चित्तौड़गढ़: राजस्थान BJP चीफ CP जोशी कड़े मुकाबले में फंसे, दूसरी सीटों पर प्रचार के लिए भी नहीं जा पा रहे
Chittorgarh Lok Sabha Seat: राजस्थान में लोकसभा के दूसरे चरण के दौरान शेष रही 13 सीटों पर 26 अप्रैल को मतदान होना है। इसमें एक प्रमुख सीट है- चित्तौड़गढ़। जिस पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी की इज्जत दांव पर लगी है। किसी भी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष के पास पूरे प्रदेश का जिम्मा होता है लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और चित्तौड़गढ़ के वर्तमान सांसद जोशी इस बार कड़े मुकाबले में फंस गए हैं। मुकाबला इतना नेक टू नेक है कि जोशी अपने क्षेत्र से बाहर कहीं भी चुनाव प्रचार के लिए भी नहीं जा पा रहे हैं।
पार्टी के विधायकों सहित पिछले कुछ समय से वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी जोशी के लिए भारी पड़ती नजर आ रही है। कांग्रेस ने अपने कद्दावर नेता उदयलाल आंजना को यहां से मैदान में उतारा है। वहीं दूसरी ओर भारत आदिवासी पार्टी (बाप) उम्मीदवार मांगीलाल मीणा सहित बहुजन समाज पार्टी, अम्बेडकर कांग्रेस और दो-तीन अन्य मुस्लिम प्रत्याशियों से कांग्रेस को अपने परम्परागत मतों में सेंध का खतरा है।

आठ में से 6 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा
चित्तौड़गढ़ लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा सीटें आती हैं। ये सीटें तीन जिलों में शामिल हैं। जिनमें चित्तौड़गढ़ व प्रतापगढ़ जिले की 6 सीट- कपासन, बेगूं, चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा, बड़ी सादड़ी और प्रतापगढ़, तथा उदयपुर जिले की दो सीट मावली और वल्लभनगर हैं। नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में चित्तौड़गढ़ संसदीय क्षेत्र की आठ में से 6 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। एक पर कांग्रेस व एक पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए हैं।
इसमें उदयपुर जिले की मावली विधानसभा से कांग्रेस के पुष्कर लाल डांगी, वल्लभनगर से भाजपा के उदयलाल, कपासन (एससी) से भाजपा के अर्जुनलाल जीनगर, बेगूं से भाजपा के सुरेश धाकड़, चित्तौड़गढ़ से निर्दलीय चन्द्रभान सिंह आक्या, निंबाहेड़ा से भाजपा के श्रीचंद कृपलानी, बड़ी सादड़ी से भाजपा के गौतम कुमार व प्रतापगढ़ (एसटी) से भाजपा के हेमन्त मीना विधायक हैं।
सात बार जीती भाजपा, जोशी की हैट्रिक मुश्किल में
चित्तौड़गढ़ संसदीय सीट पर आजादी के बाद हुए पहले चुनाव में यह सीट जनसंघ के खाते में गई। 1952 में उमाशंकर त्रिवेदी चुनाव जीते। लेकिन 1957, 1962, 1967 के चुनावों में यहां कांग्रेस को जीत मिली। 1957 व 1962 में माणिक्य लाल वर्मा व 1967 ओंकार लाल बोहरा जीते।
1971 में जनसंघ से विश्वनाथ झुनझुनवाला, 1977 में जनता पार्टी के श्याम सुंदर सोमानी, 1980 व 1984 में कांग्रेस की निर्मला कुमारी शक्तावत, 1989 में भाजपा के महेंद्र सिंह मेवाड़, 1991 व 1996 में भाजपा के जसवन्त सिंह, 1998 में कांग्रेस के उदय लाल आंजना, 1999 व 2004 में भाजपा के श्रीचंद कृपलानी, 2009 में कांग्रेस की गिरिजा व्यास तथा 2014 व 2019 से भाजपा के चन्द्र प्रकाश जोशी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
लगातार दो बार से सांसद बन रहे जोशी इस बार कड़े संघर्ष में फंस गए हैं। ऐसे में जोशी जीत की हैट्रिक करते हैं या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा। उल्लेखनीय है कि 2019 के चुनाव में भाजपा के जोशी को 9,82,942 तथा कांग्रेस प्रत्याशी गोपाल सिंह शेखावत को 4,06,695 वोट मिले थे।
एकजुट नहीं भाजपा कार्यकर्ता
भाजपा उम्मीदवार जोशी के साथ एक और समस्या बनी हुई है कि गत विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण में उनकी भूमिका से चित्तौड़गढ़़, बेगूं, मावली एवं वल्लभनगर के कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं। मावली से बागी लड़ने वाले कुलदीप सिंह और चित्तौडगढ़़ से लड़ने वाले चंद्रभान सिंह और उनके समर्थकों की भले ही पार्टी में वापसी हो गई है, लेकिन जोशी के समर्थक उन्हें तवज्जो नहीं दे रहे।
वहीं वल्लभनगर में पूर्व विधायक रणधीर सिंह भिंडर को पार्टी में लेने से संघ भी नाराज है। भिंडर पर वर्ष 2005 में विधायक रहते एक स्वयंसेवक की हत्या के कथित आरोप थे, तब से वह पार्टी से बाहर थे। हालांकि जोशी अपने सौम्य व्यवहार और काम के दम पर जीत के प्रति आश्वस्त है, लेकिन इस बार जीत-हार का अंतर बेहद कम रहने के आसार हैं।












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