Rajasthan: आजादी के 8 साल बाद वर्तमान स्वरूप में आया राजस्थान, जानें एकीकरण की प्रक्रिया
Rajasthan: देश की आजादी के बाद सबसे बड़ा संकट छोटी व बड़ी 562 रियासतों को एक करना था। इस प्रक्रिया में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके सचिव वीपी मेनन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके प्रयासों के चलते 18 मार्च 1948 को शुरू हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया कुल सात चरणों में एक नवंबर 1956 को पूरी हुई। राजस्थान के एकीकरण में कुल 8 साल 7 महीने और 14 दिन यानि 3144 दिन लगे।
आजादी की घोषणा के साथ ही सत्ता बचाने की होड़
ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत को आजाद करने की घोषणा करने के बाद जब सत्ता हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू की गयी तब तत्कालीन राजपूताना के इस भूभाग में कुल बाईस देशी रियासतें थी। इसके अलावा अजमेर-मेरवाड भी शामिल था, जो सीधे अग्रेजों के अधीन था। इन सबका स्वतन्त्र भारत में अधिमिलन कर संयुक्त राजस्थान प्रांत का निर्माण किया जाना था। हालांकि, तकरीबन नौ साल की मशक्कत के बाद 18 मार्च 1948 को शुरू हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया कुल सात चरणों में एक नवंबर 1956 को पूरी हुई।

सात चरणों में पूरी हुई प्रक्रिया
क्षेत्रफल की दृष्टि से आज देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का गठन अहम उपलब्धि है। 22 छोटी-बड़ी देसी रियासतों को मिलाकर एकतंत्र को त्याग लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल कर राजस्थान का गठन किया गया। 8 साल, 7 महीने और 14 दिन तक चले प्रयास और सात विभिन्न चरणों के बाद राजस्थान का वर्तमान स्वरूप उभर कर सामने आया। प्रथम चरण में अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली की रियासतों के विलीनीकरण कर 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ का निर्माण हुआ। द्वितीय चरण में 25 मार्च 1948 को कोटा, बूंदी, झालावाड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, किशनगढ़, टोंक, कुशलगढ़ (चीफशिप्स) और शाहपुरा रियासतों को मिलाकर राजस्थान संघ का निर्माण किया गया।
तीसरे चरण में 18 अप्रेल 1948 को उदयपुर रियासत का राजस्थान संघ में विलीनीकरण होने पर संयुक्त राजस्थान का निर्माण हुआ। चौथे में 14 जनवरी 1949 को उदयपुर की एक सार्वजनिक सभा में सरदार पटेल ने जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, लावा और जैसलमेर रियासतों को वृहद राजस्थान में सैद्धांतिक रूप से सम्मिलित होने की घोषणा की। इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए सरदार पटेल ने 30 मार्च 1949 को जयपुर में आयोजित एक समारोह में राजस्थान संघ बना कर वृहद राजस्थान का उद्घाटन किया। पांचवें चरण में 15 मई 1949 को मत्स्य संघ वृहद राजस्थान का अंग बन गया। साथ ही नीमराना को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
छठें चरण में काफी मतभेद के बाद अतः 26 जनवरी 1950 में सिरोही का विभाजन और आबू व देलवाड़ा तहसीलों को बम्बई प्रान्त और शेष भाग को राजस्थान में मिलाने का फैसला लिया गया। सातवें और अंतिम चरण में आबू व देलवाड़ा को बम्बई प्रान्त में मिलाने के कारण राजस्थानियों के विरोध को देखते हुए छह वर्ष बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय इन्हें वापस राजस्थान में शामिल किया गया। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवम्बर 1956 को तत्कालीन अजमेर-मेरवाड़ा राज्य को भी राजस्थान में विलीन किया। भारत सरकार द्वारा गठित राव समिति की सिफारिशों के आधार पर सात सितम्बर 1949 को जयपुर को राजस्थान की राजधानी घोषित किया गया।












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