Subhash Chandra Bose: कैसे पनडुब्बी में छिपकर जर्मनी से जापान पहुंचे नेताजी सुभाष

जब एडोल्फ हिटलर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस मिले तो वो समझ चुके थे कि जर्मनी, भारत की आजादी में उनका साथ नहीं देगा।

Subhash Chandra Bose story

Subhash Chandra Bose: 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा'... खून में उबाल वाला ये नारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सितंबर 1944 को आजाद हिंद फौज के सिपाहियों से कहा था। ये सुभाष चंद्र बोस का ही असर था, जिसने अंग्रेजी फौज में शामिल भारतीय सैनिकों को आजादी के लिए विद्रोह करने हेतु प्रेरित कर दिया था। आज हम आपको वो कहानी बताने जा रहे हैं जो इस नारे से दो साल पहले की है। वैसे तो इतिहास में नेताजी से जुड़े कई किस्से हैं। लेकिन यह किस्सा 29 मई 1942 का है।

दरअसल, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपनी जिंदगी में पहली बार जर्मनी के शासक एडोल्फ हिटलर से मिले थे। नेताजी के साथ बैठक में जर्मनी के विदेश मंत्री जोआखिम वॉन रिबेनट्रॉप, विदेश राज्य मंत्री विलहेल्म केपलर और दुभाषिया पॉल शिमिट भी मौजूद थे। वैसे इतिहास में हिटलर के बारे में ये कहा गया है कि भारत के बारे में उसकी सोच ज्यादा अच्छी नहीं थी। हिटलर ने अपनी पुस्तक 'Mein Kampf' (My Struggle) में लिखा है कि "ब्रिटिश साम्राज्य के हाथ से अगर भारत निकल जाता है तो पूरी दुनिया के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात होगी। एक जर्मन के रूप में मैं भारत को किसी दूसरे देश की तुलना में ब्रिटेन की गुलामी (आधिपत्य) में देखना चाहूंगा।"

नेताजी ने 'तानाशाह' हिटलर से की बेखौफ बातचीत

हिटलर से मिलने के दौरान उन दोनों के बीच मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर बातचीत हुई थी। पहला, भारत की आजादी के लिए जर्मनी समर्थन दे, लेकिन हिटलर ने इस पर कोई खास प्रतिक्रिया या उत्साह नहीं दिखाया था। दूसरा, हिटलर ने अपनी किताब में भारतीयों को लेकर जो बातें लिखीं थी, उस पर सुभाष चंद्र बोस ने ऐतराज जताया था। साथ ही नेताजी का कहना था कि उनकी किताब में लिखी बातों को ब्रिटेन भारतीयों को अपने पाले में लाने के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है और जर्मनी के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर रहा है। बोस ने हिटलर से कहा कि वो सही समय आने पर उस पर सफाई दे दे। जिस पर हिटलर ने गोलमोल जवाब दे दिया।

हिटलर ने नेताजी के लिए की पनडुब्बी की व्यवस्था

नेताजी ने तीसरा मुद्दा यह उठाया कि उनको जर्मनी से पूर्वी एशिया पहुंचाया जाए। इस पर हिटलर तुरंत राजी हो गया था। वहीं हिटलर ने नेताजी को हवाई जहाज के बजाय पनडुब्बी से जाने की सलाह दी थी क्योंकि मित्र देशों (अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस) की वायुसेना से उसकी भिड़ंत हो सकती थी। इसके लिए हिटलर ने एक पनडुब्बी की व्यवस्था कर दी।

नेताजी के साथ उस पनडुब्बी में सफर करने वाले आबिद हसन अपनी किताब 'सोलजर रिमेंबर्स' में लिखते हैं कि 9 फरवरी, 1943 को हम लोग जर्मनी के बंदरगाह कील से एक जर्मन पनडुब्बी से रवाना हुए। पनडुब्बी के अंदर दमघोटू माहौल था और नेताजी को पनडुब्बी के बीच में बंक (फौजियों के सोने या बैठने वाली छोटी सी जगह) दिया गया था। पनडुब्बी में चलने फिरने तक के लिए जगह नहीं थी और पूरी पनडुब्बी में डीजल की महक तैर रही थी। वैसे हमें इसी में डेढ़ महीने काटने थे लेकिन सफर तीन महीने का हो गया। कभी-कभी तो खाना लेटे लेटे ही खाना पड़ता था।

नेताजी ने कई दिन खिचड़ी खाकर गुजारे

सुभाष चंद्र बोस की भतीजी कृष्णा बोस की किताब 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस: लाइफ, पॉलिटिक्स एंड स्ट्रगल' के मुताबिक पनडुब्बी पर राशन के रूप में मोटी ब्रेड, कड़ा मांस, टीन के डिब्बे में बंद सब्जियां थीं, जो देखने और स्वाद में रबड़ जैसी थी। आबिद ने नोटिस किया कि नेताजी खाना नहीं खा रहे हैं। तब आबिद पनडुब्बी के गोदाम में पहुंचे और चावल और दाल का एक थैला देखा। उससे उन्होंने खिचड़ी बनाकर नेताजी को खिलाई जो उनको बहुत पसंद आई, लेकिन नेताजी ने जर्मन नौसैनिकों को भी खिचड़ी खिलाई। आबिद को डर लगा कि अगर सभी ने खिचड़ी खानी शुरू कर दी तो जल्द ही उनका चावल दाल खत्म हो जाएगा। पर वो नेताजी से कुछ नहीं बोल पाया।

