Kashi Vishwanath: काशी विश्वनाथ मंदिर के विध्वंस से भव्य कॉरिडोर तक, जानें पूरा इतिहास
काशी विश्वनाथ मंदिर, दुनिया भर के सनातनियों की आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र है। यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हाल के सालों में यह प्रसिद्ध मंदिर लगातार चर्चा में है। इसकी दो बड़ी वजह हैं। एक, इसका जीर्णोद्धार करके भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनना।
दूसरा, पांच महिलाओं की ओर से वाराणसी के कोर्ट में ज्ञानवापी परिसर स्थित शृंगार गौरी, भगवान गणेश, हनुमान जी और नंदी की दैनिक पूजा और अनुष्ठान करने की अनुमति मांगने से जुड़ा है।

इस मामले में नया अपडेट यह है कि वाराणसी की कोर्ट ने 21 जुलाई 2023 को विवादित हिस्से (वजूखाना) को छोड़कर पूरे ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का एएसआई सर्वे कराने की इजाजत दे दी है।
सैकड़ों साल पहले काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। इतिहास पर नजर डालें, तो साफ पता चलता है कि विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने और उसके पुनर्निर्माण की घटनाएं 11वीं सदी से शुरू होकर 18वीं सदी तक चलती रहीं। काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार क्षतिग्रस्त किया गया। बावजूद इसके महादेव का यह मंदिर हर बार, पिछली बार से ज्यादा भव्य बनकर भक्तों के लिए तैयार हुआ। आइए आपको काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास बताते हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास
11वीं सदी से इस मंदिर का इतिहास स्पष्ट तौर पर मिलता है। 11वीं और 12वीं शताब्दी के दौरान वर्तमान भारतीय राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों पर गाहड़वाल राजवंश ने शासन किया था। उनकी राजधानी वाराणसी में थी। एक संक्षिप्त अवधि के लिए इस राजवंश ने कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज) पर भी शासन किया। इस साम्राज्य के संस्थापक राजा चंद्रदेव (1086-1104) थे। उन्होंने तुर्कों के आक्रमण से काशी को सुरक्षित रखा था। वहीं, इस वंश के सबसे प्रतापी राजा गोविंद चंद्र (1114-1154) थे, जिन्होंने 1118 में सलार मसूद को हराया था।
साल 1193 में शिहाबुद्दीन उर्फ मुइजुद्दीन मुहम्मद गौरी ने कन्नौज पर हमले का प्रयास किया, लेकिन गाहड़वाल सेना से हुई इन झड़पों में गौरी हार गया। उसने फिर से एक संगठित सेना के साथ हमला किया। कुतुबुद्दीन ऐबक और मोहम्मद गौरी का गाहड़वाल वंश के राजा जयचंद के साथ फिरोजाबाद के समीप चन्दावर में युद्ध हुआ, जिसमें जयचंद पराजित हो गए और उन्हें मार डाला गया। इसके बाद इन तुर्कों ने बनारस तक जाकर लूटपाट मचाई। यहां करीब एक हजार मंदिरों को तोड़कर कुछ जगहों पर मस्जिदें बना दी।
1194 में तोड़े गए विश्वनाथ और अविमुक्तेश्वर मंदिर
1194 में हुए इस हमले में विश्वनाथ और अविमुक्तेश्वर, दोनों मंदिर तोड़े गए। इसके बाद करीब 50 साल तक ये मंदिर ऐसे ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े रहे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी में एक सूबेदार सैयद जमालुद्दीन को नियुक्त कर दिया। जयचंद्र की मौत के बाद, उनके बेटे हरिश्चंद्र का काशी के आसपास के इलाकों पर अभी भी राज बना हुआ था। उन्होंने बनारस को फिर से अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। इसकी वजह से 1198 में ऐबक ने एक बार फिर काशी पर हमला कर दिया।
13वीं शताब्दी में पुन: स्थापना
