जानिए क्या हो जाता अगर जवाहर लाल नेहरू की जगह होते केजरीवाल

Arvind Kejriwal
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल जब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय की ओर बढ़ रहे थे, तब गुजरात पुलिस ने उन्हें बीच में ही रोक लिया। केजरीवाल गुस्सा गये और अपना टेम्परामेंट लूज कर दिया... केजरीवाल गुजरात के मॉडल की खामियां गिनाने लगे और उनके समर्थक वंदे मातरम के नारे लगाने लगे। इन सबके बीच जो सबसे रोचक बात रही, वो यह कि केजरीवाल मोदी से बतौर आप के नेता नहीं बल्‍कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में मिलने जा रहे थे।

यह बात हम नहीं बल्कि उन्हीं के साथी मनीष सिसोदिया का कहना है। जब केजरीवाल को रोका गया तो मीडिया को संबोध‍ित करते हुए सिसोदिया ने कहा, "अरविंद केजरीवाल जी आज गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने बीच में ही रोक लिया। फिर जब हम चार लोग मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचे और कहा दिल्ली के मुख्यमंत्री, मोदी साहब से मिलना चाहते हैं, तो अंदर से जवाब आया कि आज सीएम साहब व्यस्त हैं।" सिसोदिया ने आगे कहा, "अब बताइये जिस राज्य में एक मुख्यमंत्री को दूसरे मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया जाये, उस राज्य में किसका राज चलता है आप समझ सकते हैं।"

अब चलिये 61 साल पीछे

इस वाक्ये के साथ अब हम आपको 61 साल पीछे ले चलते हैं। यह वाक्या है लखनऊ विश्वविद्यालय का जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे और आचार्य नरेंद्र देव विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर। नेहरू जी लखनऊ दौरे पर थे यह सब जानते थे, लेकिन और इसकी लिखित सूचना विश्वविद्यालय प्रशासन को नहीं दी गई थी। आचार्य जी कक्षा ले रहे थे और तभी पीएक के काफिले ने विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। सुरक्षा बल अलर्ट हो गये, तमाम श‍िक्षक अचानक पहुंचे नेहरू जी की आवोभगत में लग गये, लेकिन आचार्य नरेंद्र देव ने पढ़ाना जारी रखा। नेहरू जी ने कुलानुशासक से पूछा आचार्य जी कहां हैं? कुलानुशासक ने कहा, वे कक्षा ले रहे हैं।

प्रधानमंत्री नेहरू जी सीधे कक्षा के अंदर पहुंच गये। आचार्य जी ने नेहरू जी से सवाल किया, "आप यहां कैसे आ गये, ये विश्वविद्यालय है आपको पहले प्रशासन की अनुमति लेनी चाहिये थी। प्रोटोकॉल के मुताबिक आपको बिना सूचना यहां नहीं आना चाहिये था। खैर अब अगर आ गये हैं, तो कृपया हमारे दफ्तर में बैठें, हमारी कक्षा खत्म ही होने वाली है।" यह वाक्य किसी और ने नहीं बल्कि उसी कक्षा में मौजूद आचार्य नरेंद्र देव के श‍िष्य केसी मिश्रा ने एक खास बातचीत में बताया। केसी मिश्रा उत्तर प्रदेश के पूर्व पर्यटन निदेशक हैं जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं और वर्तमान में लखनऊ के गोमतीनगर में रहते हैं।

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जरा सोचिये अगर नेहरू जी की जगह केजरीवाल होते तो क्या होता? क्या केजरीवाल नेहरू जितना संयम बरतते, नहीं! वो वहीं गुस्से से लाल-पीले हो जाते और कहते मैं यह देखने आया हूं कि विश्वविद्यालय में क्या चल रहा है। मैं प्रधानमंत्री हूं और मुझे कैसे कक्षा तक जाने से आप रोक सकते हैं। और तो और वो आचार्य जी पर तमाम आरोप लगा डालते। हो सकता है विश्वविद्यालय के बाहर केजरीवाल के समर्थक प्रदर्शन करने लगते और अगर मामला ज्यादा गहराई में जाता, तो शायद विश्वविद्यालय छात्रों और केजरीवाल के समर्थकों के बीच पत्थरबाजी भी हो जाती, क्योंकि तब लखनऊ विश्वविद्यालय का एक-एक छात्र आचार्य जी का भक्त था। अंत में दूसरे दिन अखबारों में हेडललाइन होती, "पीएम केजरीवाल ने राज्यपाल से की लविवि कुलपति को निलंबित करने की सिफारिश"।

जब नेहरू जी पहुंचे बाल सुधार गृह

नेहरू जी का दूसरा वाक्य आपको बताना चाहूंगा, जो उत्तर प्रदेश कारागार महानिदेशालय के पूर्व वरिष्ठ संपरीक्षक ने मुझे बताया। 1963 में पीएम नेहरू एक बार अचानक बरेली के बाल सुधार गृह पहुंच गये। प्रधानमंत्री के काफिले को देख सारे द्वार तुरंत खोल दिये गये, नेजरू जी जेलर एमएम खान के कमरे तक जा पहुंचे। जेलर खान ने उन्हें देखा और सबसे पहले संतरी से सवाल किया- "तुमने जेलर की बगैर परमीशन के जेल के गेट क्यों खोले? फिर नेहरू जी से कहा, सर प्रोटोकॉल के मुताबिक बिना सूचना और गेट पर एंट्री किये बगैर आप जेल के अंदर प्रवेश नहीं कर सकते?" नेहरू जी जेलर खान से इतने प्रभावित हुए कि गले से लगा लिया और बिना इजाजत अंदर आने के लिये माफी मांगी। साथ में तर्क दिया कि मैं जेल में बंद बच्चों से मिलना चाहता था।

जरा सोचिये अगर केजरीवाल उनकी जगह होते तो क्या होता? उनको तुरंत जेल में भ्रष्टाचार की दुर्गंध आने लगती। हो सकता है, वो जेलर को तुरंत सस्पेंड कर देते या फिर पूरे मीडिया को वहां इकठ्ठा कर लेते। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उसी जेलर को नेहरू जी के विशेष आदेश पर ईनाम के रूप में नौकरी में दो साल का एक्सटेंशन मिला था। जरा सोचिये नेहरू जी से जुड़े ये वो वाक्ये हैं, जो कभी अखबारों की सुर्ख‍ियां नहीं बने।

इन दो वाक्यों को पढ़ने के बाद आप कहेंगे कि केजरीवाल को क्यों टारगेट किया जा रहा है, प्रोटोकॉल को तो आज कोई नेता नहीं मानता, तो हमारा जवाब सिर्फ इतना है कि कोई और नेता ढिंढोरा नहीं पीटते हैं।

जरा सोचिये आज केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री नहीं हैं, इस्तीफा दिये करीब एक महीना हो गया है, लेकिन आज भी केजरीवाल खुद को बतौर दिल्ली का मुख्यमंत्री पेश कर रहे हैं। वो समझते हैं कि वो जो चाहे कर सकते हैं, फिर चाहे आचार संहिता के बीच बिना इजाजत काफीला लेकर चलने की बात हो या फिर बिना अपॉइंटमेंट किसी मुख्यमंत्री से मिलना।

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