Kisan Andolan: किसान आंदोलन और सरकार की मजबूरी
Kisan Andolan: केंद्र सरकार पर अपनी मांगें मनवाने और दबाव बनाने के लिए पंजाब और पड़ोसी राज्यों के किसान आंदोलन कर रहे हैं। हालांकि सरकार किसानों की बात सुनने के लिए तैयार है, और अभी तक केंद्रीय मंत्रियों ने किसानों के साथ कई दौर की बातचीत भी की है, पर किसानों की जो मांगें हैं, वे पूरी करना सरकार के लिए काफी कठिन है।
सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी, स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले को लागू करने, किसानों के लिए पूर्ण ऋण माफी, किसानों और मजदूरों के लिए पेंशन, एक साथ लागू करना संभव कैसे होगा, यह बड़ा प्रश्न उठ रहा है।

विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा और किसान मजदूर मोर्चा इस बात पर अड़े हैं कि मांग मनवाए बिना वे वापस नहीं जाएंगे। दिल्ली पहुँच कर वहाँ धरना देंगे। पुलिस ने भी प्रदर्शनकारियों को नई दिल्ली में प्रवेश करने से रोकने के लिए सारे इंतजाम कर लिए हैं। क्या आगे टकराव बढ़ेगा या फिर कोई रास्ता निकलेगा?
क्या है किसानों की मांग!
● किसान सभी फसलों के लिए एमएसपी की गारंटी देने वाला कानून चाहते हैं। जब किसान 2021 में निरस्त किए गए कृषि कानूनों के खिलाफ अपना आंदोलन वापस लेने पर सहमत हुए, तो किसानों ने एमएसपी अधिनियम को एक शर्त के रूप में रखा।
● ऋण माफी के लिए किसान 2006 में पेश की गई स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का कार्यान्वयन चाहते है।
● किसान विकासात्मक परियोजनाओं के लिए विभिन्न प्राधिकरणों द्वारा अधिग्रहित भूमि का मुआवजा, और उनके परिवारों के लिए विकसित भूमि पर 10 प्रतिशत आवासीय भूखंडों के आरक्षण की मांग कर रहे है।
● किसान मांग कर रहे हैं कि भारत विश्व व्यापार संगठन से अपना नाम वापस ले और सभी मुक्त व्यापार समझौतों पर प्रतिबंध लगा दे।
● किसान 3 अक्टूबर, 2021 को लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के लिए कथित जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, जब उनके वाहन से कुचले जाने के बाद चार प्रदर्शनकारी किसानों की मौत हो गई थी।
● किसानों और खेत मजदूरों को पेंशन की मांग कर रहे है। किसानों की मांग है कि जब वो 60 साल का हो जाए तो उन्हें ₹10,000 मासिक पेंशन दी जाए।
● किसान चाह रहे हैं कि बिजली संशोधन विधेयक 2020 बिल को खत्म किया जाए क्योंकि किसान बिजली के बढ़ते निजीकरण से डरते हैं और समय पर सब्सिडी का भुगतान करने के लिए राज्य सरकारों पर भरोसा नहीं करते हैं।
● किसानों की यह भी मांग है कि 2020-2021 आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों को मौद्रिक मुआवजा दिया जाए और उनके परिवार के एक सदस्य को रोजगार भी दिया जाए।
● किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि मनरेगा योजना के तहत उन्हें ₹700 दैनिक मजदूरी के साथ प्रति वर्ष 200 दिन का रोजगार मिले।
● किसान नकली बीज, कीटनाशक और उर्वरक बनाने वाली कंपनियों पर सख्त जुर्माना लगाए जाने की मांग कर रहे है और बीज की गुणवत्ता में सुधार चाहते हैं।
● किसानों की मांग है कि मिर्च, हल्दी जैसे मसालों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन हो।
● किसानों की आखिरी मांग यह है कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का अधिकार सुनिश्चित हो और कंपनियों को आदिवासियों की जमीन लूटने से रोका जाए।
सरकार की प्रतिक्रिया!
खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा सहित केंद्रीय मंत्रियों ने किसानों की मांगों को पूरा करने और "दिल्ली चलो" मार्च को रोकने के प्रयास में किसान नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत की है। चर्चा के दौरान सरकार 2020-21 के आंदोलन के दौरान दर्ज किसानों के खिलाफ मामले वापस लेने और विरोध प्रदर्शन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों को मुआवजा देने पर सहमत हुई। हालांकि, किसान अन्य प्रमुख मांगो के अलावा अपनी फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग पर अड़े हुए हैं। इधर सरकार ने भी कहा है कि किसानों की प्रमुख मांग, यानि गारंटीकृत न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करना संभव नहीं होगा।
2024 का किसान आंदोलन 2020 के किसान आंदोलन से कैसे अलग!
मांग, नेतृत्व और सरकारी कार्रवाई के मामले में 2024 का किसान आंदोलन 2020 के किसान आंदोलन से अलग है। 2020 में किसानों ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध किया, जिन्हें बाद में सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया। हालांकि, 2024 में प्रमुख मांग सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी है।
साथ ही पूर्ण ऋण छूट, किसानों के लिए पेंशन, और स्वामीनाथन आयोग के सूत्र के कार्यान्वयन के साथ-साथ अन्य मांगें भी शामिल है। पहले के विरोध प्रदर्शन में दिल्ली और उसके आसपास भारी भीड़ उमड़ी और बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान हुआ। हालांकि, इस बार भीड़ कम उमड़ी है। इस बार प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए कंटीले तार, सीमेंट के बैरिकेड और कीलें लगाने जैसे उपाय किए। यहां तक कि दिल्ली में धारा 144 भी लगा दी गई है।
2020 में राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढ़ून्नी विरोध के दो प्रमुख नेता थे, लेकिन इस बार संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल और किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के महासचिव सरवन सिंह पंधेर विरोध की अगुवाई कर रहे हैं। 2020 के विरोध का नेतृत्व भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त किसान मोर्चा ने किया था। लेकिन इस बार विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व विभिन्न यूनियनों द्वारा किया जा रहा है।












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