Chola Dynasty: कितना ताकतवर था चोल साम्राज्य, जानें उसका इतिहास

हमारे देश में एक नहीं बल्कि कई वंशों और उनके शासकों ने दशकों तक शासन किया, उन्हीं में से एक वंश था चोल राजवंश। जिन्होंने कई मंदिरों का निर्माण करवाया था।

How powerful was the Chola Empire, know its history

28 मई को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद के नये भवन का उदघाटन करेंगे। इस नये भवन के उदघाटन के साथ ही जो कुछ नयी परंपराएं शुरू होंगी, उनमें सेंगोल को स्थापित करना भी शामिल है। इस सेंगोल की स्थापना को लेकर खूब चर्चाएं हो रही हैं, साथ ही चोल साम्राज्य की भी।

दरअसल सेंगोल तमिल भाषा का शब्द है और इसका अर्थ संपदा से संपन्न और ऐतिहासिक है। सेंगोल शब्द का अर्थ और भाव नीति पालन से है। कहते हैं कि सेंगोल जिस राजा को हस्तान्तरित किया जाता था, उससे न्यायपूर्ण शासन की अपेक्षा की जाती थी। साथ ही बता दें कि इस सेंगोल का सीधा संबंध चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है।

चोल राजवंश की शुरुआत कब और कहां हुई?
चोल साम्राज्य का पहला जिक्र सम्राट अशोक के पुरालेखों में मिलता है। उस समय के चोल राजवंश को 'प्रारंभिक चोल' के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, इस वंश की उत्पत्ति को लेकर कोई स्पष्ट तथ्य मौजूद नहीं है। वहीं तीसरी शताब्दी के आसपास 'पल्लव' और 'पांड्य' राजाओं के शासन विस्तार का जिक्र कहीं-कहीं किया गया है। उस समय प्रारंभिक चोल काफी छोटे स्तर पर थे। वह पल्लवों के अधीन होकर उनके सामंत की तरह काम करते थे।

इसके बाद पूर्व मध्यकाल में पल्लव और पांड्या राजवंशों के बीच वर्चस्व और सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा था। उस समय पल्लवों और पाड्यों के बीच संघर्ष का फायदा उठाकर चोल साम्राज्य के संस्थापक 'विजयालय चोल' ने दक्षिण भारत में बहने वाली दो नदियों - पेन्ना और वेल्लार के बीच मैदानी इलाके (कावेरी नदी के डेल्टा) के पास तंजावूर में अपना कब्जा स्थापित कर लिया था। उन्होंने वहां के तत्कालीन राजा (पांड्या के अधीन मुत्तरैयरों) को हरा दिया था। इसी के साथ विजयालय चोल ने तंजावूर को अपनी राजधानी बनाया था। यहीं से 9वीं शताब्दी (850-871 ईस्वी) में चोल राजवंश अस्तित्व में आया, बाद में चोल राजा पांड्या राजाओं के क्षेत्रों पर कब्जा करते गये। इसके बाद 897 ईस्वी में विजयालय चोल ने पल्लव शासक को हराकर सारे टौंड मंडल पर अपना अधिकार कर लिया।

विजयालय चोल के बाद इन्होंने किया राज
विजयालय चोल के बाद उनके बेटे आदित्य प्रथम ने 870 ईसा पूर्व सत्ता संभाली और साम्राज्य का विस्तार किया। इसके बाद परांतक प्रथम, परांतक द्वितीय, राजराजा प्रथम, राजेंद्र प्रथम, राजाधिराज, राजेंद्र द्वितीय, वीर राजेंद्र, अधिराजेन्द्र, कुलोत्तुंग प्रथम, विक्रम चोल, कुलोत्तुंग द्वितीय और राजेंद्र तृतीय जैसे चोल राजवंश के राजाओं का नाम आते हैं।
विजयालय चोल के बाद इस वंश के जो भी शासक आये, उन्होंने पत्थर और तांबे पर भारी संख्या में शिलालेखों का निर्माण किया। जिससे उनके इतिहास का पता चलता है। चोल राजाओं और सम्राटों में अलग-अलग उपाधियां चलती थीं। प्रमुख उपाधियों में परकेशरीवर्मन और राजकेशरीवर्मन शामिल थीं। इस वंश ने 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत के बड़े इलाके पर राज किया था।

