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Stray Cattle: सिर्फ सरकारी योजनाओं के भरोसे खत्म नहीं होगी आवारा मवेशियों की समस्या

Stray Cattle: भारत दुनिया का सबसे अधिक पशुधन वाला देश है। यह आंकड़ा तब शर्मिंदगी का कारण बन जाता है जब यह पता चलता है कि भारत में दुनिया के सर्वाधिक आवारा पशु भी हैं, जो न केवल हमारी खेती को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि आए दिन दुर्घटना का कारण बन कर लोगों की मौत की वजह भी बन रहे हैं। भारत के लगभग हर हिस्से में पालतू पशुओं का सड़कों पर फिरना और कूड़ेदानों के आसपास मंडराना एक आम दृश्य है। कुछ राज्यों में तो आवारा मवेशी मुख्य राजनीतिक मुद्दा बन गए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर देश में आवारा मवेशियों की संख्या 2019 की जनगणना के अनुसार 50.21 लाख है। अलग अलग राज्य सरकारें दावा करती हैं कि वे अपने राज्य में खुले में घूम रहे मवेशियों के आश्रय के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। आर्थिक मदद भी दे रही हैं। पर क्या सिर्फ सरकारी योजनाओं के भरोसे इस समस्या का निराकरण हो सकता है? संभवतः नहीं। जब तक पशुपालक अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझेंगे, तब तक इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं हो सकता।

problem of stray cattle will not end by relying only on government schemes

दूध बंद, चारा बंद

एक बार जब गाय दूध देना बंद कर देती है, तो गाय को खिलाना और उसका रखरखाव करना पशुपालक पर वित्तीय बोझ बन जाता है और वह मवेशी के रखरखाव का खर्च वहन नहीं करना चाहता। कई मामले में उसकी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं होती कि वह अपनी जेब से पशुओं का चारा खरीद सके। क्योंकि अनुत्पादक मवेशियों के रखरखाव के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है।

बढ़ते मशीनीकरण के कारण कृषि क्षेत्र में बैलों का उपयोग लगभग बंद सा हो गया है। ऐसे में किसान गाय की बछिया का तो फिर भी ख्याल कर लेते हैं पर बछड़ों को आवारा छोड़ देते हैं। भारत के अधिकांश हिस्सों में गाय का वध करना गैरकानूनी है, क्योंकि गाय को हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है। यदि बैलो के उपयोग के लिए किसानों को प्रोत्साहित नहीं किया गया तो यह समस्या कम होने के बजाय बढ़ेगी ही।

आवारा मवेशियों के कारण ट्रैफिक जाम और सड़क दुर्घटनाएँ

भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में वैसे ही सड़क दुर्घटनाओं की संख्या हर दिन बढ़ रही है। इसके कारणों में एक प्रमुख कारण पशुओं की वाहन से टक्कर भी है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और बिहार जैसे प्रदेशों में ये घटनाएं ज्यादा हैं। खासकर दुपहिया वाहनों के साथ पशुओं के टकराने की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

आवारा पशुओं की समस्या के समाधान तो कई हैं, लेकिन सबसे पहले लोगों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है। किसानों और गोपालकों के मन में यह श्रद्धा होनी चाहिए कि गोवंश का रखरखाव मनुष्यों के लिए भी जरूरी है। केंद्रीय पशुपालन मंत्री ने तो यहां तक कहा कि बूढ़ी गायों की मां के रूप में सेवा करनी चाहिए। खैर इस भावना को व्यक्तिगत भावना के रूप में छोड़ भी दें तो भी यह मन में विचार तो रखना ही चाहिए कि गोवंश का उपयोग केवल दूध में नहीं है। बल्कि खेती के लिए खाद और ढुलाई में बैलों का उपयोग धन और पर्यावरण को भी बचाता है। मशीन का उपयोग काम को जल्दी तो निपटा सकता है पर लंबे समय के लिए हमारे पर्यावरण को भी नुकसान हो सकता है।

