Dadasaheb Phalke: पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ में दादा साहेब फाल्के ने एक बावर्ची को बना दिया था ‘तारामति’

दादा साहेब फाल्के का निधन 16 फरवरी 1944 को 73 साल की उम्र में नासिक में हुआ था। 1971 में भारत सरकार ने दादा साहेब फालके के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।

dadasaheb phalke death anniversary filmy journey of Dhundiraj Govind Phalke

Dadasaheb Phalke: धुंडिराज गोविन्द फाल्के को दादा साहब फाल्के के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 में हुआ था। जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार के अलावा वे स्वयं एक अनुभवी अभिनेता थे। साल 1913 में उन्होंने भारत की पहली फिल्म राजा हारिश्चंद्र बनायी। इसे बनाने में दादा साहब फाल्के ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था। फिल्म निर्देशक से लेकर कॉस्ट्यूम डिजाइन, लाइट और कैमरा डिपार्टमेंट भी उन्हीं ने संभाला था। फिल्म की पटकथा के लेखक भी वही थे। 3 मई 1913 को इसे कोरोनेशन सिनेमा बॉम्बे में रिलीज किया गया। इसके बाद बिजनेसमैन के साथ मिलकर दादा साहब ने फिल्म कंपनी बनाई। कंपनी का नाम था हिंदुस्तान फिल्म्स। वह देश की पहली फिल्म कंपनी थी। उन्होंने एक मॉडल स्टूडियो भी बनाया था।

ऐसे हुई फिल्म जगत में एंट्री

1910 में मुंबई के अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' दिखाई गयी थी। तभी दादा साहब फाल्के को भी फिल्म बनाने का आइडिया आया। उन्होंने तय किया कि वे भी भारतीय धार्मिक चरित्रों को रूपहले पर्दे पर जीवंत करेंगे। इसके बाद अपनी फिल्म को बनाने के लिए इंग्लैंड गए ताकि फिल्म में काम आने वाले कुछ सामान खरीद सकें। इंग्लैंड पहुंचते ही सबसे पहले दादा साहब फाल्के ने बाइस्कोप फिल्म पत्रिका की सदस्यता ली। इसके बाद तीन महीनों की इंग्लैंड यात्रा कर भारत लौट आये।

ऐसे बनी थी पहली फिल्म

शुरुआत में, दादा साहब ने अपनी फिल्म के लिए फाइनेंसर जुटाने के लिए एक शॉर्ट फिल्म 'मटर के पौधे का विकास' बनाई। इस फिल्म को बनाने का उनका मकसद सिर्फ इतना था कि वह अपनी फिल्म के लिए फाइनेंसर जुटाना चाहते थे। वह उन्हें विश्वास दिलाना चाहते थे कि वह एक फिल्म बना सकते हैं। जब यह फिल्म उन्होंने बना ली और रिलीज की तो उन्हें फाइनेंसर मिलना शुरू हो गए थे। हालांकि, तब भी पैसे पूरे नहीं हो पा रहे थे।

इसके बाद पहली फिल्म बनाने के लिए दादा साहब ने अपनी पत्नी के गहने और पूरी संपत्ति गिरवी रख दी। साथ ही अखबार में इश्तिहार दिया तो चंद आर्टिस्ट इकट्ठा हुए लेकिन हीरोइन नहीं मिली। दरअसल, कोई भी महिला फिल्म में काम करने पर राजी नहीं थी। फिर दादा साहब हीरोइन की तलाश में रेड लाइट एरिया पहुंच गए, लेकिन वैश्याओं ने भी इनकार कर दिया। चाय पीने एक ढाबे पर पहुंचे तो वहां के एक बावर्ची अन्ना सालुंके पर नजर पड़ी। अन्ना को दादा साहब ने अपनी फिल्म में हीरोइन तारामति बनाने की ठान ली। अन्ना को ढाबे में 10 रुपए मिलते थे और दादा साहब ने उन्हें 15 रुपए देकर राजी कर लिया। फालके ने घर को स्टूडियो बना लिया। लोगों को ट्रेनिंग दी और जरूरत पड़ने पर खुद साड़ी पहनकर लड़कियों की नकल भी उतारी। आखिरकार छह महीनों की कड़ी मेहनत और 15 हजार रुपये में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र का निर्माण किया गया।

बेटे की सिर की चोट को फिल्म में लिया

दादा साहब को अपनी फिल्म के लिए एक कलाकार की जरूरत थी जो हरिश्चंद्र और तारामती के बेटे रोहिताश का किरदार निभा सके। कहानी के हिसाब से रोहिताश को मरना था। उस समय कोई भी मां नहीं चाहती थी कि उसके बेटे को पर्दे पर मरता हुआ दिखाया जाए। परेशान होकर उन्हें अपने बेटे बालचंद्र फाल्के को ही रोहिताश के किरदार के लिए तैयार करना पड़ा। शूटिंग के दौरान बालचंद्र अचानक से पत्थर से फिसल कर गिर गए और उसके सिर से खून रिसने लगा। यह देख कर यूनिट के बाकी लोग घबरा गए लेकिन दादा साहब के दिमाग में अचानक से विचार आया कि क्यों न रोहिताश के मरने का सीन ऐसे ही फिल्मा लिया जाए। क्योंकि, उस दृश्य में गहरे भाव बिना किसी एक्टिंग के आ रहे थे।

दादा साहब फाल्के अवॉर्ड की शुरुआत

फिल्म निर्माण में दादा साहब के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए 1969 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा की गयी। तब से लेकर अभी तक हर साल यह अवार्ड समारोह आयोजित किया जाता है। अवार्ड पाने वाले सम्मानित व्यक्ति को एक स्वर्ण कमल, शॉल और 10 लाख रुपये की राशि दी जाती हैं। इसके साथ ही 'दादा साहेब फाल्के अकादमी' के द्वारा हर साल दादा साहेब फाल्के के नाम पर कुल तीन पुरस्कार दिए जाते हैं। जिनमें फाल्के रत्न अवार्ड, फाल्के कल्पतरु अवार्ड और दादासाहेब फाल्के अकादमी अवार्ड शामिल हैं।

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