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पहले कांग्रेस, माकपा और फिर भाजपा, जानें गोरखा बहुल दार्जिलिंग लोकसभा सीट का क्या है राजनैतिक इतिहास?

Darjiling Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव 2024 के दूसरे चरण में 13 राज्यों की 89 सीटों पर 26 अप्रैल को मतदान होना है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में हिंसा का इतिहास देखते हुए चुनाव आयोग ने यहाँ सात चरणों में मतदान कराने का निर्णय लिया है।

दूसरे चरण में राज्य की दार्जीलिंग, रायगंज और बालुरघाट सीटों पर मतदान होना है।

lok sabha chunav

अपनी खूबसूरती के प्रसिद्ध है दार्जिलिंग

पश्चिम बंगाल का हिल स्टेशन दार्जिलिंग अपनी खूबसूरती के लिए विश्वविख्यात है। इस लोक सभा सीट में कलिम्पोंग, दार्जिलिंग, कर्सियांग, माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी, सिलीगुड़ी, फांसीदेवा और चोपड़ा सहित सात विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। दार्जिलिंग में बड़ी संख्या में अप्रवासी मजदूर रहते हैं। जनगणना 2011 के मुताबिक इस संसदीय क्षेत्र की आबादी 2201799 है, जिनमें 66.68% लोग गांवों में रहते हैं जबकि 33.32% आबादी शहरी है।

इस लोकसभा सीट पर गोरखा समुदाय का प्रभाव है। माना जाता है कि वे जिसका भी समर्थन कर देते हैं, वही पार्टी इस सीट को जीतती है। आपको बता दें कि इस सीट को बंगाल की मौजूदा सत्ताधारी पार्टी टीएमसी कभी नहीं जीत पाई है और गोरखा समुदाय की मदद से बीजेपी यहाँ मजबूत स्थिति में है।

पहले दो आम चुनाव में कांग्रेस, फिर निर्दलीय महिला

1952 में हुए पहले आम चुनाव में दार्जिलिंग सीट अस्तित्व में नहीं थी। वर्ष 1957 में दूसरे लोकसभा चुनाव में इस सीट को लोकसभा सीट का दर्ज़ा मिला और कांग्रेस के थ्योडोर मेनन यहां के पहले निर्वाचित सांसद बने। 1962 के चुनावों में भी थ्योडोर मेनन ही सांसद चुने गए थे।

जब देश में महिला सांसद कम ही थीं, तब 1967 के लोकसभा चुनावों में दार्जीलिंग के लोगों ने अपने लिए पहली निर्दलीय व पहली महिला सांसद चुनी, जिनका नाम था मैत्रेयी बोस। इस चुनाव में उन्हें 2,58,528 वोट मिले, और वह अपने प्रतिद्वंदी को 1831 वोटों से हराकर विजयी हुई।

पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव

1971 के लोकसभा चुनाव में पहली बार एक स्थानीय कम्युनिस्ट नेता रतन लाल को दार्जिलिंग की जनता ने संसद पहुंचा दिया। चुनाव में उन्हें 2 लाख 68 हज़ार 931 वोट मिले और 12277 वोटों से जीत कर वह कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के टिकट पर सांसद बने।

लेकिन 1975 में इमरजेंसी के कारण कांग्रेस के खिलाफ गुस्से का असर यहाँ बेअसर करते हुए 1977 की जनता लहर में भी कांग्रेस के कृष्ण बहादुर छेत्री 18480 वोटों से माकपा के उम्मीदवार को हराकर सांसद बने।

जनता पार्टी सरकार गिरने के बाद 1980 में हुए लोकसभा चुनावों में इमरजेंसी का गुस्सा भुलाकर देश की जनता ने जहाँ कांग्रेस को बहुमत दिया, वहीँ इस सीट पर माकपा के स्थानीय नेता आनंद पाठक को दार्जीलिंग की जनता ने 18161 वोटों से जिताकर अपना सांसद निर्वाचित किया। इसके बाद 1984 के चुनावों में भी 5,61,738 वोट लेकर 1389 वोटों के मामूली अंतर से जीतकर फिर सांसद बने।

