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Kiran Bedi: पहली महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी को क्यों बोला गया ‘क्रेन बेदी’?

9 जून 1949 को अमृतसर में जन्मी किरण बेदी साल 1972 में देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनी।

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Kiran Bedi: किरण बेदी 1972 में सिविल सेवा की परीक्षा पास कर देश की पहली महिला पुलिस अधिकारी बनी थीं। इसके बाद उनका और सुर्खियों का एक नाता सा बन गया। कभी प्रधानमंत्री का चालान काटा तो तो कभी इंदिरा गांधी के साथ डाइनिंग टेबल पर दिखाई दी। जो भी हो मगर उन्हें एक बेहतरीन पुलिस अधिकारी के तौर पर पहचाना गया। अपने कार्यकाल में उन्होंने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किए। आपके बात दें कि वह लॉन टेनिस की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी भी रह चुकी हैं।

किरण बेदी के समय हुई थी पुलिस - वकीलों की झड़प

2019 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के बाहर वकीलों और पुलिसकर्मी की झड़प हो गयी थी। तब कुछ पुलिसकर्मी नारे लगाने लगे कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को किरण बेदी जैसा बन जाना चाहिए। उन्होंने ऐसा क्यों कहा, इसके लिए इतिहास में जाना होगा। दरअसल, जब किरण बेदी नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट की डीसीपी थी, उस समय भी पुलिस और वकीलों के बीच बड़े स्तर पर संघर्ष हुआ था। तब पुलिस ने उनके दफ्तर के बाहर इकट्ठा दिल्ली बार एसोसिएशन के सदस्यों पर लाठीचार्ज कर दिया था।

किरण बेदी ने बयान दिया था कि ये लोग बेहद आक्रामक थे और हमला भी कर सकते थे। इसलिए पुलिस को यह कार्रवाई करनी पड़ी। उस समय इस मामले ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। वकीलों ने पुलिस पर लोगों को भेजकर मारपीट करने के आरोप लगाए थे। इसके बाद 2015 में जब दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने किरण बेदी को सीएम कैंडिडेट बनाया तो वकीलों ने उस 1988 की घटना को यादकर उनके खिलाफ प्रदर्शन किया था।

किरण बेदी का उपनाम क्यों पड़ा 'क्रेन बेदी'

किरण बेदी ने अपनी आईपीएस सेवा के दौरान दिल्ली की सड़कों को जाम मुक्त कराने का जिम्मा उठाया था। इसके लिए वह अवैध रूप से और नो पार्किंग में खड़ी गाड़ियों को क्रेन से उठवा लेती थी। इतना ही नहीं डीसीपी ट्रैफिक रहते किरण बेदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सीबीआई के निदेशक तक की गाड़ियां उठा ली थी। उस समय वह सर्विस में बिल्कुल नयी थी। उन्हें दिल्ली की सड़कों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए यातायात व्यवस्था को समझने के लिए वह खुद अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली का नक्शा लेकर घूमती थी।

बेदी ने अपनी पुस्तक 'फियरलेस गर्वनेंस' के हिंदी अनुवाद 'निर्भीक प्रशासन' के विमोचन पर बात करते हुए बताया था कि एक दिन वह इसी अभियान को लेकर सड़क पर निकली थी तो भीड़ दौड़ने लगी। इसी बीच एक राहगीर ने रिक्शे वाले से पूछा कि क्या हुआ? तो उसने कहा कि 'क्रेन बेदी' आ गई है। इसी से उनका नाम 'क्रेन बेदी' पड़ गया।

पीएम इंदिरा गांधी ने किया था आमंत्रित

कई लोग कहते हैं कि किरण बेदी ने पीएम इंदिरा गांधी की कार का चालान किया तो इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मान देने के लिए आमंत्रित किया था। जबकि सच्चाई कुछ और ही है। तब दोनों की तस्वीर ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। उस तस्वीर की सच्चाई का खुलासा किरण बेदी ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था। उनका कहना है कि इंदिरा गांधी के साथ उनकी वह तस्वीर 1975 की है। यानी प्रधानमंत्री कार्यालय की गाड़ी का चालान काटने की घटना से करीब सात साल पहले की।

किरण बेदी ने बताया कि 1975 में जब उनको पहली नियुक्ति मिली तो उसी वर्ष 26 जनवरी को उन्होंने दिल्ली पुलिस के एक सैन्यदस्ते का नेतृत्व किया था। इस दल में वह अकेली महिला पुलिस अधिकारी थी। बाकी सब पुरुष थे। इसके बाद 26 जनवरी की परेड के अगले दिन उन्हें इंदिरा ने नाश्ते पर आमंत्रित किया था। इस बात का जिक्र किरण बेदी ने अपनी आत्मकथा 'आई डेयर' में भी किया है।

किरण बेदी को मिले अवॉर्ड

किरण बेदी की छवि एक कड़क अफसर की रही थी। अपनी सेवा के दौरान उनको कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें 1979 में उत्कृष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला। तिहाड़ जेल में किए गए उनके कार्यों के लिए उन्हें 1994 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया। उन्होंने नव ज्योति इंडिया फाउंडेशन और इंडिया विजन फाउंडेशन नाम से एनजीओ की स्थापना की।

उन्होंने लगभग 35 सालों तक एक महिला आईपीएस अफसर के रूप में अपनी सेवाएं देश को दी। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद वह 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ीं और 2015 को भाजपा में शामिल हुई। कुछ समय तक राजनीति में रहने के बाद उन्हें पुडुचेरी का लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया।

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