आया एक और Friday the 13th: बहुत लंबी है नरेंद्र मोदी की डगर

भाजपा में आयी स्थिरता
13 सितंबर 2013 को जब मोदी को पीएम प्रत्याशी चुना गया, तब लाल कृष्ण आडवाणी ने थोड़ी नाराजगी तो जताई लेकिन तब सब कुछ सामान्य हो गया, जब मोदी की रैलियां देश भर में रंग लाने लगीं। जब मोदी ऊपर उठने लगे तो शुरुआत में तमाम कयास लगाये गये, कि अब भाजपा डूब जायेगी, लेकिन पार्टी के अंदर एक प्रकार के लोकतांत्रिक बल ने भाजपा को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया कि देश के एक नहीं बल्कि चार राज्यों ने उसे जमकर सराहा और स्वीकार किया।
सच पूछिए तो मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाना भाजपा के लिये आत्मघाती निर्णय हो सकता था, लेकिन चूंकि देश के हर कोने से एक स्वर में जनता की आवाज निकल चुकी थी, इसलिये भाजपा ने यह रिस्क लेना ही ठीक समझा। इसमें मोदी का वो कदम कारगर साबित हुआ, जिसमें उन्होंने विहिप की अयोध्या में चौरासी कोसी यात्रा से दूर रहना बेहतर समझा। मोदी ने तमिलनाडु में अपने भाषण में कहा, मेरा धर्म मंदिर-मस्जिद नहीं, मेरा धर्म जनता की सेवा है, आज देश में मंदिर से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं।
पुराने मित्रों को साथ लाये
नरेंद्र मोदी ने न केवल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को मजबूत किया, बल्कि पुराने मित्रों को जो दूर हो चुके थे, उन्हें वापस लेकर आये। हालांकि अभी अधिकारिक तौर पर ये मित्र पार्टी या एनडीए से नहीं जुड़े हैं, लेकिन हां, एक रिश्ता जरूर बन गया है। उसमें सबसे पहला नाम है कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का, जिन्होंने भाजपा छोड़कर केजेपी का गठन किया। अब एक बार फिर भाजपा की ओर खिंचे हुए दिख रहे हैं।
दूसरा नाम झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी हैं, जो भाजपा को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। तेलुगू देसम पार्टी भी भाजपा के साथ आ सकती है। अगर विरोधी दलों की बात करें तो मोदी सपा, बसपा और तृणममूल कांग्रेस के लिये भी सकारात्मक सोच रखते हैं। इससे यह साफ है कि एंटी-कांग्रेस कार्यों में मोदी अपने साथ सबको जोड़ना चाहते हैं।
हुआ मोदी का परीक्षण
जब सोशल नेटवर्क साइटों पर नरेंद्र मोदी सक्रिय हुए, तब तमाम नेताओं ने उनका मजाक उड़ाया, लेकिन आज आलम यह है कि पार्टी के आलाकमान खुद अपने नेताओं से सोशल मीडिया में सक्रिय होने के निर्देश दे रहे हैं। ऐसे में एक सवाल हमेशा से बना हुआ था कि क्या मोदी का सोशल नेटवर्क भाजपा को वोट दिलायेगा। तो मोदी का यह परीक्षण मध्य प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में हुआ और वो सफल हुए।
चार राज्यों में मोदी की लहर
पिछले तीन महीने में जिस तरह नरेंद्र मोदी ने रैलियां कीं, उसी का असर है कि पांच में से चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मोदी की लहर देखने को मिली। मध्य प्रदेश में शिवराज इफेक्ट के साथ-साथ मोदी इफेक्ट भी खासा देखने को मिला था। छत्तीसगढ़ में रमन को मजबूती दी और राजस्थान में तो चुनाव जीतने के बाद नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद कहा कि उनकी जीत में मोदी और राजनाथ का बाड़ा हाथ है। बात अगर दिल्ली की करें तो यहां भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
प्रचार लोकसभा के लिये
मोदी के हाव-भाव, काम करने के तरीके, व्यस्ततम कार्यक्रम को देखते हुए यह साफ है कि पीएम पद का प्रत्याशी बनने के बाद वो एक मिनट भी शांत नहीं बैठे हैं। जो जिम्मेदारी पार्टी ने उन्हें दी है, वह उन्हें बखूबी निभा रहे हैं। भाजपा की युवा इकाई भाजयुमो से लेकर अंत्योदय इकाई तक हर कार्यकर्ता इस समय लोकसभा चुनाव के लिये पूरी तरह चार्ज है।












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