पाक प्रधानमंत्री की मोहब्बत की निशानी मुजफ्फरनगर में
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) इन दिनों पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की मुजफ्फरनगर की संपत्ति की खबरें चर्चाओं में है। उनके कथित वंशजों ने आधे मुजफ्फरनगर पर दावा जताया है। इस पर जांच बैठा दी गई है।

लियाकत अली खान दिल्ली में जिन्ना के नाम से फुटबॉल चैंपियनशिप भी करवाते थे।ये होती थी इंडियन एक्सप्रेस से सटे मैदान में। उसमें भाग लेने वाले एक शख्स भगवान सहाय से मैं बरसों पहले मिला भी था। ने यंगमैन क्लब से खेलते थे। खान साहब दिल्ली के तारीखी एग्लों एराबिक स्कूल के मैनेजर भी थे। ये स्कूल अजमेरी गेट में है। उनका बंगला तिलक मार्ग में था, अब वहां पर पाक के सफीर रहते हैं।
कुंजपुरा से संबंध
खान का संबंध करनाल से जुड़े एक छोटे से शहर कुंजपुरा से था। उनकी बेगम का नाम शादी के बाद हो गया था गुले-राना। उनका दिल्ली का बंगला उन्हीं के नाम पर रखा गया। एक और बात। उनकी उसी जगह 1951 में हत्या कर दी गई जिधर बाद में बेनजरीर को मारा था। ये मनहूस जगह रावलपिंडी में है। हत्या की गुत्थी कभी नहीं सुलझी। बेगम राना ने दिल्ली में कई बार शराबबंदी के खिलाफ धरने भी तब दिए थे।
मुजफ्फरनगर
लियाकत अली को संपत्ति के बंटवारे में मुजफ्फरनगर मिला। उन्होंने प्रतिष्ठित कुमायुंनी ब्राह्मण परिवार की लड़की शीला ईरीन पंत को संग-ए-हयात बनाया। ईरीन बहुत अच्छी कविताएं लिखती थीं। प्रगतिशील विचारों की थीं। समाजसेवा में बहुत आगे थीं। वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि आज भी पहाड़ों पर लोग उन्हें अल्मोड़ा का नाम रोशन करने वाली कुछ जानी-मानी शख्सियतों में याद करते हैं।
लखनऊ में पढ़ी
ईरीन के पिता ब्रिटिश सेना के मेजर जनरल थे। नाम था हेक्टर पंत। वर्ष 1887 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। ईरीन की पढाई लखनऊ में हुई थी। वह लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ती थीं। किसी चैरिटी प्रोग्राम के लिए टिकट बेंच रही थीं। उनके पास दो टिकट बचे थे। वह सड़क पर लोगों को रोक-रोक कर टिकट खरीदने का आग्रह कर रही थीं। इसी बीच लियाकत अली खां की बग्घी गुजरी तो उसे भी रोका। नवाबजादा से टिकट खरीदने का आग्रह किया।
दीवाने हो गए मियां
लिकायत अली पहली नजर में ही दीवाने हो गये। उन्होंने दोनों टिकट खरीदने को शर्त रखी कि कार्यक्रम में वह उनके साथ बैठे तो दोनों टिकट खरीद लेंगे। वह मान गयी। लियाकत ने दोनों टिकट खरीद लिए। यही से दोनों की दिल्लगी शुरू हुई जो बाद में निकाह में तब्दील हो गई। फिर वह हो गई गुले- राना। लियाकत अली ने अपनी इस बेगम के लिए मुजफ्फरनगर में आलीशान कोठी तामीर करवाई जिसका नाम कहकशां रखा, जो आज भी सुरक्षित है और उसमें एक स्कूल चलता है।
मादरे-वतन
ईरीन को पाकिस्तान में मादरे ए वतन का खिताब भी मिला। राजनीतिक तौर पर वह पाकिस्तान के निर्माण में सक्रिय थीं। बाद में जुल्फिकार अली भुट्टो ने उन्हें काबिना मंत्री बनाया। वह सिंध की गर्वनर भी बनीं। वर्ष 1990 में उनका निधन हुआ।












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