झालर, मोमबत्‍ती के आगे दीया हुआ लाचार

दीयों के पर्व दीपावली की धूम शुरू हो चुकी है। बाजार सज चुके हैं और हर जगह दीवाली मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। दीपोत्सव में घर की देहरी और छत के छज्जों पर मिट्टी के बने दीये जलाने की परंपरा रही है, लेकिन आधुनिकता पसंद लोग दीये के स्थान पर झालर लाइट और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों का उपयोग करने लगे हैं, जिससे कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा चौपट हो रहा है। सच पूछिए तो मोमबत्‍ती और झालर के आगे दीया लाचार सा दिखाई दे रहा है।

राजधानी के बुजुर्ग दशरथ लाल मिश्रा बताते हैं कि प्राचीन परंपराओं के अनुसार दीपोत्सव के अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग दीया लेकर एक दूसरे के घर दीपदान करने जाते थे। इसलिए कुम्हार द्वारा बनाए मिट्टी के दीये खरीदे जाते थे, साथ ही माता लक्ष्मी की मूर्ति, ग्वालिन कुरसा आदि मिट्टी से निर्मित पूजन साम्रगी भी खरीदी जाती थी। इससे कुम्हारों का व्यवसाय भी अच्छा चलता था, पर अब इनका स्थान आधुनिक झालर और मोमबत्तियों ने ले लिया है।

आधुनिक ढंग से दिवाली मनाए जाने के चलते दीया और ग्वालिन बनाने वाले कुम्हारों का परंपरागत व्यवसाय पहले की अपेक्षा काफी मंदा हो चला है। फिर भी कुम्हार लक्ष्मी पूजा के लिए मां लक्ष्मी की मूर्ति, ग्वालिन दीया आदि बनाने में लगे हुए हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले दीपावली के मौके पर नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर दीप दान करने की परंपरा से कुम्हारों का हजारों रुपये का व्यवसाय होता था, लेकिन अब बाजार में उपलब्ध चीनी सामान कुम्हारों के परंपरागत व्यवसाय में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है। उनके बनाए मिट्टी के दीयों की मांग कम हो गई है।

कम हुआ क्रेज़

कम हुआ क्रेज़

सिमगा के कुंभकार संतराम, दुकालू और शिवप्रताप ने बताया कि वे पिछले कई सालों से मूर्ति व दीया आदि बना रहे हैं। लेकिन अब लोगों का क्रेज़ कम हो रहा है।

परम्‍परा

परम्‍परा

तमाम शहरों में पसरा लगाकर व घर में भी बेचने की परम्‍परा हैं।

तमाम परिवार निर्भर

तमाम परिवार निर्भर

इसी व्यवसाय से उनके परिवार का जीवन यापन होता है, लेकिन पिछले कुछ सालों से आधुनिक बाजार ने उनका धंधा चौपट कर दिया है।

कम हो रहे ग्राहक

कम हो रहे ग्राहक

ग्राहक हर साल लगातार कम होती जा रही है। इस बार उनके बनाए दिए काफी मात्रा में जमा है।

रोजगार पर असर

रोजगार पर असर

कुम्‍हारों का रोजगार खत्म हो रहे हैं तो कहीं संस्कृति का क्षय हो रहा है, जरूरत है आज हमें अपनी इन संस्कृतियों को सहेज कर रखने की।

प्राचीन परम्‍परा

प्राचीन परम्‍परा

बहरहाल, प्राचीन परंपराओं के विलुप्त होते जाने से समाज में कई तरह कि परेशानियां आ रही हैं।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+