1206 में गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का सुल्तान बन गया। 1260 तक काशी पर तुर्कों का कब्जा बना रहा। हालांकि, इस बीच हिंदुओं का स्थानीय स्तर पर दबदबा फिर से बन गया था। इसका एक उदाहरण इल्तुतमिश के शासन में मिलता है। दरअसल, गुजरात के एक जैन दानकर्ता वास्तुपाल द्वारा विश्वनाथ मंदिर की पूजा के लिए एक लाख रुपये भेजने का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि इतनी बड़ी रकम संभवतः विश्वनाथ मंदिर की फिर से स्थापना करने के लिए भेजी गई होगी। बाद में इल्तुतमिश की मौत होने पर उसकी बेटी रजिया ने विश्वनाथ मंदिर के पास एक मस्जिद बनवा दी। 13वीं सदी में विश्वनाथ मंदिर फिर से बन चुका था, क्योंकि होयसल राजवंश के राजा नृसिंह तृतीय (1263-1292) ने 1279 में अपने राज्य के कुछ लोगों को काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए भेजा था।
1447 में फिर से मंदिर का विध्वंस
15वीं सदी में एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा गया। साल 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इस मंदिर को तोड़ दिया। 1526 में बाबर के भारत पर हमले के बाद और मुगलों का राज कायम होने के कई साल तक इस मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं हो सका।
1585 में फिर हुआ मंदिर का निर्माण
सन 1585 में राजा टोडरमल की मदद से पंडित नारायण भट्ट ने विश्वनाथ मंदिर का एक बार फिर से निर्माण करवाया। पंडित नारायण भट्ट की पुस्तक त्रिस्थली सेतु में विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख है। उन्होंने 1584 में यह पुस्तक लिखी थी। इस किताब के पृष्ठ संख्या 207-208 पर उन्होंने लिखा है कि शिवलिंग हटा दिए जाने से नए स्थापित शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए। अगर मंदिर नष्ट कर दिया गया हो, तो खाली जगह की ही पूजा की जा सकती है।
1633 में शाहजहां ने भेजी सेना
जनवरी 1633 में शाहजहां ने काशी विश्वनाथ मंदिर का विध्वंस करने के लिए अपनी सेना भेजी। शाहजहां के आदेश के बाद विश्वनाथ मंदिर तोड़ा गया या नहीं, इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उसने काशी में मंदिर तो तोड़े हैं, लेकिन इस मंदिर के साथ क्या हुआ, इसका कोई सटीक तथ्य नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पीटर मुंडी नाम का एक अंग्रेज यात्री उन दिनों काशी की यात्रा पर था। उसने अपनी यात्रा संस्मरण में विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख किया है, लेकिन ज्ञानवापी का जिक्र नहीं किया है।
1669 में फिर तोड़ा गया काशी विश्वनाथ मंदिर
18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक मस्जिद बनाई गई। यही अब ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जानी जाती है। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को विश्वनाथ मंदिर तोड़ने का काम पूरा होने की सूचना दी गई थी।
1780 में फिर से बना काशी विश्वनाथ मंदिर
2 सितंबर 1669 को मंदिर तोड़े जाने के 10 साल बाद ही वहां फिर से शिवलिंग स्थापित कर दिया गया। दरअसल, सन 1672 में रीवा के महाराजा भाव सिंह काशी आए। इसके चार साल बाद, उदयपुर के महाराजा जगत सिंह और बीकानेर के महाराजा के पुत्र खुजवान सिंह काशी पहुंचे। इन्हीं के प्रयासों से विश्वनाथ शिवलिंग को फिर से स्थापित किया जा सका। इसके बाद 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने वहां मंदिर का निर्माण कराया। 1853 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर सहित अन्य स्थानों पर सोना लगवाया। वर्तमान में यही काशी विश्वनाथ का मंदिर है।
भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के करीब 250 साल बाद यहां बड़े बदलाव की नींव पड़ी। 8 मार्च 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया। इस भव्य कॉरिडोर का लोकार्पण 13 दिसंबर 2021 को हुआ। एक अध्यादेश के जरिए उत्तर प्रदेश सरकार ने मंदिर पर क्षेत्र को विशिष्ट क्षेत्र घोषित किया था। इसके बाद आसपास के कई भवनों को अधिग्रहित किया गया था। अब काशी विश्वनाथ धाम करीब सवा 5 लाख स्क्वायर फीट में है।
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