Birsa Munda Punyatithi: बिरसा मुंडा, जिन्होंने मिशनरियों और अंग्रेजों के खिलाफ की थी निर्णायक लड़ाई
बिरसा मुंडा ने वनवासियों का आह्वान किया कि दिक्कुओं (अंग्रेजों के एजेंट एवं यूरोपीय मिशनरियों) को अपनी भूमि से बाहर निकाल दें। इसके बाद, बिरसा के अनुयायी यूरोपीय सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाने लगे।

Birsa Munda Punyatithi: धरती आबा बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड (तब बंगाल प्रेसीडेंसी) के खूंटी जिले के उलीहातू गांव में एक अत्यंत ही गरीब किसान परिवार में हुआ था। उन्हें भगवान बिरसा भी कहा जाता है। बिरसा की माता का नाम करमी हातू और पिता का नाम सुगना मुंडा था। बिरसा मुंडा के एक भाई और दो बहनें थीं। बृहस्पतिवार के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम बिरसा रखा गया था।
बचपन में ही भांप ली थी मिशनरियों की मंशा
दरअसल, बिरसा की मौसी की जब शादी हुई, तो वह बिरसा को अपने साथ अपने ससुराल ले गई। वहां पर उनकी मुलाकात एक पादरी से हुई। पादरी ने ईसाइयत को महिमामंडित करते हुए हिंदू धर्म और वनवासियों के रहन-सहन का मजाक उड़ाया। इस पर बिरसा ने गुस्से में उस पादरी को जवाब दिया कि 'कोई भी धर्म मनुष्य को नर्क की ओर नहीं धकेलता है और उसका उद्देश्य केवल ईश्वर की प्राप्ति होता है। समाज में अनेक धर्म हैं और ईश्वर प्राप्ति के अलग-अलग साधन भी। सभी अपनी-अपनी उपयोगिता एवं स्थिति के अनुसार इन साधनों का उपयोग करते हैं। ऐसे में किसी के धार्मिक कर्मकांडों को अंधविश्वास बताने वाला मनुष्य अज्ञानी ही हो सकता है'। 11 वर्षीय बिरसा के मुंह से धर्म की परिभाषा सुनकर पादरी सकते में आ गया।
मिशनरी स्कूल में की पढ़ाई
स्कूली शिक्षा के दौरान से ही बिरसा ब्रिटिश शासकों के अत्याचार को महसूस करने लगे थे। पादरियों ने 'बपतिस्मा संस्कार' कर बिरसा का धर्मांतरण कराया और इसके बाद ही उन्हें चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में प्रवेश मिला। उन्होंने साल 1886 से 1890 तक मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की।
बिरसा जिस मिशनरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, वहां पर छात्रों को ईसाई संस्कृति को आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया जाता था। वह ईसाइयत को त्याग न दें, इस डर से उन्हें वनवासी परंपराओं से दूर रखा जाता था। बिरसा ईसाइयत में दीक्षित जरूर थे, परंतु उनके हृदय में जंगल और सनातन परंपराएं बसी हुई थीं। वह ईसाइयत को अपने उपर लादे गये बोझ की तरह ढो रहे थे। स्कूल में पादरी मुंडा समुदाय व हिन्दू धर्म के विरुद्ध बोलते थे, जिसका प्रतिकार करने पर बिरसा को स्कूल से निष्कासित कर दिया गया।
चर्च के विरुद्ध वनवासियों का आन्दोलन
दरअसल, ब्रिटिश व मिशनरी दोनों एक साथ वनवासियों पर अत्याचार कर रहे थे। उनकी भूमि दिलाने के बदले मिशनरी उनसे ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करवा रहे थे। इसके बावजूद उन्हें जमीन आवंटित नहीं की जा रही थीं। चर्च की इस मंशा को वनवासी समझ चुके थे और प्रलोभनों का मोह त्याग कर उन्होंने ईसाई धर्म अपनाने से इंकार कर दिया। मुंडा सरदार ने मिशनरियों की उपेक्षा की और प्रतिकार आंदोलन आरंभ कर दिया।
हिन्दू धर्म में बिरसा की वापसी
सन 1891 में बिरसा मुंडा की भेंट आनंद पांडे नाम के एक व्यक्ति से हुई। उन्होंने वेद-पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता आदि धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। बिरसा ने आनंद को अपना गुरु बना लिया और ईसाइयत को त्याग कर पुनः हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन व्यतीत करने लगे।
समाज-सुधार के पथ पर
बिरसा गांव-गांव घूमकर वनवासियों को जागरूक करने लगे। उन्होंने वनवासियों को समझाना शुरू किया कि मिशनरी व ब्रिटिश अलग-अलग नहीं हैं और वह दोनों हमारे शत्रु हैं। बिरसा द्वारा आरंभ आंदोलन सर्वप्रथम धार्मिक था, जिसका प्रमुख उद्देश्य ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध लोगों को एकजुट करना और हिंदू धर्म की रक्षा करना था।
अंग्रेजों से बिरसा की मांग
बिरसा ने विभिन्न मांगों को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। ये मांगें इस प्रकार थीं -
