Ambedakar on Islam: हिंदू धर्म की बुराइयों के आलोचक डॉ. अंबेडकर क्या कहते थे इस्लाम के बारे में
संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष और भारत के पहले कानूनमंत्री रहे बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की आज 132वीं जयंती है। बाबासाहब एक समाज सुधारक थे।

Ambedakar on Islam: बाबासाहब भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को ब्रिटिश इंडिया के मध्य प्रांत (मध्य प्रदेश) के महू जिले में हुआ था। उनका परिवार मराठी मूल का था जोकि रत्नागिरी जिले में अंबेडवे गांव में निवास करता था। इसी वजह से उनका नाम अंबेडकर पड़ा। यह परिवार मूलतः हिन्दू था लेकिन कबीर पंथ का अनुसरण करता था। डॉ. अंबेडकर के पूर्वज ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में काम कर चुके थे। उनके पिता रामजी सकपाल भी ब्रिटिश इंडियन आर्मी के महू कैंट में सूबेदार थे। डॉ. अंबेडकर ने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी।
भीमराव अंबेडकर ने महाराष्ट्र के सतारा जिले से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने 7 नवंबर 1900 को पहली कक्षा में दाखिला लिया था, इसलिए महाराष्ट्र में 7 नवंबर को विद्यार्थी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 1907 में उन्होंने मुंबई (बॉम्बे) के एल्फिस्टन रोड कॉलेज में एडमिशन लिया था। 1913 में वह स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढ़ाई करने अमेरिका चले गए और न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री ली। डॉ. अंबेडकर की पढ़ाई का पूरा खर्च बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर उठाया। उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी।
बौद्ध धर्म अपनाया
डॉ. अंबेडकर ने अपनी आत्मकथा 'वेटिंग फॉर अ वीजा' में छुआछूत को लेकर कहा है कि यह गुलामी से भी बदतर है। उन्हें बड़ौदा रियासत के महाराजा का सैन्य सचिव नियुक्त किया गया था, लेकिन अधीनस्थ कर्मचारियों के जातिगत भेदभाव के कारण उन्होंने यह नौकरी कुछ दिन में ही छोड़ दी थी। 1927 में डॉ. अंबेडकर ने छुआछूत के विरोध में एक व्यापक और सक्रिय आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। इस आंदोलन से वह जीवनभर जुड़े रहे और हिन्दू दलितों के सामाजिक उत्थान के लिये प्रयासरत रहे। हालांकि अपने जीवन के अंतिम सालों में उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर सार्वजनिक तौर पर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।
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इस्लाम को बताया लोकतंत्र के लिए खतरा
डॉ. अंबेडकर के हिंदू धर्म में फैली सामाजिक बुराइयों के खिलाफ विचार जगजाहिर हैं। लेकिन उन्होंने इस्लाम पर भी खुलकर टिप्पणियां की हैं। उन्होंने इस्लाम को न सिर्फ लोकतंत्र विरोधी बताया बल्कि राष्ट्रवाद के लिये खतरा तक कह दिया था। 27 सितंबर 1951 में उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया था। संसद में डॉ. अंबेडकर ने त्यागपत्र के साथ दिए भाषण में इस्लाम के बारे में ये बातें कही थीं, जो अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज में प्रकाशित हैं।
1. डॉ. अंबेडकर ने भारत में मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में कहा था कि "वे हिंदुओं के खिलाफ भारत में घृणा का राग अलापते हुए आए थे। उन्होंने न केवल भारत में नफरत फैलाई बल्कि वापस जाते हुए कई हिंदू मंदिर भी जलाए। मुस्लिम आक्रांताओं की नजर में हिंदू मंदिरों को जलाना एक नेक काम था, जिसकी वजह से भारत में इस्लाम का बीज बोया गया। बाद में यह बीज पौधा बनते-बनते एक बड़ा ओक का पेड़ बन गया।"
