Ramdhari Singh Dinkar: संसद में प्रधानमंत्री नेहरू की आलोचना करने वाले राष्ट्रकवि थे दिनकर
Ramdhari Singh Dinkar: रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध रचनाएं उर्वशी, रश्मिरथी, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, हुंकार, सामधेनी, नीम के पत्ते हैं। इस राष्ट्रकवि ने 24 अप्रैल 1974 को अंतिम सांस ली।

Ramdhari Singh Dinkar: "हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- 'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।"
यह एक ऐसी कविता है जिसको पढ़ने वाले और सुनने वाले दोनों मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह कृष्ण की चेतावनी लिखी रामधारी सिंह दिनकर ने। रामधारी सिंह दिनकर भले अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताएं आज भी हर भारतीय का सीना चौड़ा कर देती हैं। रश्मिरथी से लेकर उर्वशी तक उनके काव्य संग्रह लोगों के दिलोदिमाग में अमिट रूप से दर्ज हैं।
पद्म विभूषण की उपाधि से सुशोभित दिनकर का जन्म 23 सितम्बर 1908 को सिमरिया (बिहार) में हुआ था। उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। इसके साथ ही उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। आजादी से पहले रामधारी सिंह एक विद्रोही कवि के रूप में जाने जाते थे क्योंकि उनकी कविताएं युवाओं में क्रन्तिकारी भाव पैदा करती थी। आजादी मिलने के बाद दिनकर को राष्ट्रकवि की उपाधि मिली। साल 1934 से लेकर 1947 तक वह बिहार सरकार में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक रहे। उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय में बतौर उप कुलपति के पद पर भी कार्य किया। उसके बाद भारत सरकार के लिए हिंदी सलाहकार भी बने। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम आपको उनसे जुड़े किस्सों के बारे में बताएंगे।
"राजनीति जब-जब लड़खड़ाती है, साहित्य उसे ताकत देता है"
यह वाकया तब घटित हुआ जब एक बार लाल किले में कवि सम्मेलन होने जा रहा था। प्रधानमंत्री नेहरू भी उस सम्मेलन में शामिल होने के लिए आ रहे थे। पंडित नेहरू और दिनकर मंच की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे। तभी अचानक से प्रधानमंत्री नेहरू का पांव डगमगा गया और दिनकर ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें संभाल लिया। इसके बाद उन्होंने दिनकर से कहा कि "धन्यवाद दिनकर जी आपने मुझे संभाल लिया।" इसके जवाब में दिनकर ने जो कहा, वह एक इतिहास बन गया। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा कि "इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है नेहरू जी, राजनीति जब-जब लड़खड़ाती है, साहित्य उसे ताकत देता है।"
चीन से हार के बाद नाराज हुए थे दिनकर
दिनकर ने चीन की हार के बाद 'परशुराम की प्रतीक्षा' नाम की काव्य पुस्तक की रचना की। उन्होंने इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों की कविता के माध्यम से भरपूर आलोचना की थी। उसमें उन्होंने एक जगह लिखा था, "उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था, तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था, सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गए थे, निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गए थे।"
दरअसल, इन पंक्तियों में दिनकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री और उनकी विदेश नीति और रक्षा नीति पर करारा प्रहार किया था। सभी जानते हैं कि गलत रक्षा नीति के कारण कैसे भारतीय सैनिक युद्ध के लिए जरूरी सामानों के अभाव में ही युद्ध लड़ रहे थे। उनके गुस्से का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को कविता के माध्यम से 'घातक' तक कह डाला था। उनके अनुसार, "घातक है जो देवता-सदृश दिखता है, लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है।"
हिंदी भाषा के अपमान को नहीं सहा
20 जून 1962 को देश की संसद में राष्ट्रकवि दिनकर का मूड कुछ ठीक नहीं था। राज्यसभा की कार्रवाई प्रारंभ हुई। उस दिन दिनकर राज्यसभा में खड़े हुए और हिंदी के अपमान को लेकर उन्होंने कहा कि देश में जब भी हिंदी को लेकर कोई बात होती है, तो देश के नेतागण ही नहीं बल्कि कथित बुद्धिजीवी भी हिंदी वालों को अपशब्द कहे बिना आगे नहीं बढ़ते। पता नहीं इस परिपाटी का आरम्भ किसने किया है?
उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू की ओर इशारा करते हए कहा कि क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया है, ताकि हिंदी भाषियों को रोज अपशब्द सुनाए जा सकें? यह सुनकर प्रधानमंत्री नेहरू सहित सभा में बैठे सभी लोग हैरान रह गए थे। दिनकर ने बात जारी रखते हुए कहा कि प्रधानमंत्री अन्य भाषाओं के बारे में कभी कुछ नहीं कहते, किन्तु हिंदी के बारे में उन्होंने आज तक कोई अच्छी बात नहीं कही।
कई साहित्यकार कर चुके हैं प्रशंसा
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने दिनकर के बारे में कहा था कि दिनकर जी अहिंदीभाषियों के बीच हिंदी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे। तो वहीं हरिवंश राय बच्चन ने कहा था दिनकर जी को एक नहीं बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने चाहिए। रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था दिनकर जी ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को स्वर दिया था। इसके साथ ही नामवर सिंह ने दिनकर के बारे में कहा था कि दिनकर जी अपने युग के सचमुच सूर्य थे। रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध रचनाएं उर्वशी, रश्मिरथी, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, हुंकार, सामधेनी, नीम के पत्ते हैं। इस राष्ट्रकवि ने 24 अप्रैल 1974 को अंतिम सांस ली।
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