Dr Rajendra Prasad: दो बार राष्ट्रपति रहे राजेंद्र बाबू का भारतीय चिंतन नेहरू की पश्चिमी सोच से अलग था
महात्मा गांधी ने डॉ.राजेंद्र प्रसाद को अजातशत्रु कहा था। अजातशत्रु यानि जिसका कोई दुश्मन न हो। भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू का व्यवहार इतना सरल था कि कोई भी उनसे प्रभावित हो जाता था।

स्वाधीन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सिवान जिला स्थित जीरादेई गांव में हुआ था। उन्हें 'राजेंद्र बाबू' के नाम से भी जाना जाता है। उनके पिता का महादेव सहाय और माता कमलेश्वरी देवी थी। राजेंद्र बाबू के पिता संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे।
राजेंद्र बाबू के बारे में कहा जाता है कि जब वे छपरा के जिला स्कूल में पढ़ रहे थे, तब एक परीक्षा के बाद उनकी कॉपी किसी परीक्षक के पास जांचने के लिए गयी तो उस परीक्षक ने लिखा, 'परीक्षक से ज्यादा मेधावी छात्र है'।
राजेंद्र बाबू ने 1917 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए चंपारण सत्याग्रह में भाग लिया। 1930 के नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 1934 में ब्रिटिश हुकूमत ने बिहार में भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए उन्हें रिहा कर दिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहली बार 1934 में कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसके अतिरिक्त, 1939 और 1947 में भी वे कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फिर से गिरफ्तार किया गया और लगभग तीन वर्ष के कारावास के बाद 1945 में उन्हें जेल से रिहा किया गया। 1946 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार में राजेंद्र बाबू को खाद्य और कृषि मंत्री बनाया गया। 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
राजेंद्र बाबू बने देश के पहले नागरिक
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू देश का पहला राष्ट्रपति सी. राजगोपालाचारी को बनाना चाहते थे। हालांकि, सरदार वल्लभभाई पटेल और कई कांग्रेसी नेताओं के दबाव के चलते उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर सहमत होना पड़ा।
पूर्व खुफिया अधिकारी आरएनपी सिंह ने अपनी पुस्तक 'नेहरू: अ ट्रबल्ड लिगेसी' में एक पत्र का उल्लेख किया है। यह पत्र 10 सितंबर 1949 को प्रधानमंत्री नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को लिखा था। इस पत्र में प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा था कि राष्ट्रपति के पद के लिए मेरी सरदार वल्लभभाई पटेल से बातचीत हुई है और हमारी सहमति इस बात पर बनी है कि सी. राजगोपालाचारी यह पद संभालें।
प्रधानमंत्री के इस पत्र के जवाब में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लिखा कि पार्टी में मेरी हैसियत को देखते हुए मेरे साथ सही बर्ताव किया जाना चाहिए। राजेंद्र बाबू ने इस पत्र की एक कॉपी सरदार पटेल को भी भेज दी। जबकि सरदार पटेल ने यह कभी कहा ही नहीं था कि राष्ट्रपति पद के लिए सी. राजगोपालाचारी के नाम का प्रस्ताव हो। इसके बाद, प्रधानमंत्री ने अपने जवाबी पत्र में लिखा कि मेरे लिखे पत्र से सरदार पटेल का कोई लेना देना नहीं है। मैंने अपने अनुमान के आधार पर यह बात लिखी थी।
साल 1952 डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति चुने गये। फिर 1957 के राष्ट्रपति चुनाव में प्रधानमंत्री नेहरू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। मगर पार्टी पर पकड़ और वरिष्ठ नेताओं की सहमति के चलते डॉ. राजेंद्र प्रसाद को दोबारा मौका मिला।
राष्ट्रपति भवन में भारतीय संस्कृति
राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति रहने के दौरान जब कोई विदेशी अतिथि राष्ट्रपति भवन आता था, तो स्वागत स्वरूप उसकी आरती की जाती थी। राजेंद्र बाबू यह चाहते थे कि विदेशी अतिथि भारतीय संस्कृति और परंपरा को जानें।
हिंदी भाषा के प्रति राजेंद्र बाबू का लगाव
1955 में राष्ट्रभाषा प्रचारकों को संदेश देते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि हिंदी निःसंदेह हमारी राष्ट्रभाषा घोषित हो चुकी है। संविधान में भी उसे स्थान मिला है। इस संबंध में हमें दो बातें नहीं भूलनी चाहिए। एक तो यह कि घोषणा मात्र से कोई भाषा किसी समस्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन जाती है और दूसरी यह कि भारत में अहिंदी भाषी राज्य भी हैं, जिनके निवासी राष्ट्रभाषा से परिचित नहीं हैं।
डॉ. प्रसाद ने कहा कि हिंदी को पूरे राष्ट्र की भाषा बनाना और गैर-हिंदी भाषी लोगों में इसका प्रचार करने की जिम्मेदारी सभी हिंदी भाषियों की है। हिंदी किसी प्रादेशिक भाषा का स्थान नहीं लेना चाहती और न ही इसके प्रचार का उद्देश्य किसी गैर-हिंदी भाषी राज्य को असुविधा में डालना है। ये ऐसी बातें हैं जिनको समझना और दूसरों को समझाना राष्ट्रभाषा के प्रचार जितना ही महत्त्वपूर्ण काम है।
प्राचीन और आधुनिक विद्याओं में तालमेल के पक्षधर
