Parsi community in Gujarat Election: गुजरात का पारसी समुदाय जिसकी राजनीति में रत्तीभर भी रुचि नहीं
गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहा है, फिर भी पारसियों की उपस्थिति कहीं नजर नहीं आती। अपनी घटती आबादी और सिमटते परिवार के बीच गुजरात के पारसी गुजरात चुनाव से पूरी तरह नदारद हैं।
भारत जब विषम राजनीतिक परिस्थितियों से गुजर रहा था, तब नवसारी में 1839 में जन्मा एक पारसी किशोर सोलह साल की उम्र में भारत के औद्योगीकरण के सपने देख रहा था। वह सोच रहा था कि भारत कैसे अपने पैरों पर खडा हो।

सो, जवान होते होते कोशिशें परवान चढ़ी और 1868 में 21 हजार रुपए की पूंजी से खड़ी की गई उनकी ट्रेडिंग कंपनी को आज दुनिया टाटा ग्रुप के नाम से जानती है और उसके संस्थापक जमशेदजी टाटा को आधुनिक भारतीय उद्योग जगत के जनक के रूप में।
राष्ट्र निर्माण सहित देश व गुजरात की राजनीति में भी उनका योगदान रहा। जमशेदजी टाटा के अलावा भी व्यापार, खेल, फौज, विज्ञान, तकनीक, कला, संस्कृति, सिनेमा, नाटक और पत्रकारिता आदि सभी क्षेत्रों में पारसी सक्रिय थे। अब भी, बेहद कम होने के बावजूद बाकी सारे क्षेत्रों में तो पारसी सक्रिय हैं, मगर राजनीति में कहीं नहीं दिखते।
हालांकि, एक जमाने में पारसी भी राजनीति में अपना काफी सक्रिय योगदान दे रहे थे। गुजरात के पारसी सांसद पीलू मोदी और मीनू मसानी ने दिल्ली जाकर डंका बजाया, तो बरजोरजी पारडीवाला गुजरात विधानसभा में सर्वोच्च पद तक पहुंचे। नौशीर दस्तूर और नलिनी नौसीर दस्तूर भी 70 के दशक में कच्छ से विधायक चुने गए। मगर आज जब, गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहा है, तब पारसी समुदाय सिर्फ मतदाता के रूप में है, उम्मीदवार के रूप में नहीं।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष केरसी देबू कहते हैं कि "वोट बैंक के वर्तमान राजनीतिक दौर में जब सारा गुणा भाग ही वोटों की संख्या के गणित पर ही आधारित हो, तो कम आबादी वाले जाति - समुदायों को प्रतिनिधित्व कैसे मिल सकता है।" देबू की यह चिंता वोट बैंक की राजनीति के दौर में चिंतन का विषय है। कारण जो भी हो, गुजरात की राजनीति में पारसियों की उपस्थिति अब नहीं है।
सन 2011 की जनगणना के अनुसार गुजरात में केवल 9727 पारसी थे, जो अब बढ़ भी गए होंगे, तो 10 हजार से तो ज्यादा हर हाल में नहीं होंगे। भारत में सन 1941 में पारसियों की संख्या 1.14 लाख थी, लेकिन यह लगातार घटती जा रही है।
केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2011 में पारसी 69601 थे, जो घटकर 2020 में 57264 ही रह गए। यह बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या वाले देश भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि पारसी समुदाय की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है।
गुजरात से निकलकर दुनिया भर में छा गए पारसियों की गुजरात में उपस्थिति देखें, तो गुजरात के जामनगर में केवल 11 पारसी परिवार हैं, पोरबंदर में 8 परिवार हैं, और राजकोट में 3 परिवारों सहित पूरे सौराष्ट्र में केवल 10-12 पारसी परिवार ही बचे हैं।
अहमदाबाद जैसे गुजरात के सबसे बड़े शहर में भी पारसियों की संख्या केवल 700 के आसपास ही है। बड़ोदा, भरूच, सूरत, नवसारी, बिलीमोरा, वलसाड़, वापी, उदवाड़ा, संजाण, पारडी, व्यारा आदि में भी गिने चुने पारसी रहते हैं।
