Science and Hinduism: दुनिया के इन पांच नामी वैज्ञानिकों को था हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों में अटूट विश्वास

हॉलीवुड फिल्म 'ओपेनहाइमर' 21 जुलाई को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। प्रसिद्ध डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की यह फिल्म आजकल सुर्खियां बटोर रही है। क्योंकि यह 'फादर ऑफ एटम बम' जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर पर बनी है।

फिल्म में ओपेनहाइमर का किरदार अभिनेता सिलियन मर्फी निभा रहे है। जिन्होंने हाल ही में खुलासा किया कि उन्होंने फिल्म की तैयारी के लिए हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्‌गीता का पाठ किया था। दरअसल मर्फी ने श्रीमद्भगवद्‌गीता इसलिए पढ़ी और समझी क्योंकि अमेरिका के महान वैज्ञानिक ओपेनहाइमर खुद इसे पढ़ा करते थे।

 five famous scientists

जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर
1930-40 में रॉबर्ट ओपेनहाइमर अमेरिका के महान थ्योरिटिकल फिजिक्स के विद्वान माने जाते थे। उन्होंने ही 16 जुलाई 1945 को परमाणु बम का आविष्कार किया था। द न्यूक्लियर सिक्रेसी ब्लॉग (The Nuclear Secrecy Blog) के मुताबिक साल 1965 में परमाणु बम के विस्फोट पर उन्होंने श्रीमद्भगवद्‌गीता का हवाला दिया था। उन्होंने कहा कि विष्णु (कृष्ण) राजकुमार (अर्जुन) को मनाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। उस दौरान भगवान श्रीकृष्ण विराट रूप धारण करते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि "देखो, अब मैं मृत्यु बन गया हूं। अब मैं दुनिया का विनाशक बन गया हूं।" रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने आगे कहा कि आज मैं भी मौत बन गया हूं।
ओपेनहाइमर श्रीमद्भगवद्‌गीता को सबसे सुंदर दार्शनिक ग्रंथ कहा करते थे। साथ ही अक्सर कहते थे कि हिन्दू धर्म वैज्ञानिक तथा ब्रह्मांड विज्ञान के अनुरूप है। रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने श्रीमद्भगवद्‌गीता के जिस श्लोक का जिक्र किया, वह इस प्रकार था।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ (11.32)

इरविन श्रोडिंगर
भौतिक विज्ञानी इरविन श्रोडिंगर को क्वांटम यांत्रिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। 1933 में उन्हें "द वेव मैकेनिक्स" समीकरण विकसित करने के लिए नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। ऑस्ट्रिया के इस महान भौतिकी वैज्ञानिक के जीवन पर छपी कई किताबों और उनके शोध लेखों से पता चलता है कि वह हिंदू धर्म से प्रभावित थे। वह अपने एक शोध लेख में जिक्र करते हैं कि क्वांटम मैकेनिक्स की खोज वेदांत (वेदों) के मूल विचारों को रूप देने का एक प्रयास है।

इरविन श्रोडिंगर ने लिखा है कि आपका यह जीवन जो आप जी रहे हैं, वह इस पूरे अस्तित्व का एक टुकड़ा मात्र नहीं, बल्कि एक निश्चित अर्थ में संपूर्ण है। इसे ब्राह्मणों ने उस पवित्र और रहस्यवादी सूत्र में विदित किया, जो बहुत ही आसान है। वह सूत्र है, तत् त्वम असि, यह तुम हो। या फिर इन शब्दों में, 'मैं पूरब में हूं। मैं पश्चिम में हूं। मैं ऊपर हूं और नीचे हूं। मैं यह पूरा ब्रह्म हूं।

श्रोडिंगर ने 1944 में 'व्हाट इज लाइफ' अपनी किताब में उपनिषद और वैदिक विचारों को प्रकट किया है। जिसे लेकर 'डीएनए कोड' की खोज करने वाले फ्रांसिस क्रिक कहते है कि इस किताब ने उन्हें इतनी बड़ी खोज की राह दिखाई थी। वॉल्टर मोर की किताब 'ए लाइफ ऑफ इरविन श्रोडिंगर' के मुताबिक श्रोडिंगर के वेदों के ज्ञान और शोध के बीच एक निरंतरता दिखती थी। वह ब्रह्मांड में सच्चाई की खोज और अपनी शोध को लेकर एक वेदांतवादी हिंदू बन गये थे। यहां तक कि वह अपने बिस्तर के पास हिंदू धर्मग्रंथों की एक कॉपी भी रखते थे। आमतौर पर वह वेद, योग और सांख्य दर्शन पर ग्रंथ पढ़ा करते थे। उनके पसंदीदा ग्रंथ उपनिषद और भगवद्गीता थे।

