरीके से समझकर उस पर एक विस्तृत रिपोर्ट संसद में पेश कर सकें।
संसद में कितने तरह की समितियां होती हैं?
भारत की संसद में कई प्रकार की समितियां हैं। उन्हें उनके काम, उनकी सदस्यता और उनके कार्यकाल के आधार पर बंटवारा किया जाता है। वैसे मोटे तौर पर दो प्रकार की संसदीय समितियां होती हैं। स्थायी समितियां और तदर्थ समितियां।
स्थायी समिति (प्रत्येक वर्ष या समय-समय पर गठित): ये स्थायी और नियमित समिति होती है। जिसका गठन संसद के अधिनियम के उपबंधों अथवा लोकसभा के कार्य-संचालन नियम के अनुसरण में किया जाता है। स्थायी समितियों को 7 श्रेणियों में बांटा गया है।
- लोक लेखा समिति
- प्राक्कलन समिति
- सार्वजनिक उपक्रम समिति
- एस.सी. व एस.टी. समुदाय के कल्याण संबंधी समिति
- कार्यमंत्रणा समिति
- विशेषाधिकार समिति
- विभागीय समिति
अस्थायी या तदर्थ समिति: यह समितियां अस्थायी इसलिए कहीं जाती हैं क्योंकि उन्हें सौंपे गये कार्य के पूरा होने पर उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इनकी कुल 24 तरह की समितियां हैं। जिसमें से 16 लोकसभा के अंतर्गत व 8 समितियां राज्यसभा के अंतर्गत कार्य करती हैं। वहीं प्रत्येक समिति में सभी पार्टियों से मिलाकर 31 सांसद होते हैं। इन समितियों का मुख्य कार्य अनुदान संबंधी मांगों की जांच करना और उन मांगों के संबंध में अपनी रिपोर्ट सौंपना होता है। यह भी दो प्रकार की होती हैं।
- जांच समितियां: किसी तात्कालिक घटना की जांच के लिये।
- सलाहकार समितियां: किसी विधेयक इत्यादि पर विचार करने के लिये।
इन समितियों का काम क्या होता है?
एक तरह से कहें तो इन समितियों का काम संसद के बढ़े बोझ के कामों को कम करने का होता है। कुल मिलाकर ये स्थायी समिति सरकार के काम में हाथ बंटाती है। साथ ही सरकार के कामों पर निगरानी भी रखने का काम करती है। उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं।
जैसे कोई वित्तीय समिति का सदस्य है। अब ये समिति सरकार द्वारा किये जा रहे सभी तरह के खर्च पर पूरी निगरानी रखेगी। उनका काम ये देखना होता है कि सरकार ने समय रहते कितना खर्च किया और नहीं किया तो क्यों नहीं किया? खर्च करने में सरकार द्वारा कोई अनियमितता या लापरवाही तो नहीं बरती गई है। इस तरह से समितियां एक प्रहरी का भी काम करती हैं।












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