K. M. Munshi: साहित्य, संस्कृति और राजनीति के हरफनमौला थे केएम मुंशी
भारतीय विद्या भवन की स्थापना से लेकर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का अतुलनीय योगदान था। इसके अलावा साहित्य के क्षेत्र में भी उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है।

K. M. Munshi: कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, जो केएम मुंशी के नाम से लोकप्रिय थे, पेशे से वकील थे लेकिन बाद में उन्होंने लेखन और राजनीति की ओर रुख किया। गुजराती साहित्य में उनका नाम जाना-पहचाना है। मुंशी ने अपनी रचनाएं तीन भाषाओं गुजराती, अंग्रेजी और हिंदी में लिखीं थी। उन्होंने 1938 में एक शैक्षिक ट्रस्ट, भारतीय विद्या भवन की स्थापना की थी। केएम मुंशी ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
शुरूआती जीवन
केएम मुंशी का जन्म 30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भरूच में हुआ था। उनकी शुरूआती शिक्षा भरूच में ही हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे बडोदरा चले गए। बडोदरा कॉलेज से 1907 में उन्होंने अंग्रेजी भाषा में अधिकतम अंक प्राप्त करके, बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री के साथ 'कुलीन पुरस्कार' प्राप्त किया। 1907 में केएम मुंशी ने अपनी वकालत की डिग्री प्राप्त कर बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। यहां वकालत के साथ ही वे सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेने लगे।
यही वह दौर था जब केएम मुंशी ने सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए 'भार्गव' नामक पत्रिका का संपादन किया। यही नहीं, इन्होंने विधवा विवाह का समर्थन करने के लिए एक विधवा महिला लीलावती सेठ से विवाह भी किया। इसी समय वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए और देश की स्वाधीनता के लिए कई बार जेल भी गए।
संविधान सभा के सदस्य बने
विचारों में मतभेदों के कारण उन्होंने 1941 में कांग्रेस छोड़ दी, हालांकि बाद में महात्मा गांधी के कहने पर 1946 में वापसी कर ली। केएम मुंशी का संविधान निर्माण में भी बहुत बड़ा योगदान रहा। वे मसौदा समिति, सलाहकार समिति, मौलिक अधिकारों पर उप-समिति सहित कई समितियों का हिस्सा रहे। वे राष्ट्रीय ध्वज समिति के भी सदस्य रहे, जिसने वर्तमान भारतीय ध्वज को चुना। केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री रहते हुए उन्होंने 1950 में देश में 'वनमहोत्सव' की शुरुआत की। मुंशी ने 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया।
गुजराती साहित्य में योगदान
खास बात यह है कि केएम मुंशी 'घनश्याम' उपनाम से रचनाएं लिखते थे। उन्होंने अखण्ड हिंदुस्तान नाम से भी एक रचना की थी। इस किताब में उन्होंने लिखा कि भारत का इतिहास अधिकतर विदेशी इतिहासकारों ने लिखा है जिसमें भारतीय परिप्रेक्ष्य का अभाव नजर आता है। ये इतिहास भारतीय परिप्रेक्ष्य से नहीं बल्कि पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर पक्षपाती तरह से लिखा गया है। गौरतलब है कि केएम मुंशी ने विभिन्न भाषाओं में 127 पुस्तकें लिखी हैं। उनकी पहली कहानी 'मारी कमला' 1912 में स्त्री बौद्ध पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में योगदान
केएम मुंशी के बारे में एकबात जो बहुत अधिक नहीं होती, वह है सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाना। सोमनाथ मंदिर को केएम मुंशी हिंदुओं के पूजा स्थल या एक प्राचीन स्मारक के रूप में नहीं देखते थे बल्कि उनका कहना था कि सोमनाथ भारत के प्राचीन इतिहास का एक प्रतीक है इसलिए इसका पुनः निर्माण होना बहुत आवश्यक है। इस मांग का कांग्रेस के कुछ लोगों ने समर्थन किया और कुछ लोगों ने विरोध भी किया। विरोध करने वाले लोगों में जवाहर लाल नेहरू प्रमुख थे। महात्मा गांधी का कहना था कि मंदिर में लगने वाला पैसा सरकारी खजाने से नहीं बल्कि आम जनता से इकट्ठा करना चाहिए। मंदिर का पुनः निर्माण करने की बात पर जब आम सहमति बनी तो इसकी जिम्मेदारी केएम मुंशी को सौंपी गई।
भारतीय विद्या भवन की स्थापना
केएम मुंशी का कहना था कि भारतीय संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं है। इसलिए वह भारतीय संस्कृति को चिंतन का एक सतत प्रवाह मानते थे। उनका स्वपन था कि ऐसे केंद्र की स्थापना की जाए जहां इस देश का प्राचीन ज्ञान और आधुनिक बौद्धिक आकांक्षाएं मिलकर एक नये साहित्य, नये इतिहास और नयी संस्कृति को जन्म दे सके। इसे पूरा करने के लिए 7 नवंबर 1938 में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की गयी। आज विश्व भर में इसके 120 केंद्र हैं जिनसे 350 से अधिक शैक्षणिक संस्थान जुड़े हैं।
मुंशी-प्रेमचंद' में मुंशी नाम कन्हैयालाल का है
बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि मुंशी प्रेमचंद में जो मुंशी नाम है, वो कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का है। दरअसल हुआ यूं था कि 1930 में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को महात्मा गांधी ने प्रेरणा दी जिसके बाद उन्होंने प्रेमचंद के साथ मिलकर पत्रिका 'हंस' निकाली। इस पत्रिका का संपादन दोनों मिलकर किया करते थे। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, प्रेमचंद से 7 साल बड़े थे तो अपनी वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने तय किया कि पत्रिका के संपादन में उनका नाम प्रेमचंद से पहले जाए जिसके चलते हंस के कवर पर संपादक के रूप में 'मुंशी-प्रेमचंद' नाम प्रिंट होकर जाने लगा। इससे पाठकों को एक बड़ी गलतफहमी हो गई और वे मान बैठे कि प्रेमचंद ही 'मुंशी-प्रेमचंद' है।
1959 में कांग्रेस की विचारधारा से हुए अलग
1959 में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया और अखंड हिंदुस्तान अभियान की शुरुआत की। उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालचारी के साथ मिलकर स्वतंत्र पार्टी का निर्माण किया। यह पार्टी दक्षिणपंथी विचारधारा को मानती थी। बाद में मुंशी जनसंघ में शामिल हो गए। 1964 में वे विश्व हिंदू परिषद की बैठक के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने अलग पाकिस्तान की मांग का विरोध भी किया था। आखिरकार, भारतीय संस्कृति, साहित्य एवं राजनीति में अमूल्य योगदान के बाद 8 फरवरी 1971 को केएम मुंशी का निधन हो गया।
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