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Army at Siachen: कैसी होती है मायनस 50 डिग्री में सियाचिन में तैनात भारतीय सेना के जवानों की जिंदगी

सियाचिन दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध स्थलों में से एक है और यहां पर न्यूनतम पारा मायनस 50 डिग्री से भी नीचे चला जाता है। बावजूद इसके, भारतीय सेना ऐसी जानलेवा ठंड में भी देश की सीमा की रक्षा कर रही है।

life of Indian soldiers in Siachen at -50 degree Celsius temperature cold

Army at Siachen: भारतीय सेना की महिला अधिकारी कैप्टन शिवा चौहान को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में से एक सियाचिन में भारतीय सेना की 'फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स' में 'कुमार पोस्ट' पर तैनात किया गया है। कैप्टन शिवा पहली भारतीय महिला सैनिक हैं जिन्हें सियाचिन में समुद्री तल से लगभग 18,000 फीट से भी ज्यादा ऊंचाई पर पोस्ट किया गया है।

सियाचिन की भौगोलिक स्थिति

सियाचिन ग्लेशियर हिमालय में पूर्वी काराकोरम रेंज में स्थित एक बड़ा ग्लेशियर है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा पर फैला हुआ है। यह काराकोरम में सबसे लंबा ग्लेशियर है और दुनिया के नॉन-पोलर क्षेत्रों में दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर है। भारत के पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में स्थित सियाचिन ग्लेशियर लगभग 76 किलोमीटर (47 मील) लंबा है। यह समुद्र तल से लगभग 5,753 मीटर (18,875 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है और अत्यधिक ठंडे मौसम के लिये जाना जाता है। सियाचिन में पारा मायनस 50 डिग्री तक भी पहुँच जाता है।

सियाचिन की सामरिक भूमिका

शक्सगाम घाटी, काराकोरम दर्रा और अक्साई चिन के मध्य में स्थित होने के कारण सियाचिन रणनीतिक रूप से भारत, पाकिस्तान और चीन तीनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान और चीन द्वारा की जाने वाली घुसपैठ को रोकने के लिये सियाचिन पर भारत का नियंत्रण बेहद जरूरी है। पाकिस्तान और भारत के बीच लाइन ऑफ कंट्रोल, पॉइंट NJ9842 सियाचिन ग्लेशियर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

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    सियाचिन उत्तरी भारत के लिये ताजे पानी का एक प्रमुख स्रोत भी है, और सियाचिन पर नियंत्रण भारत को ग्लेशियर से पानी को सही तरह से नियंत्रित करने की सहूलियत देता है। सियाचिन एक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दरअसल, इसके पूर्व में काराकोरम पर्वत श्रृंखला में स्थित है, जहां K2 सहित दुनिया की कुछ सबसे ऊंची चोटियाँ है और इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत को सैन्य निगरानी रखने में सहायता देता है।

    सियाचिन में भारतीय सेना

    1984 में पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने का प्रयास किया था लेकिन भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया। इस प्रकार सियाचिन का नियंत्रण फिर से अपने पास ले लिया। वर्ष 1984 के बाद से सियाचिन ग्लेशियर पर कई बार सैन्य गतिरोध हुआ लेकिन अब भी दोनों देशों ने सियाचिन में मजबूत सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। वर्ष 1984 के बाद से भारत और पाकिस्तान ने अपने कई जवान सियाचिन ग्लेशियर पर ड्यूटी में गंवा दिए हैं।

    कितना खतरनाक है सियाचिन में ड्यूटी करना?

    सियाचिन में बहुत ही ज्यादा ठंड के कारण ड्यूटी करना सैनिकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण और अकाल्पनिक अनुभव हो सकता है। सियाचिन में सर्दियों में पारा लगभग मायनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। वहां अक्सर हिमस्खलन जिन्हें ऐवलांच भी कहा जाता है, होने का खतरा मंडराता रहता है और इसके कारण कई जवान भी शहीद हो चुके हैं।

    पर्यावरण द्वारा उत्पन्न चुनौतियों के अलावा, सियाचिन में तैनात सैनिकों को पाकिस्तानी सैनिकों के साथ टकराव के जोखिम का भी सामना करना पड़ता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र पर नियंत्रण को लेकर लंबे समय से विवाद है। साल 2018 में सरकार ने बताया था कि पिछले 10 सालों में सियाचिन में भारतीय सेना के 163 जवान शहीद हुए थे।

    सियाचिन में बाहरी दुनिया के साथ संचार सीमित है, और सैनिकों को सैटेलाइट फोन और लंबी दूरी के संचार के अन्य रूपों पर निर्भर रहना पड़ता है। एक मीडिया समूह को एक रिटायर्ड भारतीय जवान ने बताया कि सियाचिन में खाने के अलावा सब कुछ फ्रोज़न होता है भले ही वो सूप हो या जूस हों। उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 2016 में एक तस्वीर वायरल हुई थीं जिसमें आर्मी के जवान जमे हुए सूप को गर्म कर पी रहे थे।

    एक इंटरव्यू में भारतीय सेना के एक रिटायर्ड जवान ने बताया की पानी के लिए जवान बर्फ को पिघलाकर और फिर उबालकर पीते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सियाचिन में हर दिन खाने के सामान की डिलीवरी सुबह 5 बजे से 7 बजे के बीच हेलीकाप्टर से होती है क्योंकि उसके बाद सियाचिन में हालात इतने खराब हो जाते हैं कि वहाँ पर हेलिकॉप्टर भी नहीं उड़ सकता।

    प्रधानमंत्री मोदी का सियाचिन दौरा

    2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री चुनकर आये तब उन्होंने अपनी पहली दिवाली सियाचिन में सेना के साथ मनाई थी। उस अवसर पर उन्होंने कहा था कि आज हम शांति से इसलिए सो रहे हैं क्योंकि ये लोग दिन-रात जाग रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भी सियाचिन का दौरा किया था और वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सियाचिन में कुछ समय बिताया।

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