आजकल देश ही नहीं, विदेशों में भी भारतीय नस्लों की गाय की मांग होने लगी है। जो लोग बछड़ों को अनुपयोगी मानकर सड़क पर छोड़ देते हैं वे इन्हीं बछड़ों से सीमेन बैंक बना सकते है। अनुसंधान संस्थानों को भी देशी नस्लों के वीर्य का उपयोग करना चाहिए। दूसरा दृष्टिकोण रिवर्स क्रॉसब्रीडिंग हो सकता है, जहां भ्रूण स्थानांतरण तकनीक के माध्यम से शुद्ध स्वदेशी गायों का उत्पादन करने के लिए क्रॉसब्रीड किस्मों को पालक माताओं के रूप में उपयोग किया जाता है।

विदेशी नस्लों की तुलना में भारतीय नस्लों को बढ़ाने में फायदा है क्योंकि वे प्राकृतिक रूप से ए 2 गुणवत्ता वाला दूध पैदा करती हैं जो मनुष्यों के लिए फायदेमंद है। देशी गाय के दूध में संयुग्मित लिनोलिक एसिड, ओमेगा 3 फैटी एसिड और सेरेब्रोसाइड्स जैसे कुछ उपयोगी घटक भी उच्च स्तर पर होते हैं।

देशी मवेशियों के गोबर में बहुत सारे उपयोगी बैक्टीरिया होते हैं जो रोगजनक उपभेदों से होने वाली बीमारियों को रोक सकते हैं और इसे प्राकृतिक शोधक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गाय का गोबर सूक्ष्म वनस्पतियों का एक समृद्ध स्रोत है जिसका उपयोग प्रोबायोटिक्स के रूप में किया जा सकता है।

गाय के गोबर का उपयोग किण्वन और गैसीकरण प्रक्रियाओं के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है। गाय के गोबर की राख का उपयोग पारंपरिक सामग्री के आंशिक प्रतिस्थापन और अवशोषक के रूप में निर्माण में किया जा सकता है।

गोमूत्र का उपयोग कृषि में जैव कीटनाशक, उपज बढ़ाने वाले और मिट्टी के कायाकल्प के अलावा बीमारियों को ठीक करने, मच्छरों को नियंत्रित करने, कीटाणुशोधन और मछली के भोजन के रूप में किया जा सकता है।

गाय संरक्षण हेतु सरकारी पहल

गोवंश को संरक्षित व प्रोत्साहन देने के लिए सरकारें अनेक योजनाएं चला रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने जहां निराश्रित गोवंष हेतु हजारों गोआश्रय स्थल खोले हैं। पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश की अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 26 जुलाई 2023 तक 6889 गोआश्रय स्थल खोले गये हैं, जिसमें 11.89 लाख गोवंश संरक्षित हैं। इसके साथ-साथ देसी गायों के प्रोत्साहन हेतु 'मुख्यमंत्री सहभागिता योजना' के तहत 1.85 लाख गोवंश गोपालकों को सौपे गये हैं। इन गोपालकों व गोआश्रय स्थलों को गोवंश के भरण-पोषण हेतु पहले 30 रूपये प्रति गोवंश दिये जाते थे, जो अब 50 रूपये कर दिये गये हैं। वहीं 'नन्द बाबा दुग्ध मिशन' योजना के तहत भी देसी नस्ल की गायों को प्रोत्साहन हेतु गोपालक को 10 से 15 हजार रूपये प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।

मध्य प्रदेश सरकार भी देसी नस्ल की गाय पालने के लिए गोपालक को 50 प्रतिशत सब्सिड़ी (अनुदान) दे रही है। गोवंश के भरण-पोषण के लिए 900 रूपये प्रति माह का प्रावधान मध्य प्रदेश सरकार ने किया है।
इन सब योजनाओं के बावजूद भी लाखों की संख्या में गोवंश बेसहारा होकर सड़कों, रेलवे लाईन, खेतों आदि में भटकने पर विवश हैं। जहां उनके साथ अनेकों दुर्घटनाएं हो रही हैं।

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