K. Kamaraj : स्कूलों में भोजन और मुफ्त यूनिफॉर्म की शुरुआत करने वाले पहले मुख्यमंत्री थे कामराज
एक नेता जो नेतागिरी से ज्यादा संगठन का काम करना जरूरी समझता था। वह नेता सादगी भरा जीवन जीने के लिए भी जाना गया। मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न देकर सम्मानित भी किया गया। वह नेता जो स्वतंत्रता के बाद मद्रास के मुख्यमंत्री बने और स्वतंत्र भारत में पहली बार मिड-डे मील योजना चलाने के लिए जाने गए। क्योंकि उनका कहना था कि राज्य के लाखों गरीब बच्चे कम से कम एक वक्त तो भरपेट भोजन कर सकें। उन नेता का नाम है के. कामराज। जी यह वही कामराज है जिनको नेहरू दिल्ली ले आए और फिर कामराज प्लान शुरू हुआ। नेहरू जी के बाद दो प्रधानमंत्रियों को बनाने में कामराज का बहुत अहम योगदान रहा है।

गांधी से प्रभावित थे कामराज
कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरुधुनगर, मदुरै में हुआ था। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होने पर कामराज कांग्रेस में शामिल हो गये थे। उस समय उनकी आयु मात्र 16 बरस की थी। 1930 तक आते आते कामराज को अंग्रेज सरकार लगभग 6 बार जेल भेज चुकी थी। वह उस दौरान लगभग 3,000 दिनों तक जेल में बंद रहे थे। कामराज ने जेल में भी अपने हौसले को नहीं छोड़ा। जेल में रहकर ही अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद जेल में रहते ही म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चेयरमैन बन गये। इस पद पर वह ज्यादा दिन तक नहीं टिके और लगभग 9 महीने तक कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने अपने पद से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि जिस पद के साथ आप न्याय नहीं कर सकते उस पद पर बने रहने का आपका कोई हक नहीं है।
मिड-डे मील वाले पहले मुख्यमंत्री
13 अप्रैल 1954 को कामराज पहली बार मद्रास प्रोविन्स मुख्यमंत्री बने थे। यह मद्रास प्रोविन्स वही राज्य है जिसे वर्तमान में हम तमिलनाडु के नाम से जानते है। तो कामराज ने मुख्यमंत्री बनते ही पहला काम शिक्षा में सुधार का किया। सूबे के इस मुख्यमंत्री ने हर गांव में प्राइमरी स्कूल और हर पंचायत में हाईस्कूल और 11वीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की योजना को लागू किया। उनके नेतृत्व में स्वतंत्र भारत में पहली बार मिड-डे मील योजना चलाई गयी। साथ ही हर राज्य में जो वर्तमान की सरकारें मुफ्त में बच्चों को वर्दी देती है, उसका श्रेय भी कामराज को ही जाता है। अपने मुख्यमंत्री काल में ही उन्होंने मद्रास के स्कूलों में मुफ्त यूनिफॉर्म योजना की शुरुआत की थी। तीन बार मद्रास के मुख्यमंत्री रहते हुए कामराज ने बहुत अच्छे काम किये। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनकी तारीफ करते हुए कहा था कि मद्रास भारत में सबसे अच्छा प्रशासित राज्य है।
क्या है कामराज प्लान?
यह बात 1963 की है। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद प्रधानमंत्री नेहरू की लोकप्रियता में कमी आ गयी थी। कांग्रेस की साख घटने लगी थी। 1963 में लोकसभा के तीन उपचुनाव हुए और तीनों में कांग्रेस हार गयी। तब हैदराबाद में कामराज ने नेहरू से कहा था कि कांग्रेस की संगठन से पकड़ कमजोर होती जा रही है। इसके लिए उन्होंने नेहरू को सुझाव दिया कि पार्टी के बड़े नेताओं को इस्तीफा देकर संगठन का काम करना चाहिए। इस योजना को ही 'कामराज योजना' या कामराज प्लान भी कहा गया। उस दौरान उनका विरोध भी हुआ। क्योंकि कांग्रेस के कई नेता इस योजना ने नाखुश थे। उन्हें लगने लगा था कि यह प्लान उन्हें साइडलाइन करने के लिए बनाया गया है। इसके बाद इस प्लान के तहत खुद कामराज ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही आपको बता दें कि उनके अलावा बीजू पटनायक और एसके पाटिल, चंद्रभानु गुप्ता सहित 6 मुख्यमंत्रियों और मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और लाल बहादुर शास्त्री सहित 6 मंत्रियों ने अपने पद छोड़े थे। इसके बाद वे सब पार्टी के काम में लग गए थे। इसके बाद 9 अक्टूबर 1963 को कामराज को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया।
बन सकते थे प्रधानमंत्री पर बने किंग मेकर
क्या हो जब किसी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिले और वह मना कर दे! शायद कोई नहीं होगा। पर कामराज ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्होंने दो बार मौका मिलने पर भी यह पद नहीं लिया। दोनों ही बार अलग-अलग नेताओं को प्रधानमंत्री बनाया। इसमें पहला अवसर 1964 में आया। जब प्रधानमंत्री नेहरु की मृत्यु के बाद सभी को लग रहा था कि कामराज अगले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। मगर उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए पार्टी का फिट रहना जरूरी है और उन्होंने एक बार फिर संगठन को अहमियत दी। तब उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का समर्थन किया। इसके बाद जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद फिर पार्टी को लगा कि अब तो कामराज ही प्रधानमंत्री बनेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। इस बार उन्होंने इंदिरा को इस पद के अनुकूल पाया और देश को प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी मिलीं।












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