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Ram Janmbhumi: क्या बाबरी मस्जिद गिरने के बाद मंदिर बनाना चाहते थे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव?

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के प्रेस सलाहकार रहे पीवीआर के प्रसाद अपनी किताब में बताते हैं कि किस तरह प्रधानमंत्री राव ने बाबरी ढांचा गिरने दिया और वे वहां पर मंदिर बनाने के लिए उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने रामालय ट्रस्ट बनवा

Ram Janmbhoomi: Did PM Narasimha Rao want to build a temple after demolition of Babri Masjid
Ram Janmbhumi, 30 साल पहले, 6 दिसंबर 1992 को आज ही के दिन अयोध्या में भीड़ ने विवादित बाबरी ढांचे को गिराया था और वहां एक अस्थायी रूप से श्रीराम मंदिर बना दिया था। उस दौरान पुलिस ने दो एफआईआर (FIR) दर्ज की थी, पहली FIR (197/1992), और दूसरी (198/1992) थी। इन प्राथमिकियों में लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया जैसे नाम मुख्य रूप से शामिल थे।

क्या हुआ था उस दिन अयोध्या में
बाबरी ढांचे के स्थान पर मंदिर बनाने की सुगबुगाहट 1992 में कई दिनों से चल रही थी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर पाबंदी लगाई हुई थी। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा भी दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पूरी तरह पालन होगा। हालांकि, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में 'जय श्रीराम', 'रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे', 'एक धक्का और दो... जैसे नारों से आकाश गूंजने लगा और इन नारों के बीच कारसेवकों ने मात्र दो घंटों में विवादित ढांचे को गिरा दिया।

बाबरी ढांचा ढह जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने घटना और उसके पीछे कथित षड्यंत्र की जांच हेतु जस्टिस एमएस लिब्राहन की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश करने में 17 साल का लंबा समय लग गया था। दूसरी तरफ, इस घटना के उपरांत केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर दिया।

क्या प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव मौन रहे?
पामुलापति वेंकट नरसिंह राव (28 जून 1921-23 दिसंबर 2004) भारत के 10वें प्रधानमंत्री बने थे। उन्हें 10 भाषाओं की जानकारी थी। 'लाइसेंस राज' की समाप्ति सहित भारतीय अर्थव्यवस्था को नयी दिशा देने का कार्य भी उनके शासनकाल से ही आरंभ हुआ। यही नहीं, राममंदिर आंदोलन भी उनके कार्यकाल में सबसे चर्चित मुद्दों में से एक था।
बाबरी ढांचा गिरने से पहले प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने तत्कालीन गृह सचिव माधव गोडबोले से एक इमरजेंसी प्लान तैयार करने को कहा था। उन्होंने आदेश के अनुसार ऐसा किया भी लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उस पर ठीक से कोई कार्रवाई नहीं हुई।

कुलदीप नय्यर अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइंस में' लिखते हैं, "मुझे जानकार सूत्रों से पता है कि राव की बाबरी मस्जिद विध्वंस में भूमिका थी। जब कारसेवक बाबरी मस्जिद गिरा रहे थे, तब वे अपने निवास स्थान पर पूजा में बैठे हुए थे और वे पूजा से तभी उठे जब मस्जिद का आखिरी पत्थर हटा दिया गया।"

हालांकि नरसिंह राव की जीवनी 'हाफ़ लायनः हाउ पीवी नरसिंहा राव ट्रांसफ़ॉर्म्ड इंडिया' के लेखक विनय सीतापति का मानना है कि यह गलत बात है कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय नरसिंह राव पूजा कर रहे थे अथवा सो रहे थे।"
फोतेदार जी मैं आपको दोबारा फ़ोन करता हूं। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी, तो तत्कालीन केंद्रीय मंत्री माखनलाल फोतेदार ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को फोन कर तुरंत कुछ कार्यवाही करने का अनुरोध किया था। यह बात उन्होंने अपनी आत्मकथा 'द चिनार लीव्स' में कही है। वे लिखते है, "मैंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि वे वायुसेना से फैजाबाद में तैनात चेतक हैलिकॉप्टरों द्वारा अयोध्या में मौजूद कारसेवकों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले का प्रयोग करने को कहे।"

जवाब में प्रधानमंत्री राव ने कहा, "मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ?" आगे लिखा है कि मैंने उनसे विनती की, "राव साहब कम से कम एक गुंबद तो बचा लीजिए। जिसको हम एक शीशे के केबिन में रख सकें और बता सकें कि बाबरी मस्जिद को बचाने की हमने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की।"

यह सुनकर प्रधानमंत्री चुप हो गए और लंबे ठहराव के बाद बोले, "फोतेदारजी, मैं आपको दोबारा फोन करता हूँ।"
फोरेदार के अलावा, प्रधानमंत्री राव के प्रेस सलाहकार रहे पीवीआर के प्रसाद अपनी किताब में लिखते है कि किस तरह राव ने मस्जिद गिरने दी, वे वहां पर मंदिर बनाने के लिए उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने रामालय ट्रस्ट बनवाया।
क्या वे भाजपा की मंदिर राजनीति को खत्म करना चाहते थे।

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के अनुसार, "जब 1991 में लगा कि बाबरी मस्जिद पर खतरा मंडरा रहा है, तब भी उन्होंने कोई कोशिश नहीं की।" वे आगे कहते हैं कि नरसिम्हा राव ने भाजपा की मंदिर की राजनीति को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए बाबरी मस्जिद को ढ़हने दिया।"

यही बात प्रभाष जोशी (जनसत्ता के पूर्व संपादक) की जीवनी 'लोक का प्रभाष' में भी मिलती है। इसके अनुसार, एक बार नरसिम्हा राव ने कहा, क्या आप लोग समझते हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती? मैंने जो किया, वह सोच-समझकर किया। मुझे भाजपा की मंदिर राजनीति को समाप्त करना था, वह मैंने कर दिया।"

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