पारसियों की घटती आबादी का बड़ा कारण उनका अपने आप में सिमट जाना है। पारसी अकेलापन पसंद करते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने पारसी जनसंख्या बढ़ाने के लिए जीवो पारसी योजना शुरु किया है। लेकिन यह योजना भी कैसे सफल होगी, क्योंकि जो 57 हजार के आसपास पारसी रह गए हैं, उनमें से 31 फीसदी पारसी बुजुर्ग यानी 60 साल से ज्यादा उम्र के हैं और 30 फीसदी पारसी अविवाहित हैं।
इतिहास में जाएं, तो लगभग 1485 साल पहले पारसी ईरान से गुजरात आए थे। कहते हैं कि सातवीं शताब्दी में ईरान में जरथुस्त्र धर्म में आस्था रखने वाले पारसियों पर अरबों ने धर्म परिवर्तन का दबाव डाला, तो कुछ पारसी इस्लामिक जुल्म से बचने के लिए एक नाव पर सवार होकर भारत भाग आये। वे गुजरात में सूरत के पास संजाण बंदरगाह पर उतरे और यहां की भाषा अपनाकर वे पूरी तरह से गुजरातियों में दूध में शक्कर की तरह घुल गए।
पारसियों की इस संस्कार सरिता को समझने के लिए केवल यही एक उदाहरण काफी है कि आज भी दो पारसी चाहे नवसारी में मिलें या न्यूयॉर्क में, वे सिर्फ गुजराती में ही बात करेंगे। यहां से भले ही वे दुनिया के कई देशों में गए, लेकिन उन्होंने अपनी गुजराती पहचान को संस्कारों में समाहित कर लिया, जिसे कभी और कहीं नहीं छोड़ा। काफी पढ़े लिखे होने के बावजूद आज भी वो लोग घर में गुजराती ही बोलते हैं। इसलिए पारिसयों को गुजराती ही माना जाता है। उनका सबसे बड़ा तीर्थ उदवाड़ा भी गुजरात में ही है, जिसे मुख्यमंत्री रहते मोदी ने सजा संवार दिया था।
गुजरात विधानसभा के सातवें अध्यक्ष बने बरजोरजी पारडीवाला ने 1985 का विधानसभा चुनाव वलसाड़ से जीता। उनके अलावा जनसंख्या के मामले में अत्यंत ही अल्पसंख्यक होने के बावजूद, पारसी समुदाय के लोग नगरपालिकाओं में सदस्य, और सूरत, वडोदरा और अहमदाबाद नगर निगमों में नगर सेवक होने के अलावा वलसाड, नवसारी और भरूच नगर पालिकाओं में सभापति भी रहे और लोकसभा और विधानसभा में भी पहुंचे। लेकिन अब वे राजनीति में कहीं नजर नहीं आते।
केरसी देबू कहते हैं "राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है, इस कारण वैचारिक स्पष्टता, सच्चाई, नैतिकता, ईमानदारी, और परोपकार की भावना वाला पारसी समुदाय स्वयं को वर्तमान राजनीतिक तस्वीर में फिट नहीं मानता।" लेकिन नवसारी के एक स्कूल में प्रिंसिपल बॉमी जागीरदार मानते हैं कि तेजी से कम होती आबादी भी राजनीति में पारसियों के घटते प्रतिनिधित्व के लिए जिम्मेदार है। फिर भी तापी जिले के व्यारा और एकाध जगह पर पारसी युवक सक्रिय हैं, लेकिन उनको नगरपालिका का टिकट मिल जाए, तो भी बड़ी बात होगी।
गुजरात में इस बार के विधानसभा चुनाव में भी किसी भी राजनीतिक दल ने पारसी प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है, और वोट बैंक के जमाने में संख्या के मामले में लगभग नगण्य इस समुदाय को आगे भी टिकट मिलने की कोई संभावना नहीं दिखती।
लेकिन इन सबसे पारसियों को कोई फर्क भी नहीं पड़ता, उनको राजनीति, उम्मीदवारी, चुनाव और जीत से कोई खास मतलब भी नहीं लगता। उन्हें तो बस शांति चाहिए। वैसे भी, जो समुदाय घर में बच्चों की किलकारी तक को भी अपने जीवन की शांति में व्यवधान मानता हो, उसके लिए क्या तो राजनीति, क्या उम्मीदवारी और क्या चुनाव। चलने दीजिए चुनाव, पारसी समुदाय को तो उसकी चर्चा से भी कोई मतलब नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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