कृष्णा बोस लिखती हैं कि दिन में पनडुब्बी समुद्र के पानी के नीचे चलती। रात में वो समुद्र के पानी के ऊपर आ जाती। ये पनडुब्बी बैटरी से चल रही थी, इसलिए उसे बैटरी चार्ज करने के लिए रात को पानी के ऊपर आना होता था। जैसे ही सुबह होने वाली होती पनडुब्बी दोबारा पानी के अंदर चली जाती। जब रात में पनडुब्बी ऊपर आती तो नेताजी और आबिद हसन पनडुब्बी की छत पर आकर अपने पैर फैला लेते थे क्योंकि पनडुब्बी में खुलकर चलने और बैठने की जगह नहीं थी। इस दौरान ही नेताजी ने आबिद को बताया था कि उनका जापान को लेकर क्या प्लान होगा? वो जापान प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो से कैसे डील करेंगे।

नेताजी की पनडुब्बी ने ब्रिटिश तेलवाहक जहाज डुबोया

आबिद हसन की किताब के मुताबिक यात्रा के दौरान 18 अप्रैल, 1943 को हमारी पनडुब्बी ने एक 8000 टन के ब्रिटिश तेलवाहक जहाज कॉरबिस को टॉरपीडो से डुबो दिया था। इस दौरान ऐसा लगा कि जैसे पूरे समुद्र में आग लग गई है। हम देख सकते थे कि जलते हुए जहाज में कुछ भारतीय और मलेशियाई दिखने वाले लोग मौजूद थे। एक बड़ी लाइफ बोट में गोरे बैठकर भाग गए और भूरी चमड़ी वाले लोगों को जलते हुए जहाज में छोड़ दिया।

वहीं एक और कहानी है कि एक बार पनडुब्बी के कमांडर मुसेनबर्ग ने अपने पेरिस्कोप से एक ब्रिटिश युद्धक पोत देखा था। इस दौरान ब्रिटिश जहाज ने पनडुब्बी पर हमला कर दिया। तब आबिद हसन लिखते हैं कि इस पूरे तनाव के दौरान मेरा तो डर के मारे पसीना निकल आया लेकिन नेताजी शांत बैठे अपना भाषण डिक्टेट (अपनी किताब और आगे की योजना को लेकर) कराते रहे। जब खतरा टल गया तो पनडुब्बी के कैप्टन मुसेनबर्ग ने चालक दल को इकट्ठा कर कहा कि हम लोगों को भारतीय मेहमान से सीखना चाहिए कि कैसे खतरे के समय अपने आप को शांत रखा जाता है।

जब जापान पहुंचे नेताजी

सौगत बोस अपनी किताब 'हिज मेजेस्टीज ओपोनेंट' में लिखते हैं कि यात्रा के दौरान मेडगास्कर के समुद्री इलाके यानि हिंद महासागर में 28 अप्रैल 1943 की सुबह नेताजी और आबिद हसन को यू-180 पनडुब्बी से नीचे उतार कर एक रबड़ की नाव में बैठाया गया। वो नाव उन्हें जापानी पनडुब्बी आई-29 तक ले गई। जर्मन नौसैनिकों ने पूरी यात्रा के दौरान नेताजी और उनके साथियों का ध्यान रखा था लेकिन जापानी पनडुब्बी पर चढ़ने के बाद बोस और आबिद को लगा जैसे वो अपने घर पहुंच गए हों। आबिद हसन अपनी किताब में लिखते है कि जापानी पनडुब्बी जर्मन पनडुब्बी से बड़ी थी और उसके कमांडर मसाओ तरोओका ने नेताजी के लिए अपना केबिन तक खाली कर दिया था। वहीं भारतीयों खानपान की कोई कमी नहीं थी। वहीं जर्मन सैनिक के कमांडर किसी भी जहाज या पनडुब्बी से लड़ जाते थे जबकि जापानी पनडुब्बी के कमांडर को दुश्मन का पोत दिखाई देता तो वो उस पर जल्दी हमला नहीं करते या उलझते नहीं थे।

जर्मन भाषा नेताजी और आबिद के लिए समझना आसान था लेकिन जापानी भाषा दोनों के लिए सिरदर्द बनी रही। तभी 13 मई 1943 को जापानी पनडुब्बी आई-29 सुमात्रा के उत्तरी तट के पास सबांग पहुंची। जहां पनडुब्बी चालकों के अनुरोध पर सुभाष चंद्र बोस ने सभी सदस्यों के साथ तस्वीर खिंचवाई। उस पर लिखा कि इस पनडुब्बी पर यात्रा करना एक सुखद अनुभव था। हमारी जीत और शांति की लड़ाई में ये यात्रा एक मील का पत्थर साबित होगी। उसके बाद नेताजी ने वहां दो दिन आराम किया और एक जापानी युद्धक विमान से टोक्यो पहुंचे। जहां नेताजी को राजमहल के सामने वहां के सबसे मशहूर इम्पीरियल होटल में ठहराया गया। इस तरह से नेताजी तकरीबन तीन महीने की यात्रा करके जर्मनी से जापान पहुंचे।

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