2. अजमेर में चढ़ाई के दौरान मोहम्मद गौरी ने मंदिरों के स्तंभ और नींव तोड़कर वहां मस्जिदें बना दीं और इस्लाम के कायदे-कानून वाले प्रतीक खड़े किये गए। कुतुबुद्दीन ऐबक ने हिंदूओं के 1000 से ज्यादा मंदिर तोड़े थे और उनकी नींव पर मस्जिदें खड़ी की थी। दिल्ली की जामा मस्जिद बनाने के दौरान उसमें हिंदु मंदिरों को तोड़कर उनके पत्थर और सोना लगाया गया और उसपर कुरान की आयतें लिखवा दी गई। दिल्ली की जामा मस्जिद में 27 मंदिरों की सामग्री होने का प्रमाण हैं।
3. डॉ. अंबेडकर ने कहा कि "मुगल बादशाह शाहजहां के शासन काल में भी कई हिंदू मंदिरों के विनाश का वर्णन मिलता है। बादशाहनामा में हिंदुओं के मंदिरों के पुननिर्माण का उल्लेख भी किया गया है। इलाहाबाद रिसायत की रिपोर्ट के मुताबिक, बनारस जिले में 76 मंदिर नष्ट करवाए गए थे। बाबासाहब ने कहा था कि मुस्लिम राजनीति कितनी विकृत है, यह भारतीय राज्यों में हुए राजनीतिक सुधारों और मुस्लिम नेताओं के तौर तरीकों से देखा जा सकता है।
4. बाबासाहब की किताब के मुताबिक, मुसलमानों की चिंता लोकतंत्र नहीं है। उनकी मुख्य परेशानी यह है कि बहुमत शासन वाला लोकतंत्र हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों के संघर्ष को किस तरह प्रभावित करता है? मुस्लिम राज्य सड़ी-गली व्यवस्था ज्यादा पसंद करेंगे बनिस्पत एक अच्छे लोकतंत्र के, क्योंकि वे हिंदुओं के मुद्दों में ही ज्यादा रूचि रखते हैं।
5. डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि मुसलमानों के उग्र व्यवहार की वजह से राजनैतिक आक्रामकता को बढ़ावा मिलता है। मुसलमानों का मानना है कि अगर कोई देश मुस्लिम शासन के अधीन नहीं है, जहां कहीं भी मुस्लिम कानून और उस सरजमीं के कानून के बीच संघर्ष हो तो मुसलमानों को जमीन या देश के कानून की खिलाफत कर अपने मजहब अर्थात मुस्लिम कानून का पालन करना चाहिए।
6. इस्लाम के बारे में बाबासाहब कहते हैं कि यह एक क्लोज कॉर्पोरेशन है और इसकी विशेषता यह है कि यह मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच वास्तविक भेद करता है। उनका मानना है कि अगर भारत के मुसलमान पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे, तो यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिए बड़ा संभावित खतरा बन जाएगा। इस्लाम का बंधुत्व मानवता का सार्वभौम बंधुत्व नहीं है। यह बंधुत्व केवल मुसलमान का मुसलमान के प्रति है।
7. बाबासाहब कहते हैं मुसलमानों में एक और उन्माद का दुर्गुण है, जो कैनन लॉ या जिहाद के नाम से प्रचलित है। एक मुस्लिम शासक के लिए जरूरी है कि जब तक पूरी दुनिया में इस्लाम की सत्ता न फैल जाए, तब तक चैन से न बैठे। इस तरह पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंटी है दार-उल- इस्लाम (इस्लाम के अधीन) और दार-उल-हर्ब (युद्ध के मुहाने पर)। भारत में मुसलमान हिजरत में रूचि लेते हैं, तो वे जिहाद का हिस्सा बनने से भी हिचकेंगे नहीं।
8. इस्लाम में तलाक के मामले में पतियों को जो मनमानी करने की छूट दी गई है, वह उस सुरक्षा के मायने को ध्वस्त कर देती है, जो एक महिला के लिए पूर्ण स्वतंत्र और खुशहाल जीवन की बुनियादी जरूरत है। पतियों को जिस तरह की मनमानी का अधिकार मुस्लिम कानून देते हैं, वह अव्यहारिक और अमानवीय कहा जाएगा।
9. बाबासाहब आंबेडकर अपनी किताब डॉ. भीमराव अंबेडकर, "द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ बुद्धिज्म" में लिखते हैं कि मुस्लिम अक्रांताओं ने बौद्ध अर्चकों व भिक्षुओं में कत्लेआम का अभियान चलाया। मुसलमानों की इस खूनी कुल्हाड़ी ने बौद्ध धर्म की जड़ पर प्रहार किया। बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करके इस्लाम ने बौद्ध धर्म को ही मार दिया। भारत में बौद्ध धर्म पर पड़ने वाली यह बहुत बड़ी आपदा थी।
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