Tamil Nadu BJP: तमिलनाडु में बीजेपी के लिए “दिल्ली दूर” क्यों?
Tamil Nadu BJP: 2019 के आम चुनाव में डीएमके ने तमिलनाडु में तहलका मचा दिया थ। कुल 39 लोकसभा की सीटों मे से डीएमके ने 38 सीटें जीत ली थी। इस बार राज्य की सत्ता में डीएमके ही है और यह इंडिया गठबंधन का सबसे मजबूत धड़ा है।
बीजेपी और पीएम मोदी के लिए पूरे देश में सबसे बड़ी चुनौती इस बार भी तमिलनाडु ही रहेगा। 400 सीटों के पार जाने के मोदी के आह्वान की सबसे बड़ी परीक्षा तमिलनाडु में ही होने वाली है।

एआईडीएमके ने भी बीजेपी का साथ छोड़ दिया है और साथ में बीजेपी को केंद्रीय विदेश मंत्री और वित्तमंत्री को तमिलनाडु से चुनाव लड़ाने के लिए ललकारा भी है। पर मोदी हार मानने वाले नहीं है। पिछले दो साल से वह तमिल प्राइड का सम्मान कर जनता का दिल जीतने में लगे हैं।
बीजेपी के लिए दिल्ली दूर
2019 के लोकसभा चुनाव में डीएमके को अकेले 53.15 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी को केवल 3.66 प्रतिशत। काँग्रेस को 12.61 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। इनके अलावा सीपीआई और सीपीआई एम को मिलकर वामपंथियों को भी लगभग 5 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे।
यदि आज के इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों को कुल वोट को देखें तो इन्हें लगभग 70 प्रतिशत वोट मिले थे। पर तमिलनाडु में हर पाँच साल बाद स्थितियाँ बदल जाती हैं। लेकिन बदली स्थितियों का फायदा बीजेपी या काँग्रेस नहीं उठा पातीं। कभी डीएमके तो कभी एआईडीएमके के बीच ही कई चुनावों से सीटें बंटती रही है। आखिर क्यों बीजेपी अभी तक तमिलनाडु में अपने लिए जगह नहीं बना पा रही है, जबकि पार्टी पिछले 10 वर्षों में कई राज्यों में झंडा गाड़ने में सफल रही है।
मोदी की कोशिश से बदलेगा चुनाव परिणाम
प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास से भाजपा इस बार तमिलनाडु में भी अपने वोट प्रतिशत को बढ़ते हुए देख रही है। 3 प्रतिशत के वोट शेयर अब सर्वेक्षणों में 8 से 18 प्रतिशत तक बढ़ते दिखाए जा रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की तरह तमिलनाडु में भी बीजेपी कुछ कमाल दिखा सकती है। पिछले दस वर्षों में पीएम मोदी ने लगभग सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कवि सुब्रमण्यम भारती और तिरुवल्लुवर की कविताओं को खूब उद्धृत किया है।
मोदी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में काशी तमिल संगमम और अपने गृह राज्य गुजरात में सौराष्ट्र तमिल संगमम शुरू करके तमिलनाडु और उत्तर के लोगों के बीच संबंध बनाने की अच्छी पहल की है। मोदी ने नए संसद भवन में पवित्र सेनगोल को स्थापित कर तमिल गौरव को सम्मान देने का एक अभूतपूर्व काम किया। पीएम मोदी को उम्मीद है कि सांस्कृतिक दृष्टि से की गई उनकी पहल वोट में भी बदलेगी। लेकिन यही काफी नहीं है तमिलनाडु में बीजेपी को अपने पैर जमाने के लिए।
तमिलनाडु में बीजेपी के लिए बड़ी रुकावटें
केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी और तमिल पार्टियों के बीच बुनियादी अंतर बहुत बड़ा है। बीजेपी को हिन्दी भाषी लोगों की पार्टी माना जाता है और तमिलनाडु हिन्दी विरोध के मंच पर डटा हुआ है। तमिल पार्टियां कई मामलों में स्वायत्तता की मांग करती हैं, जो कि एक संघीय ढांचे में संभव नहीं है। सभी तमिल पार्टियां नीट जैसी परीक्षा को खत्म कर तमिलनाडु के लिए अलग मेडिकल शिक्षा बोर्ड की मांग करती हैं, जबकि केंद्र की बीजेपी सरकार ऐसा कर नहीं सकती।
कावेरी मुद्दे पर भी तमिल पार्टियां बीजेपी पर कर्नाटक के पक्ष में पक्षपातपूर्ण रुख रखने का आरोप लगाती रही हैं और बीजेपी को तमिलनाडु का विरोध करने वाली पार्टी के रूप में प्रचारित करती हैं। तमिलनाडु में डीएमके और एआईडीएमके बराबर रूप से मुख्यधारा और सोशल मीडिया के जरिए भाजपा विरोधी प्रचार करती रहती हैं।
वामपंथी और द्रविड़ियन विचारधारा, बीजेपी के लिए गंभीर चुनौती
तमिलनाडु में बीजेपी को उत्तर भारतीयों की पार्टी के रूप में देखा जाता है और यह प्रचार किया जाता है कि बीजेपी यदि जीती तो उत्तर भारतीय संस्कृति तमिलों पर भी थोप देगी। कामराज के जमाने में ही हिंदी के खिलाफ जो माहौल तैयार किया गया, वह माहौल आज भी बरकरार है। तमिलों को न केवल अपनी भाषा पर, बल्कि अपनी संस्कृति पर भी गर्व है। तमिल भाषा के लिए यहाँ हिंदू, बौद्ध, जैन, मुस्लिम और ईसाई सब इसके लिए लड़ने के लिए तैयार रहते हैं।
बीजेपी के लिए तमिलनाडु में गठबंधन बनाना मुश्किल
तमिलनाडु की राज्य पार्टियां नहीं चाहतीं कि बीजेपी उनका वोट शेयर खा जाए। लगभग हर पार्टी बीजेपी का विरोध करती है। एआईडीएमके ने भी हाल ही में गठबंधन तोड़ने का फैसला सुना दिया था। दरअसल पार्टियों को डर है कि बीजेपी एक बार तमिलनाडु में पैर जमाने के बाद उन्हें ही हाशिये पर डाल देगी। लगभग हर दिन किसी न किसी कारण से बीजेपी और मोदी की आलोचना डीएमके और एआईडीएमके कर रही हैं।
तमिलनाडु में बीजेपी के स्थानीय नेता भी अभी तक पार्टी की कुछ खास मदद नहीं कर सके हैं। इसलिए बीजेपी के पास यहां अच्छा मतदाता आधार नहीं बन पाया है, जबकि अन्नाद्रमुक और द्रमुक दोनों ने अपनी हकदारी की राजनीति, मुफ़्तखोरी की संस्कृति और आलस्य को बढ़ावा देकर तमिलनाडु को गर्त में धकेल दिया है। तमिलनाडु एक संसाधन संपन्न राज्य होने के बावजूद स्थानीय लोगों को अच्छा रोजगार नहीं मिल पा रहा है। जबकि यहाँ बिहार, यूपी और नेपाल से लोग आकर मजदूरी कर रहे हैं।
एक स्थानीय बीजेपी नेता का कहना है कि इस समय तमिलनाडु के लोग राजनीतिक मूर्ख बनकर रह गए हैं, जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं है। वे यहां की राजनीतिक पार्टियों के हर समय दिल्ली विरोधी होने के विचार के गुलाम बन गए हैं। तमिलनाडु के स्थानीय अपराधी पूरी तरह से अवैध रूप से रेत, ग्रेनाइट, वन संपदा और कई अन्य संसाधनों को लूटने में लगे हैं। स्थानीय राजनेताओं द्वारा तमिल लोगों के दिमाग को गुलाम बनाने का यह लंबा अभियान बेहद सफल रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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