Match Fixing Review: नाम के बिल्कुल उलट है फिल्म, अगर नही बनती तो भी सिनेमा जगत में कुछ नुकसान ना होता

फिल्म- मैच फिक्सिंग- द नेशन एट स्टेक
निर्देशक- केदार गायकवाड
कास्ट - विनीत कुमार सिंह, अनुजा साठे, मनोज जोशी, राज अर्जुन, शताफ फिगर, ललित परीमू, किशोर कदम
रेटिंग- 1 स्टार्स

Match Fixing: The Nation At Stake movie review: पढ़ने से पहले ही आपको बता दूं ये रिव्यू रैंट (रोना) हो सकता है। मैच फिक्सिंग.... इस नाम की एक फिल्म आई है। इसके बारे में आम दर्शक बहुत कम जानता है। वजह है इसका ढीला प्रमोशन और मार्केटिंग। फिल्म में बड़ा स्टार भी नहीं है। हालांकि इस फिल्म के नाम को पढ़कर ऐसा लगता है कि ये क्रिकेट मैच की फिक्सिंग है। लेकिन असल में मामला बहुत उलट है। जो फिल्म देखने में पता चलाता है।

Match Fixing The Nation At Stake movie review

मैच फिक्सिंग की कहानी मालेगांव ब्लास्ट और मुंबई हमले के ईर्द गिर्द घूमती है। जिसमें कर्नल पुरोहित केंद्र में हैं। फिल्म की पूरी कहानी में ये बताने की कोशिश है कि मुंबई में हुए 26/11 हमला सबसे बड़ा है। मेकर्स का दावा है कि ये फिल्म कर्नल कन्वर ख़ताना की किताब "द गेम बिहाइंड सैफरन टेरर" से प्रेरित है। लेकिन मेकर्स ने फिल्म की शुरूआत में एक डिस्क्लेमर दिया है। जहां बताया है कि ये फिल्म काल्पनिक है। माने की फिल्म में जो दिखाया गया है वो सब एक झूठ है। बस दर्शकों के लिए कह दिया गया है। जिससे फिल्म देखने वाले दर्शक के 2 घंटे 30 मिनट बेकार हो जाते हैं। पैसा जो बर्बाद हुआ वो अलग। इसे जिन केदार गायकवाड़ ने बनाया है वो पहले सिनेमैटोग्राफर थे।

पूरी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी विनीत सिंह है। जो फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं। विनीत एक ऐसे अभिनेता हैं, जो अच्छी एक्टिंग करते हैं। लेकिन वो फिल्म इतनी बेकार होती है कि उनकी पूरी मेहनत जाया हो जाती है। ये उनकी किस्मत ही समझ लीजिए। एक अच्छे एक्टर होने के बावजूद वो एक हिट की तलाश में लगे पड़े हैं। मैच फिक्सिंग में भी यही होता है, वो खूब अच्छा अभिनय करते हैं। पर पूरी मेहनत बेकार दिखती है। अगर आप गलती से ये फिल्म देखने थिएटर में पहुंच जाते हैं तो सिर्फ विनीत को देख कर सुख पा सकते हैं।

मैच फिक्सिंग क्यों बनाई गई, इसका सवाल मेकर्स ही दे सकते हैं। फिल्म को एक किताब से प्रेरित बताया जाता है लेकिन डिस्क्लेमर आता है। फिल्म देखने के बाद ये जरूर कहा जा सकता है कि ये फिल्म अगर ना भी बनती तो इससे भारतीय सिनेमा का कोई नुकसान नहीं होना था। मेरी बात यहीं तक।

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