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Election Strategist: किस चुनावी रणनीतिकार ने जिताया कर्नाटक, प्रशांत किशोर के बाद चर्चा में सुनील कानुगोलू

पहले चुनावों को जिताने की जिम्मेदारी नेताओं और उनके मित्रों, रिश्तेदारों पर होती थी, मगर आजकल डाटा और तकनीक ने चुनावों को एकदम बदल दिया है।

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Election Strategist: कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बड़ा फेरबदल करते हुए 224 सीटों में से 135 पर जीत दर्ज की। जबकि सत्ताधारी बीजेपी केवल 66 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी। अब कांग्रेस इसे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले बड़ी जीत की तरह देख रही है।

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    कई राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस की इस जीत में प्रचार अभियान और मेनिफेस्टो को कारण बता रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही चुनावी रणनीतिकार सुनील कानुगोलू की भी चर्चाएं जोरो पर हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की इस बड़ी जीत का सेहरा सुनील कानुगोलू के माथे भी बांधा जा रहा है।

    कौन होते हैं ये चुनावी रणनीतिकार?

    एक प्रकार से कहा जाए तो चुनावों के समय ये चुनावी रणनीतिकार राजनैतिक दलों के साथ सलाहकार की भूमिका निभाते हैं। जैसे, जनता के बीच उनके नेता की छवि को कैसे बनाया जाये? इसमें सोशल मीडिया से लेकर चुनावी रैली और उनके पहनावे तक सबकुछ शामिल होता है। साथ ही विपक्षी दलों और उनके नेताओं की छवि को जनता की नजर में बिगाड़ने का काम भी यही रणनीतिकार करते हैं। इसके अलावा इलेक्शन मैनजमेंट और बूथ मैनजमेंट के आंकड़ों पर भी इनकी रणनीति का इस्तेमाल किया जाता है।

    हालांकि, यह रणनीतिकार सफलता अथवा जीत की शत-प्रतिशत गारंटी नहीं होते। ये चुनावी रणनीतिकार के एक 'प्रोफेशनल कंसल्टेंट' के तौर पर अपनी सेवाएं देते हैं, उनके पास एक पूरी रिसर्च टीम होती है और वे किसी एक राजनीतिक दल से बंधे नहीं होते हैं।

    कितने सफल रहते हैं ये रणनीतिकार?

    आजकल कमोबेश हर दल इन चुनावी रणनीतिकारों का सहारा ले रहे हैं। आमतौर पर जो पार्टी जीत जाती है उसके चुनावी रणनीतिकार मीडिया की सुर्खियां बन जाते हैं। जबकि हारने वाले दल की कोई चर्चा नहीं करता। फिर भी कुछ ऐसे रणनीतिकार हैं जो हार कर भी चर्चा में रहते हैं।

    इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में देखने को मिलता है। तब कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को चुनावी रणनीतिकार के तौर पर चुना था। जबकि उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर थे और उन्होंने प्रशांत किशोर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। पार्टी आलाकमान से प्रशांत किशोर को पूरा समर्थन मिला हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि इन चुनावों में राहुल गांधी और अखिलेश यादव को साथ लाने और उन्हें 'यूपी के लड़के' के साथ प्रोजेक्ट प्रशांत किशोर ने ही किया था। जबकि राज बब्बर इसके विरोध में थे। हालांकि इन चुनावों में प्रशांत कांग्रेस के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सके और पार्टी को केवल सात सीटें ही मिली।

    भारत में कब आया चुनावी रणनीतिकार का कॉन्सेप्ट?