चोल वंश के सबसे ताकतवर राजा
इतिहास के मुताबिक चोलवंश के इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चाएं राजराजा प्रथम और राजेंद्र चोल की होती है। राजराजा प्रथम (985-1014 ईस्वी) परांतक द्वितीय का बेटा था। उसने वेगी के पूर्वी चालुक्य राजा, मदुरा के पांड्या राजा और मालाबार तट के सामंतों को हराकर अपने अधीन कर लिया था। उसने लंका का उत्तरी भाग जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। राजराजा ने समुद्री जहाजों का शक्तिशाली बेड़ा तैयार किया और उसकी सहायता से कई टापूओं पर जीत हासिल की। राजराजा के राज्यकाल में चोल साम्राज्य समस्त सुदूर दक्षिण में फैल गया। राजराजा ने अपने जंगी जहाजों से बंगाल की खाड़ी को भी पार कर दक्षिण-पूर्व में अपना साम्राज्य स्थापित किया था। इसमें वर्तमान इंडोनेशिया और वर्तमान थाईलैंड जैसे नाम प्रमुख है।

इसके बाद राजराज प्रथम के बाद उनके बेटे राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ईस्वी) ने सत्ता संभाली और चेर, पांड्य एवं सिंहल जीतकर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया। उसने श्रीलंका पर भी पूर्ण विजय प्राप्त की। राजेंद्र प्रथम ने तकरीबन 1025 ईस्वी के आसपास बंगाल में पाल शासक महिपाल को परास्त किया और गंगा घाटी तक आधिपत्य होने के कारण गंगैकोंडचोल की उपाधि धारण किया। राजाराजा के बेटे राजेंद्र चोल ने भी भारत से बाहर कई समुद्री युद्ध अभियानों का नेतृत्व किया था। इसमें अंडमान निकोबार से लेकर म्यांमार जैसे नाम शामिल है।

कहते हैं कि चोल वंश के इस काल में चोल साम्राज्य अपने चरम पर था। उनका राजनीतिक प्रभाव श्रीलंका, मालदीव, थाईलैंड और मलेशिया तक फैल चुका था। साथ ही इस साम्राज्य के संबंध चीन के भी साथ थे।

मंदिरों का करवाया निर्माण
इस वंश के हर राजा ने अपने-अपने कालखंड में हर प्रकार के हिन्दू मंदिरों का निर्माण करवाया। 907 में आदित्य प्रथम ने अपनी मृत्यु से पहले कावेरी नदी के तट पर अनेक भव्य और विशाल शिव मंदिरों का निर्माण करवाया। आदित्य के बाद, उसके बेटे परान्तक प्रथम ने चिदम्बरम मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित विश्व प्रसिद्द नटराज की प्रतिमा के लिए कीमती आभूषणों की व्यवस्था की थी। राजराजा ने श्रीलंका में द्रविड़ वास्तु-शैली के शिव मंदिरों का निर्माण करवाया था। राजराजा का चालुक्य राजाओं से लम्बे समय तक संघर्ष रहा। इस दौरान युद्ध में राजराजा को जितनी भी संपत्ति हासिल हुई वह तंजावुर के बृहदीश्वर अथवा बृहदेश्वर शिवमन्दिर को दान में दे दी गई थी।

राजराजा ने 'शिवपादशेखर' की उपाधि अपने आराध्यदेव शिव की भक्ति में ही धारण की थी। उन्हीं के कालखंड में निर्मित तंजावुर का विशाल राजेश्वर मन्दिर अथवा बृहदीश्वर अथवा बृहदेश्वर शिवमन्दिर अपनी द्रविड़-वास्तु एवं स्थापत्य-शिल्प कलात्मकता तथा वैभव सम्पन्नता के लिए विश्वविख्यात है।

