Agni 5 MIRV: क्या है एमआईआरवी तकनीक जो बनाती है अग्नि 5 मिसाइल को घातक
Agni 5 MIRV: मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (एमआईआरवी) से लैस अग्नि-5 बैलिस्टिक मिसाइल के सफल उड़ान परीक्षण के साथ ही भारत अब अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस के साथ एलिट ग्रुप में शामिल हो गया है।
मिशन दिव्यास्त्र के तहत भारत की इस एमआईआरवी तकनीक वाली मिसाइल को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने तैयार किया है। यह प्रणाली स्वदेशी एवियोनिक्स सिस्टम और उच्च सटीकता सेंसर पैकेज से सुसज्जित है, जो यह सुनिश्चित करती है कि पुनः प्रवेश करने वाले वाहन सटीकता 666 से लक्ष्य तक पहुंचें और दुश्मन की मिसाइलों को रास्ते में ही मार गिराएं।

आखिर क्या है यह एमआईआरवी तकनीक और यह आधुनिक रक्षा शस्त्रों के लिए क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
एमआईआरवी क्या है?
एमआईआरवी तकनीक मूल रूप से 1960 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध के दौरान विकसित की गई थी। एमआईआरवी तकनीक एक एकल मिसाइल को अलग-अलग लक्ष्यों पर कई परमाणु हथियारों को ले जाने में मदद करती है, जबकि एक पारंपरिक मिसाइल केवल एक हथियार ले जा सकती हैं और उसका लक्ष्य भी एक ही होता है।
एमआईआरवी तकनीक के साथ, प्रत्येक हथियार को एक अलग री-एंट्री वाहन में ले जाया जाता है और उसे अलग अलग लक्ष्य पर हमला करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। एमआईआरवी से लैस एक मिसाइल अपने हथियार को अलग-अलग गति से और यहां तक कि अलग-अलग दिशाओं में भी छोड़ सकती है और ये अलग-अलग लक्ष्य कितनी दूर तक भी हो सकते हैं।
वाशिंगटन स्थित अनुसंधान संगठन, द सेंटर फॉर आर्म्स कंट्रोल एंड नॉन-प्रोलिफरेशन के अनुसार, कुछ एमआईआरवी-सुसज्जित मिसाइलें 1,500 किलोमीटर की दूरी तक अलग-अलग लक्ष्यों को मार सकती हैं। एमआईआरवी तकनीक का विकास और प्रयोग आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी मिसाइलों के साथ कई अन्य हथियारों के संयोजन की आवश्यकता होती है। मिसाइल दागने के दौरान क्रमिक रूप से हथियार छोड़ने के लिए सटीक मार्गदर्शन वाले एक जटिल तंत्र को संभालना होता है।
अमेरिका, एमआईआरवी तकनीक को विकसित करने वाला पहला देश था, जिसने 1971 में एमआईआरवी तकनीक से लैस पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम तैयार किया था। सोवियत संघ ने भी तुरंत इसका अनुसरण किया और 1970 के दशक के अंत तक खुद का एमआईआरवी-सक्षम इंटर कॉन्टिनेन्टल बैलेस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) और सब मैरिन लॉन्चड बैलेस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) सिस्टम विकसित कर लिया था।
अब यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस एसएलबीएम पर एमआईआरवी तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। चीन भी कुछ यही दावा करता है। कहा जाता है कि जनवरी 2017 में पाकिस्तान ने भी कथित तौर पर एमआईआरवी तकनीक आधारित एक मिसाइल का परीक्षण किया था। पर उसका यह परीक्षण बुरी तरह फेल हुआ था।
एमआईआरवी तकनीक वाली अग्नि श्रेणी की मिसाइलों की खूबियाँ
अमेरिकन सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्टों के अनुसार, अग्नि-5 प्रणाली की एमआईआरवी तकनीक से लैस मिसाइल से भारत कई लक्ष्यों पर हमला करने की नई क्षमता प्राप्त कर चुका है। मिशन दिव्यास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण परिणाम है।
भारत की तरफ आने वाली बैलिस्टिक मिसाइल या वारहेड को अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही एमआईआरवी तकनीक वाली मिसाइल नष्ट कर सकती है। पारंपरिक मिसाइलों के विपरीत एमआईआरवी तकनीक की मिसाइल से बचाव करना कहीं अधिक कठिन है। एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, एमआईआरवी तकनीक से युक्त अग्नि-5 मिसाइल के हथियार मूल वाहनों और कई डिकॉय के साथ अपने इच्छित लक्ष्य तक आसानी से पहुंच सकते हैं।
प्रतिद्वंद्वी के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस (बीएमडी) को भी यह भेद सकती है। यह देखते हुए कि चीन के पास बीएमडी क्षमताएं हैं, एमआईआरवी अग्नि-5 के जरिए भारत चीन से बढ़त हासिल कर सकता है। इसके साथ ही अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक भेदने की संभावनाओं को बढा सकता है। देश के परमाणु हथियार कार्यक्रम में यह एक बड़ी तकनीकी सफलता हाथ लगी है।
डीआरडीओ का कहना है कि विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों ने कई पुन: प्रवेश वाहनों को ट्रैक किया और यह सभी मानदंडों पर खड़ा उतरा। यह क्षमता भारत की बढ़ती तकनीकी शक्ति का प्रतीक है। उल्लेखनीय है कि 5000 किलोमीटर से अधिक की रेंज वाली भारत की सबसे लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-V का पहला परीक्षण अप्रैल 2012 में किया गया था और तब से इसका कई बार परीक्षण किया जा चुका है। यह मिसाइल चीन के अधिकांश हिस्सों तक पहुंच सकती है।
रक्षा वैज्ञानिकों के अनुसार भारत ने एमआईआरवी क्षमता की घोषणा प्रतिद्वंद्वी चीन द्वारा इसी तरह से अपनी परमाणु ताकतों का विस्तार करने के बाद की है। अमेरिकी रक्षा विभाग की 2023 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि चीन नए आईसीबीएम विकसित कर रहा है जो उसके परमाणु-सक्षम मिसाइल सिस्टम में काफी मजबूती प्रदान करेगा और चीन की परमाणु हथियार उत्पादन क्षमता में वृद्धि को बढ़ावा भी मिलेगा। उसके मुकाबले के लिए भारत भी अब तैयार हो रहा है।
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