वर्नर हाइजेनबर्ग
वर्नर हाइजेनबर्ग एक जर्मन सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे। जिन्हें क्वांटम यांत्रिकी की समझ में उनके योगदान के लिए जाना जाता था। साल 1927 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'द अनसर्टेन्टी प्रिंसिपल' से उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली थी। जबकि क्वांटम यांत्रिकी के निर्माण के लिए हाइजेनबर्ग को साल 1932 में सम्मानित किया गया था।

1988 में आयी लेखक फ्रिटजॉफ कैप्रा की किताब 'Uncommon Wisdom: Conversations with Remarkable People' के मुताबिक हाइजेनबर्ग के विचार इरविन श्रोडिंगर से काफी हद तक मिलते जुलते थे। हाइजेनबर्ग के बारे कहा जाता है कि वह हिंदू धर्म से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने हिंदू धर्म भी अपना लिया था। हालांकि, यह सिर्फ एक अफवाह थी।

इस किताब में हाइजेनबर्ग ने भारत की अपनी यात्रा के बाद सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म के वेद और उपनिषद से प्रभावित होने की बात स्वीकार की थी। उन्होंने 1929 में रवीन्द्र नाथ टैगोर से मिलने के लिए भारत का दौरा किया था। तब टैगोर से मुलाकात के दौरान उनकी वैदिक दर्शन और उपनिषदों के ज्ञान पर लंबी चर्चा हुई।

हाइजेनबर्ग उन प्राचीन हिंदू ग्रंथों में खोजी गई वैज्ञानिक समानताओं की साझा संख्या से स्पष्ट रूप से मंत्रमुग्ध थे। उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त करते हुए दावा किया था कि जो कोई भी इन प्राचीन हिंदू ग्रंथों (वेद, उपनिषद) को पढ़ेगा, उसे क्वांटम भौतिकी मनोरंजक नहीं लगेगी बल्कि इससे उन्हें क्वांटम मशीनों की इंटेक्रेसी को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।

एक बार हाइजेनबर्ग ने कहा था, "भारतीय दर्शन के बारे में चर्चा के बाद, क्वांटम भौतिकी के कुछ विचार जो बहुत अजीब लग रहे थे, अचानक बहुत अधिक अर्थ में आ गए।"

कार्ल सागन
कार्ल एडवर्ड सागन एक अमेरिका के महान खगोल शास्त्री, ग्रह वैज्ञानिक, ब्रह्मांड विज्ञानी, खगोल भौतिकी विद्वान, लेखक और विज्ञान संचारक माने जाते थे। वह ब्रह्मांड विज्ञान और आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान की खोज और समझ में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए वैज्ञानिक समुदायों के बीच एक खास पहचान बने हुए हैं।

कार्ल सागन उन विदेशी वैज्ञानिकों में से एक थे, जो न केवल हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित थे बल्कि इसके बारे में बहुत सी जानकारियां रखते थे। साथ ही इस बारे में सार्वजनिक मंचों पर खुलकर बातें भी करते थे। वह हिन्दू धर्म से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कई सालों तक भारत की यात्रा की और कई प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया। उनका दावा है कि जिस तरह से उपनिषदों और वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन है, वह आधुनिक विज्ञान के समान है।

कार्ल सागन अपनी 'कॉसमॉस' में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में लिखते हैं, कैसे सभी धर्मों के बीच केवल हिंदू धर्म ने प्रकृति में निहित चक्रीय प्रकृति को समझकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में सटीक जानकारियां जुटाई। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त को लिखने वाले ऋषि ब्रह्मांडीय अनिश्चितता को अच्छे से समझते थे।

ऋषियों ने इस संभावना को भी स्वीकार किया कि शायद देवता भी ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे नहीं जानते। यह एकमात्र धर्म है जिसमें समय के पैमाने आधुनिक वैज्ञानिक, बह्मांड विज्ञान के अनुरूप है। इसका चक्र हमारे सामान्य दिन और रात से लेकर ब्रह्मा के एक दिन और रात तक, 8.64 बिलियन साल लंबा चलता है। साथ ही उन्होंने अपनी इस किताब में भगवान शिव के नटराज नृत्य का भी जिक्र किया है।

हंस-पीटर ड्यूर
हंस-पीटर एक जर्मन भौतिक विज्ञानी थे। जिन्होंने परमाणु और क्वांटम भौतिकी, प्राथमिक कण और गुरुत्वाकर्षण, ज्ञानमीमांसा और दर्शन पर काम किया और उन्होंने जिम्मेदार वैज्ञानिक और ऊर्जा नीतियों की वकालत की। इन्हें हाइजबर्ग का शिष्य कहा जाता है। हंस-पीटन ने भी परमाणु और क्वांटम भौतिकी के क्षेत्र में अपना योगदान दिया। वह हिंदू धर्म से प्रभावित थे कि उन्होंने अपने जीवन के 33 साल वेदों और उपनिषदों के अध्ययन और महारत हासिल करने के लिए समर्पित कर दिये। एक बार उन्होंने कहा था कि जब भी मैं वह क्वांटम भौतिकी पढ़ाता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं वेदांत पर बात कर रहा हूं।

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