गोरखा फ्रंट का दबदबा बढ़ा

1986 में गोरखालैंड आंदोलन के कारण से यहाँ राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कम होने लगा और दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय पार्टी गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ ) का दबदबा बढने के कारण वहां 1989 और 1991 के चुनावों में जीएनएलएफ के समर्थन से कांग्रेस के उम्मीदवार इंद्रजीत खुल्लर ने लगातार दो बार बम्पर जीत हासिल की। वे 1989 के चुनावों में 1 लाख 45 हज़ार 105 वोटों से और 1991 में 51 हज़ार 897 वोटों से जीते।

आम चुनाव 1996, 1998 और 1999

1996 के आम चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। उस समय जीएनएलएफ का झुकाव कांग्रेस से हटकर राज्य की सत्तारूढ़ माकपा की तरफ हो गया। जिसकी वजह से 1996 से 1998 तक आर.बी. राई, 1998 से 99 तक आनंद पाठक और 1999 से 2004 तक एस.पी. लेप्चा तीनों ही स्थानीय नेता माकपा से सांसद बने।

दार्जिलिंग में 8 वर्षों से सत्ता से दूर रहने के बाद कांग्रेस ने 2004 के चुनावों में जीएनएलएफ से अपने रिश्ते सुधारे। इससे कांग्रेस के स्थानीय उम्मीदवार को फायदा हुआ और दावा नबरुला 1,01,416 वोटों से जीत कर दार्जीलिंग के सांसद बने।

गोरखा फ्रंट में बिखराव

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले दार्जिलिंग की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ और जीएनएलएफ, जो 19 सालों से वहां की राजनीति में अहम भूमिका निभाती थी, उसके दो टुकड़े हो गए और विमल गुरुंग के नेतृत्व में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (गोजमुमो) नाम से नया दल अस्तित्व में आया। जिसके बाद विमल गुरुंग और उनके गोजमुमो का दबदबा दार्जिलिंग के पहाड़ में ऐसा छाया कि 2009 से 2019 तक लगातार गोजमुमो के समर्थन से भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर जीत रही है।

2009 में भाजपा के दिग्गज नेता जसवंत सिंह 9 लाख 67 हज़ार 400 वोट प्राप्त कर वहां के सांसद बने। उल्लेखनीय है कि जसवंत सिंह राजस्थान के निवासी थे और वहां से लोक सभा सांसद भी रह चुके थे। लेकिन वे कुछ वर्षों तक भारतीय सेना में काम कर चुके थे और दार्जिलिंग में भूतपूर्व सैनिकों की अच्छी संख्या होने के कारण जसवंत सिंह को राजस्थान से दूर पश्चिम बंगाल के हिल स्टेशन से चुनाव में उतारा गया और वे विजयी हुए।

2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी उम्मीदवार एस एस अहलुवालिया ने 4,88,257 वोट प्राप्त कर जीत हासिल की। जबकि प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बाइचूंग भूटिया को 2,91,018 वोट मिले। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के राजू बिस्टा ने 7,50,067 वोटों के साथ जीत हासिल की। जबकि तृणमूल कांग्रेस के अमर सिंह राय 3,36,624 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे और कांग्रेस के शंकर मालाकार 65,186 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

2024 में क्या है सीट का हाल

दार्जिलिंग लोकसभा सीट से भाजपा ने अपने सांसद राजू बिस्टा की टिकट काट मणिपुर के युवा उद्यमी राजू सिंह बिष्ट को उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी उम्मीदवार को गोजमुमो (विमल गुरुंग गुट) व जीएनएलएफ का संयुक्त रूप से समर्थन है। वहीँ राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने स्थानीय अमर सिंह राई को और कांग्रेस ने सिलीगुड़ी के शंकर मालाकार को उम्मीदवार बनाया हैं। माकपा ने दार्जिलिंग के ही रहने वाले और पूर्व राज्यसभा सांसद समन पाठक को टिकट दी है। अब देखना यह है कि क्या बीजेपी फिर अपना परचम लहरा पायेगी या अन्य कोई इस सीट से सांसद बनेगा?

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