    भारत में आने से पहले अमेरिका में यह कॉन्सेप्ट 90 के दशक से है। भारत में यह 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान अधिक लोकप्रिय हुआ। तब प्रशांत किशोर सिटीजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (CAG) के बैनर तले चुनावों की रणनीति बनाने के लिए एक टीम लेकर आये और 'चाय पर चर्चा', '3D होलोग्राम रैली' करवाकर नरेंद्र मोदी को देश भर में लोकप्रिय बनाने में मदद की।

    'द एशिया डायलॉग' की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2009 में सबसे पहले ओडिशा विधानसभा चुनावों में नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) द्वारा किसी चुनावी फर्म 'विप्लव कम्युनिकेशंस' की सेवाएं ली गईं थी। यह फर्म पल्लव पांडे की है। तब नवीन पटनायक ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था। नतीजतन बीजद ने विधानसभा की 147 सीटों में से 103 सीटों पर जीत दर्ज की।

    कई दशकों से है अमेरिका में ये कॉन्सेप्ट

    कुछ दावों के मुताबिक अमेरिका में चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका 1930 से देखी जा रही है। दरअसल, क्लेम व्हिटेकर और लियोन बैक्सटर को दुनिया के पहले चुनावी सलाहकार के रूप में पहचाना जाता है। जबकि आज के दौर पर चेस्टर जेम्स कारविल जूनियर को सबसे बड़ा चुनावी रणनीतिकार माना जाता है। जिन्होंने अमेरिका सहित अन्य 23 देशों में चुनावों के दौरान अपनी पेशेवर सेवायें दी हैं।

    बिल क्लिंटन के 1992 के राष्ट्रपति अभियान के दौरान चेस्टर जेम्स कारविल ने प्रमुख रणनीतिकार के रूप में काम किया था और उन्हें जीत दिलाई। इसके बाद साल 2004 में मैसाचुसेट्स के सीनेटर जॉन केरी, 2008 में न्यूयॉर्क के सीनेटर हिलेरी क्लिंटन के साथ काम किया। चेस्टर जेम्स कारविल 2020 में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और कोलोराडो सीनेटर माइकल बेनेट के लिए भी काम कर चुके हैं।

    देश के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार

    प्रशांत किशोर - चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर का जिक्र 2014 के लोकसभा चुनावों में पहली बार आया। उसके बाद नीतीश कुमार-लालू गठबंधन की बिहार में जीत और 2021 में ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में जीत इनका अहम योगदान माना जाता है। इसके अलावा, प्रशांत किशोर पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी और तमिलनाडु में डीएमके नेता एम.के. स्टालिन को भी अपनी प्रोफेशनल सेवाएं दे चुके हैं।

    प्रशांत किशोर की असफलता की बात करें तो साल 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी और अखिलेश यादव को साथ लाकर 'यूपी के लड़के' वाला उनका प्रयोग असफल रहा। फिर साल 2022 में उन्होंने ममता बनर्जी की टीएमसी को गोवा विधानसभा चुनावों को लड़ने की सलाह दी थी। हालांकि इस चुनावी कैम्पेन को प्रशांत किशोर ने बीच में ही छोड़ दिया और टीएमसी यह चुनाव हार गयी।

    सुनील कानुगोलू - कांग्रेस से पहले डीएमके, एआईएडीएमके, बीजेपी और अकाली दल जैसी पार्टियों के लिए चुनावी रणनीतिकार के तौर पर सुनील कानुगोलू काम कर चुके हैं। उन्होंने 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भाजपा, 2019 के लोकसभा चुनावों में डीएमके और तमिलनाडु में 2021 के विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके के लिए चुनावी रणनीतियां बनाई थीं।

    साल 2016 में डीएमके के लिए सबसे चर्चित 'नमाक्कु नामे' कैंपेन सुनील ने ही डिजाइन किया था। हालांकि, डीएमके यह चुनाव हार गई थी पर स्टालिन एक बड़े नेता बनकर उभरे थे। साल 2022 में सुनील को बतौर चुनावी रणनीतिकार कांग्रेस ने अपने साथ जोड़ लिया, जिसका लाभ उसे कर्नाटक विधानसभा चुनावों में मिला है। अब चर्चा है कि सुनील मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता दिलाने के लिए चुनावी रणनीति बनाने का काम करेंगे।

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