Homi Jehangir Bhabha: प्रधानमंत्री नेहरू को ‘भाई’ कहकर बुलाते थे होमी जहांगीर भाभा

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. भाभा दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे।

Death Anniversary of Homi Jehangir Bhabha call Prime Minister Nehru as bhai

Homi Jehangir Bhabha: 24 जनवरी 1966 को भारत के परमाणु प्रोग्राम के जनक कहे जाने वाले डॉ. होमी जहांगीर भाभा का प्लेन क्रैश में निधन हो गया था। वैसे होमी भाभा की मौत संदेह के घेरों में रही है क्योंकि उनकी मौत ऐसे समय पर हुई थी, जब उन्होंने तीन महीने पहले ही एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर उन्हें ग्रीन सिग्नल मिले तो भारत को 18 महीनों के अंदर ही परमाणु बम बनाकर दे सकते हैं। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि भारत के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका देने के लिए दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों ने उनकी हत्या करवाई हो।

दरअसल, भारत को आजादी मिलने के कुछ ही महीने बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण की कोशिशें तेज कर दी। इस प्रयास में प्रधानमंत्री नेहरू की मुलाकात डॉ. होमी जहांगीर भाभा से हुई। जिन्होंने यूरोप की यात्रा के बाद, अप्रैल 1948 में प्रधानमंत्री को एक शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम की दिशा में पहला लेकिन अहम कदम उठाने की जरूरत पर एक पत्र लिखा। यह भारत के पहले परमाणु ऊर्जा आयोग (एईसी) की शुरुआत थी।

डॉ. भाभा ने पहले ही अपने ज्ञान से देश का ध्यान आकर्षित कर लिया था। दरअसल, 1945 में उन्होंने कोलाबा में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) परिसर में टाटा समूह के सहयोग से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

प्रधानमंत्री नेहरू के 'भाई' थे डॉ. भाभा

प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ. होमी जहांगीर भाभा की दोस्ती को लेकर आर्काइवल रिसोर्सेज़ फॉर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी लिखती हैं कि नेहरू को सिर्फ दो लोग 'भाई' कहते थे। जिसमें से एक जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी जहांगीर भाभा थे। उन्होंने अपनी किताब में उन पत्रों को भी दिखाया है जिसमें डॉ. भाभा, प्रधानमंत्री नेहरू को 'डियर भाई' लिखकर संबोधित कर रहे है जबकि प्रधानमंत्री, उन्हें 'माय डियर होमी' लिख रहे हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी एक बार अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री नेहरू को डॉ. भाभा अक्सर देर रात में फोन करते थे और वे हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे। डॉ. भाभा से बात करने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू हमेशा खुश और संतुष्ट दिखते थे।

अंग्रेज वैज्ञानिक पैट्रिक बैंकेट DRDO (Defence Research and Development Organisation) के सलाहकार थे। उनका कहना था कि जवाहर लाल नेहरू को बौद्धिक कंपनी (साथ) बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला जाया करती थी। भाभा का सोचने का दायरा बहुत बड़ा था। वो वर्तमान के साथ-साथ भविष्य में होने वाली घटनाओं और समय की जरूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे।

डॉ. भाभा की सलाह मानते थे प्रधानमंत्री नेहरू

IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक होमी भाभा ने ही जवाहर लाल नेहरू को यह बताया था कि परमाणु ऊर्जा आयोग तीन प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों का एक छोटा ग्रुप होना चाहिए और सरकार के किसी अन्य विभाग के बजाय सीधे प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र में यह होना चाहिए। जो आज तक बना हुआ है।

ऐसे हुई थी प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ. भाभा की मुलाकात

