Facts Sheet: संजीव चतुर्वेदी और एम्स सीवीओ विवाद
नई दिल्ली। एक सरकारी अधिकारी, जिन्हें पांच साल में करीब 12 बार ट्रांसफर का सामना करना पड़ा हो, जाहिर तौर पर आम लोगों के बीच उनकी छवि एक ईमानदार व्यक्ति की ही बनेगी। यही वजह है कि एम्स में नियुक्त स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के उप सचिव संजीव चतुर्वेदी से जब मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) का अतिरिक्त प्रभार वापस लिया गया तो इस खबर ने लोगों का ध्यान खींचा।

विपक्षी दलों और मीडिया के एक हिस्से ने इस घटना को सरकारी तंत्र द्वारा एक विसिल ब्लोअर को प्रताड़ित किए जाने की तरह पेश किया।
निजी स्वार्थ से प्रेरित कुछ लोग सच्चाई की परवाह किए बिना संजीव चतुर्वेदी के कंधे पर बंदूक रखकर केंद्र की एनडीए सरकार पर निशाना साधने लगे।
संजीव चतुर्वेदी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई
सच्चाई ये है कि एनडीए सरकार ने न तो संजीव चतुर्वेदी पर कोई आरोप लगाया है और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की है। वो आज भी एम्स में उप सचिव के पद पर बने हुए हैं। बस, उनसे सीवीओ का अतिरिक्त प्रभार वापस ले लिया गया है और ऐसा करने के लिए सरकार के पास कुछ ठोस वजहें थीं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक संजीव चतुर्वेदी से सीवीओ का अतिरिक्त प्रभार वापस लेने के फैसले को कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता आनंद शर्मा ने "प्रशासनिक आतंकवाद" बताया, जबकि संजीव चतुर्वेदी का उत्पीड़न करने वाली खुद कांग्रेस सरकार ही है। ये हरियाणा की हुड्डा सरकार ही थी, जिसके द्वारा उन्हें बार-बार ट्रांसफर, निलंबन और चार्जशीट का सामना करना पड़ा और उन्हें राष्ट्रपति महोदय के हस्तक्षेप के बाद ही राहत मिल सकी।
नियुक्ति में प्रक्रियागत खामी
ताजा मामले में संजीव चतुर्वेदी से सीवीओ का अतिरिक्त प्रभार वापस लिया जाना भी कांग्रेस सरकार की एक प्रक्रियागत खामी का ही नतीजा है।
तकनीकी पहलुओं में जाने से पहले इस मामले को एक सरल उदाहरण से समझिए। कोई भी व्यक्ति अगर किसी भवन के निकास गेट से प्रवेश करता है तो सुरक्षाकर्मी उसे रोकेंगे, फिर उसके इरादे चाहें कितने भी नेक क्यों न हों।
संजीव चतुर्वेदी को जून 2012 को सीवीओ बनाया गया और इसके कुछ दिन बाद ही केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने स्वास्थ्य मंत्रालय के नाम तीन सितंबर 2012 को एक पत्र लिखकर संजीव चतुर्वेदी की नियुक्ति पर ऐतराज जताया। चूंकि संजीव चतुर्वेदी ने अभी अपना कार्यभार संभाला ही था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सीवीओ के रूप में उनके फैसलों के चलते उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए गए।
केंद्रीय सतर्कता आयोग की आपत्तियां
अपनी आपत्ति में केंद्रीय सतर्कता आयोग ने तीन मुद्दों को उठाया। पहला, संजीव चतुर्वेदी की नियुक्ति आयोग की मंजूरी के बिना की गई है, जबकि विजिलेंस मैनुअल के मुताबिक सीवीओ की नियुक्ति के लिए ऐसा करना जरूरी है।
दूसरा, सीवीओ के रूप में नियुक्ति के लिए उप सचिव स्तर का पद पर्याप्त नहीं है और मंत्रालय को सीवीओ की नियुक्ति के लिए पर्याप्त वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों के नाम आयोग को भेजने चाहिए।
तीसरा, आयोग ने जोर दिया कि एम्स में पूर्णकालीन सीवीओ की नियुक्ति होनी चाहिए।
