Prime Minister Museum: क्या है फ्लैग स्टाफ हाउस के नेहरू मेमोरियल और अब ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय' बनने की कहानी
केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में 15 जून 2023 को फैसला लिया गया कि नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी (NMML) का नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री म्यूजियम और सोसाइटी' किया जाये। इस मामले पर इस एनएमएमएल सोसाइटी के उपाध्यक्ष व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देश के सभी प्रधानमंत्रियों को बराबर दिखाया जाना चाहिए। इंद्रधनुष को सुंदर बनाने के लिए उसके सभी रंगों को बराबर दिखाया जाना जरूरी है।
लुटियंस की इंपीरियल कैपिटल का हिस्सा था तीन मूर्ति भवन
तीन मूर्ति भवन को 1929-30 में ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसल ने डिजाइन किया था। आजादी से पहले तीन मूर्ति भवन एडविन लुटियंस की इंपीरियल कैपिटल (शाही राजधानी) का हिस्सा हुआ करता था। इस भवन को शुरू में फ्लैग स्टाफ हाउस कहा जाता था क्योंकि भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ के निवास और आधिकारिक कामों के लिए इसे बनाया गया था।

आजादी के अमृत महोत्सव वेबसाइट पर दिये जानकारी के मुताबिक 1947 में देश की आजादी के बाद यह तय किया गया था कि स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री अब तीन मूर्ति भवन में निवास करेंगे। इसके बाद तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल (सर क्लाउड) औचिनलेक को तब तीन मूर्ति के अलावा अन्य आवास मुहैया कराया गया। इसके बाद में इस भवन का नाम तीन मूर्ति भवन कर दिया गया। आजादी के एक साल बाद 2 अगस्त, 1948 में जवाहरलाल नेहरू का यह आधिकारिक निवास बनाया गया।
क्यों रखा गया तीन मूर्ति भवन नाम
दरअसल, जिस जगह यह भवन स्थित है। वहां बाहर की ओर गोल चक्कर पर बीचों-बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किये हुए तीन सैनिकों की मूर्तियां लगी हुई हैं। इसे दूसरे विश्व युद्ध में लड़े सैनिकों का स्मारक माना जाता है। इस स्मारक (तीन मूर्ति) की वजह से ही भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड़ा।
यह तीन मूर्ति भवन मूल रूप से ऑस्ट्योर क्लासिक शैली में निर्मित है। इसी शैली से निर्मित दूसरा भवन दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस भी है। वैसे इस तीन मूर्ति को जो ब्रिटिश मूर्तिकार लियोनार्ड जेनिंग्स ने अपने नाम की ख्याति के लिए बनवाया था। वैसे ये तीनों सैनिकों की मूर्ति का समूह मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद राज्य के शस्त्रधारकों का प्रतिनिधित्व करता था।
करीब 16 साल तीन मूर्ति भवन में रहे नेहरू
2 अगस्त 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए यह निवास स्थान बनाया गया। यहां पर प्रधानमंत्री नेहरु अपनी बेटी इंदिरा गांधी, दामाद फिरोज गांधी और उनके दो बच्चे राजीव व संजय गांधी के साथ रहते थे। यहां पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तकरीबन 16 साल तक रहे थे। 27 मई, 1964 को प्रधानमंत्री नेहरू की मौत भी इसी तीन मूर्ति भवन में हुई थी।
नेहरू की मौत के बाद बना संग्रहालय
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद भारत सरकार ने यहां संग्रहालय बनाने का फैसला लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने इस भवन को भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू को समर्पित करने की घोषणा की। उन्हीं के नाम पर यहां एक संग्रहालय और पुस्तकालय बनाया गया।
14 नवंबर, 1964 को प्रधानमंत्री नेहरू की 75वीं जयंती थी। इसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन ने तीन मूर्ति भवन को देश को समर्पित किया। साथ ही भवन में नेहरू स्मारक संग्रहालय का उद्घाटन किया गया। इसके 2 साल बाद 1 अप्रैल 1966 को एनएमएमएल सोसाइटी बनायी गयी थी, ताकि संस्थान को सही तरीके से चलाया जा सके।
जब तीन मूर्ति छोड़ चले गये फिरोज गांधी
एक किस्सा यह भी है कि इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी तीन मूर्ति भवन छोड़कर चले गये थे और मरते दम तक नहीं लौटे। जनसत्ता ने मशहूर पत्रकार इंद्र मल्होत्रा के हवाले से लिखा है कि 1959 में नेहरू ने असंवैधानिक तरीके से केरल में कम्यूनिस्ट सरकार को गिराया था। उनके फैसले के कारण फिरोज और इंदिरा में काफी झगड़ा हुआ था।
इसे लेकर फिरोज गांधी ने खुद इंद्र मल्होत्रा को बताया कि आज मेरे और इंदिरा के बीच बहुत झगड़ा हुआ है। आज से मैं कभी भी प्रधानमंत्री आवास में नहीं जाऊंगा। फिरोज गांधी मरते दम तक अपनी बात पर कायम रहे। हालांकि, 8 सितंबर 1960 को जब उनकी मौत हुई तो उनके पार्थिव शरीर को तीन मूर्ति भवन लाया गया था।
इंदिरा गांधी ने दोबारा प्रधानमंत्री आवास बनाना चाहा
पुपुल जयकर द्वारा लिखी किताब 'इंदिरा गांधी ए बायोग्राफी' के मुताबिक प्रधानमंत्री नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। इसी दौरान इंदिरा गांधी को यह तीन मूर्ति आवास भारी मन से छोड़ना पड़ा। इंदिरा गांधी को तत्कालीन शास्त्री मंत्रिमंडल में सूचना प्रसारण मंत्री का पद दिया गया।
प्रधानमंत्री शास्त्री की ताशकंद में रहस्यमयी मौत के बाद 1966 में इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। तब इंदिरा गांधी को लगा कि सफदरजंग रोड के जिस घर में वह रह रही थीं, वह उनके आवास और काम करने के लिए काफी छोटा पड़ेगा तो उन्होंने फिर से तीन मूर्ति भवन के बड़े आवास को ही प्रधानमंत्री का आवास बनाने का मन बनाया।
बड़ी बात यह थी, इस दौरान उस तीन मूर्ति भवन के कैंपस के एक बंगले में सरोजनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू रहा करती थी। ऐसा कहा जाता है कि पद्मजा नायडू नेहरू परिवार की बेहद करीबी थी। तब इंदिरा गांधी को पद्मजा नायडू ने तीन मूर्ति भवन को प्रधानमंत्री आवास बनाने से साफ मना कर दिया और कहा कि वह राष्ट्रपति भवन एस्टेट में खाली पड़े दो बड़े आवासों को पीएम रेजीडेंस क्यों नहीं बना लेती? आखिर इंदिरा को अपना आवास सफदरजंग रोड पर ही रखना पड़ा।












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