A Masterful Spirit: Homi j. Bhabha, (1909-1966) में अन्नया दासगुप्ता और इंदिरा चौधरी लिखती हैं कि भाभा और नेहरू की पहली मुलाकात ऐतिहासिक नहीं थी, जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी के एक भाषण का हवाला देते हुए लिखा है कि बंबई में होमी भाभा ऑडिटोरियम के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि, "युवा भाभा सबसे पहले नेहरू से उनके चाचा सर दोराबजी टाटा के घर पर मिले होंगे, जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई नेता इकट्ठा हुआ करते थे।" प्रधानमंत्री इंदिरा ने अपनी और डॉ. भाभा की मुलाकात पर बताया कि मैं पहली बार भाभा से तब मिली, जब 1938 में मैं अपने पिता के साथ मार्सिले के लिए जहाज से यात्रा कर रही थीं। तब नेहरू और बीस साल के भाभा कैंब्रिज गए थे। भाभा तब बंबई में एक स्कूली छात्र थे।

प्रधानमंत्री नेहरू को डॉ. भाभा पर पूरा यकीन था

प्रधानमंत्री नेहरू न सिर्फ विज्ञान की महत्ता को समझते बल्कि उसके संवर्धन में हमेशा ही एक कदम आगे बढ़कर सहयोग करते थे। वे कम-से-कम इस मामले में जल्दी निराश नहीं होते थे। वहीं, डॉ. भाभा भी उन्हें विज्ञान के बारे हर छोटी-बड़ी बात से अवगत कराते रहते थे। जिसका एक उदाहरण है कि 29 फरवरी 1948 को तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को लिखे एक पत्र से मिलता है। नेहरू लिखते हैं, "मेरी अभी डॉ. होमी भाभा से बातचीत हुई है। उन्होंने मुझे परमाणु ऊर्जा अनुसंधान पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी है। मेरी इसमें बहुत रूचि है और मुझे यकीन है कि हमें गंभीरता से इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर देने चाहिए। हालांकि, इससे तुरंत कोई नतीजा नहीं निकलेगा लेकिन भविष्य उनका होगा जो परमाणु ऊर्जा पैदा करने में सक्षम होंगे।" बता दें कि यहां से स्वाधीन भारत का पहला वैज्ञानिक अनुसंधान शुरू हुआ जिसका नेतृत्व डॉ. होमी जहांगीर भाभा के हाथों में था।

स्पेस प्रोग्राम में भी रूचि थी डॉ. भाभा की

जब एक तरफ भारतीय परमाणु ऊर्जा अनुसंधान अपने शुरूआती चरणों में था, तभी 1959 में रूस ने स्पुतनिक उपग्रह का अंतरिक्ष में प्रक्षेपण कर दिया। डॉ. भाभा को जल्दी ही यह समझ आ गया कि अनुसंधान (रिसर्च) के लिए अब अंतरिक्ष एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन जायेगा। अतः 1963 में स्पेस फिजिक्स की पहली संगोष्ठी में उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यकम को शुरू करने के प्रयासों पर जोर देते हुए कहा, "अगर हमने यह काम (स्पेस अनुसंधान) आज नहीं किया, बाद में हमें दूसरे देशों से अधिक कीमत पर जानकारी लेने के लिए निर्भर होना पड़ेगा।"

इसलिए प्रधानमंत्री नेहरू की स्वीकृति पर अंतरिक्ष अनुसंधान के सुचारू रूप से संचालन के लिए 1962 में ही इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च (INCOSPAR) की स्थापना हो गयी थी, जिसे 1969 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) में परिवर्तित कर दिया गया। इसी बीच, 1963 में ही डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में केरल के थुम्बा गांव से एक साउडिंग रॉकेट का प्रक्षेपण कर भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत कर दी थी। दुर्भाग्यवश, इस विचार को आधारभूत हकीकत में बदलने से पहले डॉ. भाभा का 24 जनवरी 1966 को निधन हो गया।

जेआरडी टाटा ने किया डॉ. भाभा और प्रधानमंत्री नेहरू का जिक्र

भाभा की मृत्यु के पश्चात उनको श्रद्धांजलि देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा था कि होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है। इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गांधी और तीसरे होमी भाभा थे। होमी न सिर्फ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता, उद्यानकर्मी और कलाकार भी थे। होमी अकेले ऐसे शख्स थे जिन्हें 'संपूर्ण इंसान' कहा जा सकता है।

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