एक आरटीआई के जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया कि सीवीओ की नियुक्ति के लिए संबंधित विभाग तीन अधिकारियों का एक पैनल तैयार करता है, जिसे मंत्रालय की मंजूरी के बाद सीवीसी को भेजा जाता है और सीवीसी पैनल में से किसी एक अधिकारी को सीवीओ के रूप में नियुक्त कर लेना है।
लेकिन संजीव चतुर्वेदी के मामले में न तो स्वास्थ्य मंत्रालय और न ही सीवीसी को कोई पैनल भेजा गया और एम्स के निदेशक ने अपने स्तर से ही सीवीओ की नियुक्ति कर दी।
नियम तो सभी पर लागू होते हैं
इस तरह एक तरफ तो एम्स के निदेशक ने स्वास्थ्य मंत्रालय के आदेश की अवहेलना की और जब सीवीसी ने उस पर आपत्ति की तो उन्होंने कहा कि वो स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश के बिना सीवीसी की आपत्ति पर कोई संज्ञान नहीं ले सकते हैं।
पूरे मसले पर तत्कालीन केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री नारायणसामी ने संसद में माना कि सीवीसी के द्वारा आपत्ति करने पर कोई भी मुख्य सतर्कता अधिकारी अपने पद पर नहीं रह सकता है। इसके बावजूद चतुर्वेदी एम्स के सीवीओ के रूप में काम करते रहे।
सीवीसी ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया और उन्हें हटाने की इच्छा जताई तो उन्हें हटना चाहिए। नियम तो नियम हैं। सवाल किसी अधिकारी की ईमानदारी या उसकी प्रतिभा का नहीं है। कोई भी व्यक्ति सिर्फ ये कहकर नियमों और तय प्रक्रिया से नहीं बच सकता है कि "भाई मैं तो बहुत ईमानदार हूं, इसलिए मुझ पर कोई नियम लागू नहीं होंगे।"
नियुक्ति को सिर्फ इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता कि चतुर्वेदी पिछले दो साल से अपने पद पर थे। ये पिछली सरकार की लापरवाही को दर्शाता है कि पहले तो नियमों को ताक पर रखकर नियुक्ति की गई और फिर उन्हें इतने लंबे समय तक पद पर बनाए रखा गया।
जिन लोगों ने हवा को नहीं देखा
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के मुताबिक संजीव चतुर्वेदी को नियमित प्रक्रिया के तहत हटाया गया है और इस पर किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब केंद्र की नई एनडीए सरकार को एक ऐसे विवाद में घसीटा गया है, जिससे उसका कोई वास्ता नहीं नहीं था।
बीते दिनों जब एक-दो सभाओं में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मुख्यमंत्रियों की हूटिंग हुई तो देश की संघीय व्यवस्था पर संकट जताते हुए बड़े-बड़े लेख लिखे जाने लगे, जबकि राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच ऐसा होना सामान्य सी बात है।
देश के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न को लेकर बेबुनियाद विवाद खड़ा किया गया। हिंदी के प्रति सरकार के लगाव को कुप्रचारित किया गया।
हद तो तब हो गई जब डब्ल्यूटीओ में भारतीय किसानों के हितों की रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़े होने पर भी सवाल उठाए गए और भारत में एक खास तबके ने इसे एनडीए सरकार का अड़ियल रुख करार दिया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आशावादी हैं। वो कहते हैं कि "गिलास पूरा भरा है। आधा पानी से और आधा हवा से।" लेकिन जो हवा को देख नहीं पाते हैं, उन्हें हमेशा खालीपन यानी कमियों की तलाश रहती है। लेकिन झूठ के पैर नहीं होते और जीत हमेशा सच्चाई की होती है। यही वजह है कि केंद्र सरकार के खिलाफ कोई भी कुप्रचार लंबे समय तक टिक नहीं पाता है।
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