जनवरी 1957 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग का शिलान्यास करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि आधुनिक जगत ने निश्चय ही विज्ञान, औद्योगीकरण और अन्य आविष्कारों में बहुत प्रगति की है और इस दृष्टि से दो हजार साल पहले का मनुष्य बीसवीं सदी के मनुष्य की तुलना में पिछड़ा हुआ दिखाई देता है। लेकिन जहां तक चिंतन, मनन, शिक्षण, कला-प्रेम, साहित्य, जीवन में सच्चे सुख की प्राप्ति, शांतिपूर्ण ढंग से रहन-सहन आदि आधारभूत मानवीय समस्याओं का संबंध है, मैं नहीं समझता कि आधुनिक मानव प्राचीनकालीन मानव से इतना आगे बढ़ा है कि प्राचीन काल की सफलताओं अथवा विचारधारा की वह उपेक्षा कर सके। यहां तक कि प्राचीन विद्या में ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो आधुनिक परिस्थितियों के अभावों की पूर्ति कर सकते हैं और यदि आधुनिक मानव उन्हें ग्रहण कर सके, तो वह अपने जीवन को अधिक सुखी और सफल बना सकता है।
इस अवसर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आगे कहा कि प्राचीन और आधुनिक विद्याओं और विचारधाराओं के समन्वय को मैने हमेशा महत्त्वपूर्ण समझा है। मेरी यह धारणा है कि प्राचीन विद्या और विचारधारा से परिचय आज भी मानव के लिए उपलब्ध ज्ञान का आवश्यक अंग है। इन दोनों विचारधाराओं में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। क्योंकि, सृष्टि के आरंभ से ही मानव की महत्वाकांक्षा तथा उसका प्रयास एक ही रहा है। अर्थात वह निजी जीवन को किस प्रकार अधिक से अधिक सुखी बनाए और अपनी परिस्थितियों को किस प्रकार इस महत्वाकांक्षा के अनुरूप करे। जिन्हें हम आधुनिक विचार कहते हैं, उनकी नींव इतनी भी नयी नहीं है। इस नींव के निर्माण में सदियों पुरानी परंपरागत विचारधारा ने योगदान दिया है। इसलिए आवश्यक है कि हम इस तथ्य को अपने जीवन में अनुभव करें और प्राचीनता तथा आधुनिकता के बीच तालमेल का प्रयास करें।
वैज्ञानिकता पर राजेंद्र बाबू की राय
दिसंबर 1951 में दिल्ली में आयोजित भारतीय विज्ञान अकादमी की बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि हालांकि, मैं विज्ञान का जानकार होने का दावा नहीं करता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि सभी विज्ञानों का अंतिम उद्देश्य और व्यावहारिक लक्ष्य सामान्य व्यक्ति की भलाई और प्रगति होनी चाहिए और सामान्य व्यक्ति होने के नाते मैं इस बात की उम्मीद करूंगा कि वैज्ञानिक अपना समय, ऊर्जा, बुद्धि और ज्ञान मनुष्य की कल्याण के लिए समर्पित करेंगे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मैं बिना किसी हिचकिचाहट के एक बात और कहना चाहूंगा कि आधुनिक विज्ञान को पिछली उपलब्धियों की उपेक्षा या तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
एक सफल जीवन का अंत
राष्ट्रपति पद पर दो सफल और लोकप्रिय कार्यकाल पूरे करने के बाद, राजेंद्र बाबू ने राजनीति से संन्यास ले लिया और वे पटना स्थित सदाकत आश्रम में रहने लगे। राजेंद्र बाबू की पत्नी राजवंशी देवी का जब सितंबर 1962 में निधन हो गया, तो उनके निधन के एक महीने के अंदर ही चीन के खिलाफ युद्ध से जूझ रहे देश के सिक्योरिटी फंड के लिए राजेंद्र बाबू ने अपनी पत्नी के सारे गहने दान कर दिए। 1962 में ही राजेंद्र बाबू को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 28 फरवरी 1963 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद का निधन हो गया।
-
Weather Delhi NCR: दिल्ली में मौसम का डबल अटैक, अगले 72 घंटों में आने वाला है नया संकट, IMD का अलर्ट -
मौत से हुआ सामना? दुबई से हैदराबाद लौटीं सानिया मिर्जा, आपबीती सुनाते हुए बयां किया दर्द -
'बच्चे के लिए किसी के साथ भी सो लूंगी', वड़ा पाव गर्ल Chandrika Dixit का शॉकिंग बयान, लोग बोले- ये बाजार में -
Parliament session: 'मोहब्बत हमसे, शादी मोदी से', राज्यसभा में बोले खड़गे, वायरल हुआ PM का रिएक्शन -
LPG Cylinder: कमर्शियल गैस सिलेंडर पर सरकार का चौंकाने वाला फैसला, आज से बदल गए नियम! -
Donald Trump Iran War: टूट के कगार पर NATO? ट्रंप ने सरेआम यूरोप को कहा 'धोखेबाज', आधी रात को लिया बड़ा फैसला -
Gold Rate Today: थमी सोने की रफ्तार, कीमतों में जबरदस्त गिरावट! खरीददारी से पहले चेक कर लें लेटेस्ट रेट -
Silver Price Today: चांदी की कीमतें क्रैश! मार्च महीने में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट, कितना हुआ सिल्वर का रेट? -
Gold Rate Today: अचानक पलटा ट्रेंड! सोने में जोरदार उछाल, दिल्ली से पटना तक आज 22K-24K गोल्ड का ताजा भाव -
LPG सिलेंडर के लिए e-KYC क्या सभी कस्टमर्स के लिए अनिवार्य है? पेट्रोलियम मंत्रालय का आया बड़ा बयान -
Saudi Arabia Eid Ul Fitr 2026 : सऊदी अरब में 20 मार्च को मनाई जाएगी ईद, भारत में कब दिखेगा चांद? -
Iran Vs America: ईरान के बाद अब चीन पर कहर बनकर टूटेंगे ट्रंप! अमेरिकी रिपोर्ट के खुलासे से हड़कंप












Click it and Unblock the Notifications