अगर टीवी पर लाइव न होता 26/11 तो 60 घंटे न चलता ऑपरेशन
मुंबई। 26/11 मुंबई हमलों के दौरान देश में हर कोई अपने टीवी सेट से चिपका हुआ था। मुंबई हमले उस समय हर चैनल पर टॉप पर थे। हर न्यूज चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर हमलों से जुड़ी कई अहम जानकारियां टेलीकस्ट कर रहे थे। उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि वह ब्रेकिंग न्यूज के लिए देश और इसकी सुरक्षा से कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

टीवी फुटेज बन गई थी आतंकियों के लिए वरदान
जो बातें भारत में टीवी चैनल पर टेलीकास्ट हो रही थीं उन पर पाकिस्तान के कराची स्थित कंट्रोल रूम में बैठे आतंक के आका बराबर नजर रख रहे थे। इन खबरों को देखकर वह मुंबई में आतंकियों को निर्देश देते और जिसका नतीजा था कि आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन 60 घंटे तक चला।
टीवी चैनल अपनी अपडेट्स या यों कहें कि टीआरपी के लिए कवरेज में इतने मशगूल थे कि जिस समय एनएसजी की टीम हमले की जगह पर पहुंची उसकी फुटेज भी उन्होंने दिखा डाली। इस फुटेज को कराची के कंट्रोल रूम में बैठा भारतीय आतंकी अबु जुंदाल, मुंबई हमलावरों को हिंदी टीचर देख रहा था।
उसने पूछताछ के दौरान इस बात को स्वीकार किया कि टीवी पर आने वाली लाइव अपडेट्स कराची के कंट्रोल रूम में बैठे आकाओं के साथ ही साथ आतंकियों के लिए भी वरदान साबित हुई थी। लाइव फुटेज को देखकर आतंकियों को उनके अगले कदम के बारे में निर्देश कराची से दिए जा रहे थे।
एनएसजी की ओर से हमले का जवाब देने के लिए 'ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो' चलाया गया था। आखिरकार एनएसजी को 28 नवंबर को सफलता हासिल हुई। मुंबई हमलों के दौरान एनएसजी के प्रमुख रहे जेके दत्त की मानें तो होटल ताज के दौरान पूरा ऑपरेशन एक चुनौती बन गया था।
आतंकी हर सेकेंड अपडेट थे और उन्होंने होटल की उन सीढ़ियों का प्रयोग बचने के लिए कर लिया जिनके बारे में किसी को भी नहीं मालूम था।
सुप्रीम कोर्ट ने भी मानी थी गैरजिम्मेदारी
कुछ लोगों ने टीवी चैनलों की इस कवरेज को देश के खिलाफ तक करार दे डाला था। उनका मानना था कि चैनल का रवैया बहुत ही गैरजिम्मेदाराना है। विशेषज्ञों की मानें तो लग रहा था कि मानों चैनल इस बात को मानना ही नहीं
चाहते हों कि ब्रेकिंग न्यूज और देश के हित के बीच एक हल्की सी सीमा होती है। चैनलों का इस रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की नजर भी गई।
कोर्ट ने कहा, 'चैनलों ने किसी भी तरह का राष्ट्रीय हित या फिर कोई सामाजिक सरोकार नहीं दिखाया। लगातार कवरेज ने देश का उन स्थितियों में पहुंचा दिया जहां सारे आतंकी सुरक्षा बलों की पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। सभी ऑपरेशनल गतिविधियों पर सीमा के दूसरी तरफ नजर रखी जा रही थी और टीवी स्क्रीन पर जो भी दिखाया जा रहा था, उसे संदेश के तौर पर आतंकियों को पहुंचाया जा रहा था।'
संविधान का आर्टिकल 19 जिसमें फ्रीडम ऑफ एक्स्प्रेशन भी शामिल है, कई जरूरी प्रतिबंधों का भी जिक्र है। ऐसे में हमले के दौरान टेलीविजन चैनल जो कुछ भी दिखा रहे थे, वह देश हित में बिल्कुल भी नहीं था। बल्कि वह सिर्फ अपना व्यावसायिक हित पूरा करने में लगे थे।
67 चैनल लगे थे लाइव टेलीकास्ट में
60 घंटों तक चले ऑपरेशन को कवर करने के लिए देश के 67 चैनल मौजूद थे। पाक में इन हमलों को नियंत्रित कर रहे आतंकी इन सभी चैनलों पर बराबर नजरें बनाए हुए थे। दत्त की मानें तो उस समय कोई भी चैनल ऐसा था नहीं जिसे देश के हित की चिंता हो।
इसके अलावा सुरक्षा बलों ने भी उनसे अनुरोध किया लेकिन उनका रवैया इतना खराब था, जिसने सबसे ज्यादा तकलीफ पहुंचाई। दत्त ने बताया कि जिस समय एनएसजी ने जिम्मा संभाला, उसका पहली प्राथमिकता थी कि बंधकों को बचाया जाए।
इसके बाद उन्होंने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सोचा था लेकिन हुआ इसका उल्टा। जब बंधकों में से एक बंधक बाहर आया तब असल में रेस्क्यू ऑपरेशन को शुरू किया गया।
उसके बाहर आते ही टीवी चैनलों ने उसे घेर लिया। उसने जानकारी दी कि ताज के डाइनिंग रूम में कुछ लोग जान बचाने के मकसद से छिपे हुए हैं। इस जानकारी को चैनलों ने लाइव कर दिया और नतीजा कि दो लोगों को आतंकियों ने मार गिराया।
आज भी नहीं बदला है कुछ
दत्त की मानें तो जो रवैया टीवी न्यूज चैनलों का हमलों के दौरान नजर आया उसकी आलोचना सुप्रीम कोर्ट ने भी की लेकिन इसके बाद भी आज तक कुछ नहीं बदला है। आज भी चैनल्स पूरे दिन बिना जिम्मेदारी के कुछ भी ब्रेकिंग न्यूज चलाते रहते हैं।
वह कहते हैं कि सरकार की ओर से राष्ट्रीय हितों से जुड़ी खबरों को लाइव दिखाने के लिए कोई भी नियम नहीं हैं। लेकिन वहीं यह बात भी काफी जरूरी है कि नियमों के इंतजार से बेहतर होगा कि हम अपनी जिम्मेदारी तय करें।












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