Jodhpur: जोधपुर में महिलाएं नंगी तलवार लेकर आधी रात को करती है श्मशान में पूजा

बच्चों को कुदृष्टि से बचाने और देश की आपदा से रक्षा के लिए जोधपुर में कुम्हार समाज की महिलाएं विगत 100 सालों से "खेमकुशल" परंपरा का निर्वहन करती आ रही हैं।

jodhpur

भारतीय सामाजिक परिवेश में श्मशान को लेकर अनेक रोचक घटनाएं और किंवदंतियां देखी और सुनी जाती हैं। श्मशान में बिना कार्य के दिन में भी जाना वर्जित बताया गया है। लेकिन अगर आधी रात को और खासकर महिलाएं श्मशान का रुख करती है तो अवश्य ही कुछ विशेष प्रयोजन रहा होगा। यह नजारा रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है।

दरअसल राजस्थान के जोधपुर में यह किसी हॉरर फिल्म या उपन्यास का कथानक नहीं बल्कि एक ऐसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें कुम्हार समाज की महिलाएं उत्साह से भाग लेती हैं। यह आयोजन बच्चों को कुदृष्टि से बचाने, देश में समृद्धि लाने और आपदा से बचाने के लिए किया जाता है। यह परंपरा गत 100 सालों से चली आ रही है।

पांच साल बाद खेमकुशल परंपरा का आयोजन

वैश्विक महामारी कोरोना के बाद जोधपुर में पांच साल बाद एक बार फिर खेमकुशल परंपरा का आयोजन किया गया। रात को क्षेत्र की महिलाएं कुम्हारियां कुंआ स्थित कुंभेश्वर गणेश मंदिर के बाहर एकत्रित होकर चंग की थाप पर नृत्य करती हैं। मटके के दिये की रोशनी देखती हैं और नाचती हुई महिलाओं के हाथों में तलवार तो किसी के हाथ में मूसल होती हैं।

महिलाओं व युवाओं का दल अनुष्ठान के लिए सिवांची गेट श्मशान की तरफ निकलता है। एक वृद्धा मटके को उठाकर चलती है। उनके एक हाथ में तलवार होती है। आधे टूटे मटके में दीया जल रहा होता है। मटके में एक बोतल भी है जो गहरे लाल रंग के पदार्थ से भरी रहती है।

jodhpur

खेमकुशल, हाथ में मूसल, आई देवी चंडिका, माथे मोटी हांडिका

परंपरा के तहत सिवांची गेट पोल पर बने हाथ के निशान की पूजा अर्चना करने के बाद महिलाएं श्मशान की तरफ रुख करती हैं। श्मशान में दरवाजे के पास ही अर्थी रखने का चबूतरा बना होता है। महिलाएं "खेमकुशल, हाथ में मूसल, आई देवी चंडिका, माथे मोटी हँडिका"... का उद्घोष करते हुए यहां पहुंचती हैं।

श्मशान विश्राम गृह स्थल पर मटके को रखने के बाद महिलाएं नृत्य करती हैं और श्मशान की तरफ बढ़ती हैं। शवदाह ग्रह स्थल पर अनुष्ठान का अंतिम चरण शुरू होता है। इसके साथ चल रहे युवा चंग बजाते और गायन करते हुए साथ चलते हैं। पूजा अर्चना के समय महिलाएं युवकों को बाहर जाने का इशारा करती हैं। फिर केवल उपस्थित महिलाएं श्मशान में अनुष्ठान शुरू करती हैं। महिलाएं दाह संस्कार वाले स्थल पर माली-पन्ना (चमकीला पन्ना) चिपकाकर देवी और भैरव की स्थापना करती हैं और उनकी पूजा- अर्चना कर उनको शराब, दूध, मिठाई व अन्य भोग लगाती हैं। देवी तथा भैरव को प्रसाद चढ़ाने के बाद एक युवक छेद की गई मटकी में शराब और दूध के मिश्रण की धार छोड़ता हुआ चलता है और महिलाएं वापस घर की ओर लौटती हैं।

100 वर्षों से जारी है खेमकुशल परंपरा

कुम्हारियां कुआं क्षेत्र में निवास करने वाले भानु प्रकाश चांदोरा बताते हैं कि खेमकुशल परंपरा का निर्वहन समाज की महिलाएं गत 100 वर्षों से करती आ रही हैं। यह आयोजन शहर के अन्य हिस्सों में निवास करने वाले समाज के अन्य लोग भी करते हैं। यह अर्धरात्रि में किया जाता है और इसमें महिलाओं के द्वारा देवी और भैरव रुप धारण कर चलती हैं। बुजुर्ग एवं युवा भी साथ जाते हैं। प्रदेश की खुशहाली, छोटी अवस्था में मृत्यु एवं बीमारी न हो, इस उद्देश्य से इस अनुष्ठान परंपरा का आयोजन किया जाता है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+