● वनवासियों के आर्थिक शोषण पर रोक लगाई जाए और उनकी मेहनत के अनुसार मेहनताना दिया जाए व उन पर अत्याचार करने वालों को दंडित किया जाए।
● क्षेत्रीय वन-संपदा, भूमि, खेती, पहाड़ एवं खनिज संपदा पर जमींदारों तथा उच्चवर्गीय समुदाय का प्रभुत्व समाप्त कर उन पर वनवासियों का समान अधिकार मिले और भूमि को लगान मुक्त घोषित किया जाए।
● वनवासी महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए कानून बनाया जाए।
● वनवासी बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिले।
● मंदिर व अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने की स्वतंत्रता मिले।
● ईसाई मिशनरियों पर प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि वनवासियों के धर्मांतरण पर रोक लगे।
बिरसा को पहली बार भेजा गया जेल
बिरसा की इन मांगों और आंदोलनों से अंग्रेज परेशान हो उठे। बिरसा के नेतृत्व में जब आंदोलन फैलने लगा, तो अंग्रेजों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का फैसला किया। उन्होंने बिरसा को साल 1895 में गिरफ्तार कर लिया और दंगे-फसाद के आरोप में दो साल की सजा सुनाई।
बंगाल काश्तकारी कानून
बिरसा को कारावास की सजा हो जाने के बाद वनवासियों के विरुद्ध अनेक कानून बनाये गये, जिनमें 1897 का 'बंगाल काश्तकारी कानून' प्रमुख था। इसमें कहा गया कि आवश्यकता पड़ने पर जमींदार भूमि संबंधी स्थितियों और सेवाओं में परिवर्तन कर सकते हैं। इसमें वनवासियों के हितों की बात तो कही गई थी, लेकिन वास्तव में यह सरकार द्वारा जमींदारों को दिया गया उपहार था।
सरकार की दमनकारी नीतियों से बचने के लिए वनवासी ईसाई धर्म अपनाने लगे। इसमें नये लोगों के अतिरिक्त वे लोग भी शामिल थे, जो ईसाई धर्म छोड़कर बिरसा के अनुयायी बन गये थे। जिन वनवासियों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, सरकार ने उनका लगान माफ कर दिया था। लेकिन गैर-ईसाई व मुंडाओं के लिए यह अधिनियम अभिशाप बन गया था। इसकी आड़ में सरकार ने वनवासियों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का षड्यंत्र रचा था।
बिरसा ने फिर से की आंदोलन की शुरुआत
1897 में जेल से निकलने के बाद बिरसा गांव-गांव घूमकर अंग्रेजों के खिलाफ समर्थन जुटाने लगे। उन्होंने लोगों को उकसाने के लिए परंपरागत प्रतीकों और भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने आह्वान किया कि उनके नेतृत्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए दिक्कुओं (बाहरी लोगों खास कर यूरोपीय) को अपनी भूमि से बाहर निकाल दें। इसके बाद, बिरसा के अनुयायी यूरोपीय सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाने लगे। उन्होंने थाने और चर्चों पर हमले किए और महाजनों व जमींदारों की संपत्तियों पर धावा बोलना शुरू किया।
साल 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच छिटपुट संघर्ष होते रहे और बिरसा तथा उनके अनुयायियों ने अंग्रेजों को तोड़कर रख दिया। अगस्त 1897 में बिरसा और उनके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी के थाने पर धावा बोल दिया। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सैनिकों से हुई, जिसमें पहले तो अंग्रेज सैनिक हार गए, लेकिन बाद में उस इलाके के बहुत से वनवासी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं। तब बिरसा ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते हुए कहा कि हम कभी अंग्रेजी शासकों के आदेशों का पालन नही करेंगे।
उलगुलान आंदोलन और बिरसा का बलिदान
बिरसा ने आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया और अंग्रेजों को कर, ब्याज आदि देने से मना कर दिया। 1899 में छोटानागपुर का क्षेत्र उलगुलान की आग में दहक उठा। आंदोलन की भीषणता इतनी अधिक थी कि उलगुलान के चौथे ही दिन रांची के डिप्टी कमिश्नर ने सेना बुला ली। यही नहीं तमाम ब्रिटिश दलाल मुंडा बहुल इलाके से भागने लगे।
अंततः 9 जून 1900 में बिरसा मुंडा को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और उसी वर्ष रांची सेंट्रल जेल में सिर्फ 25 वर्ष की उम्र में उनकी रहस्यमयी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि बिरसा को अंग्रेजों ने जहर देकर मार डाला था।












Click it and Unblock the Notifications