चोल-अभिलेखों में राजराजा द्वारा विष्णु मन्दिरों के निर्माण का भी उल्लेख मिलता है। उसके द्वारा प्रचलित सिक्‍कों पर कृष्ण, मुरलीधर तथा विष्णु पद-चिन्ह आदि का अंकन विशेष उल्लेखनीय है। इसी प्रकार उसने चूड़ामणि नामक बौद्ध-विहार के निर्माण हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान किया था। चोल साम्राज्य के अंतिम शासक, कुलोत्तुंग तृतीय ने भी कई शिव मंदिरों के निर्माण सहित पूर्व-निर्मित मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाया था।

चोल राजाओं का गंगा से है 'पवित्र संबंध'
राजेंद्र चोल के बेटे विक्रम चोल ने गंगा नदी के पवित्र जल में स्नान किया था। इतिहासकारों का कहना है कि राजेंद्र चोल ने विक्रम को गंगा नदी का जल लाने के लिए तीर्थ यात्रा पर भेजा था। इसलिए वह बंगाल तक गया था। तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजेन्द्र प्रथम ने गंगा के पावन जल को अपनी सेना द्वारा मंगवा कर अपनी राजधानी में संग्रहीत करवाया। यह उसने अपने विशाल चोल साम्राज्य को भारत की सांस्कृतिक एकता से जोड़ने के उद्देश्य से किया था।

चोलों का साहित्य के प्रति लगाव
चोल राजवंश में साहित्य के प्रति लगाव के कई उल्लेख मिलते हैं। 1133 से 1150 ईस्वी के बीच इस वंश के राजा, कुलोत्तुंग द्वितीय ने शासन किया। उसने अपने पूर्ववर्ती राजाओं की भांति कला और साहित्य को महत्व दिया। उसी के कालखंड में पेरियपुराणम्‌ के रचयिता शेक्किलार को और ओत्तक्कुत्तन, कम्बन आदि महान रचनाकारों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया था।

कैसे होता था राज्याभिषेक?
चोल साम्राज्य में उत्तराधिकार का नियम था। अपने जीवनकाल के दौरान ही राजा अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर देता था, जो युवराज कहलाता था और वो राजा के साथ हर फैसले और योजना पर मिलकर काम करता था ताकि वो राजनीति और युद्ध दोनों को कुशलता से समझ सके। वहीं युवराज को जब सत्ता हस्तांतरित की जाती थी तो निवर्तमान राजा उसे 'सेंगोल' सौंपता था, जिसे लेकर इस वक्त देश में चर्चाएं हो रही हैं।

चोल राजवंश का पतन कैसे हुआ?
राजेन्द्र तृतीय चोल वंश के अंतिम शासक रहे। दरअसल 13वीं शाताब्दी के शुरुआती दौर में जब राजराज तृतीय (1218 - 1246 ईस्वी) ने सत्ता संभाली। तब से चोल साम्राज्य का पतन होना शुरू हो गया। होयसल राजाओं ने चोल इलाकों में दखल देना शुरू किया था। होयसल भी दक्षिण के एक राजवंश से थे। उस समय पांड्या राजाओं के उत्तराधिकारी सैंकड़ों सालों से सत्ता से दूर थे। उन्होंने खुद अपनी सेना को संगठित किया और अपनी जमीन वापस लेने के लिए चोल राजाओं के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। 1279 ईस्वी आते-आते राजेंद्र तृतीय के समय चोल साम्राज्य के सैनिक पाड्यों से हार गये। इसके बाद चोल साम्राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया।

चोल वंश से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

  1. चोल राज्य आधुनिक कावेरी नदी घाटी, कोरोमण्डल, त्रिचनापली और तंजौर तक विस्तृत था।
  2. इस राज्य की कोई एक स्थाई राजधानी नहीं थी।
  3. यह क्षेत्र उसके राजा की शक्ति के अनुसार घटता-बढ़ता रहता था।
  4. वर्तमान पंचायती राज्य व्यवस्था चोल शासन की ही देन है।
  5. चोल काल में सोने के सिक्कों को काशु कहते थे।
  6. चोल कालीन सभी मंदिरों में सबसे महत्वपूर्ण नटराज शिव मंदिर है। मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहा जाता था।
  7. चोल साम्राज्य की भाषा संस्कृत और तमिल थी।

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