Kapkapiii Movie Review: तुषार कपूर का अच्छा कमबैक, फिल्म में हॉरर के साथ लगा कॉमेडी का तड़का
मूवी रिव्यू: Kapkapiii
डायरेक्टर: संगीथ सिवन
कास्ट: तुषार कपूर, श्रेयस तलपड़े, सिद्धि इदनानी, जय ठक्कर
रेटिंग - 3 स्टार्स
Kapkapiii Movie Review: हममें से हर किसी के एक ऐसे दोस्तों का ग्रुप होता है। जिनके पास न तो पैसे होते हैं, न कोई प्लान, फिर भी हर दिन कोई न कोई ड्रामा चलता रहता है। 'कपकपी' ठीक वैसी ही फिल्म है, बस इसमें एक भूतनी 'अनामिका', कैरम बोर्ड से बनी ऊइजा बोर्ड और ढेर सारी चीख-चिल्लाहट का तगड़ा भूतिया हंगामा भी है। ये फिल्म आपको डराती भी है, हंसाती भी है और साथ ही आपकी टाइट बजट वाली लेट ट्वेंटीज़ की यादों को भी ताजा कर देती है।

फिल्म की कहानी छह बेरोजगार, बिना मकसद और बेतरतीब दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक किराए के घर में साथ रहते हैं। मनु (श्रेयस तलपड़े) खुद को नेता समझता है, लेकिन उसका कोई कंट्रोल नहीं है। नान्कू चाय बेचता है, लेकिन उसकी बातें किसी दार्शनिक की तरह लगती हैं। निरूप के पास बी.टेक है लेकिन नौकरी नहीं है। रिविन ही एक ऐसा दोस्त है जो सैलरी लेता है और जिसकी एक गर्लफ्रेंड भी है (कम से कम ऐसा कहा जाता है)। और ये सभी छह प्यारे फ्रीलोडर्स बस वक्त गुजारते रहते हैं। छहों दोस्त अलग-अलग तरीके से बोर होकर लड़कियों की तलाश या ध्यान पाने की कोशिश में लगे रहते हैं। एक दिन मनु को ऊइजा बोर्ड मिलता है क्योंकि उसे इनडोर गेम्स पसंद हैं। फिर सब मिलकर भूत को बुलाने का फैसला करते हैं।
मनु अपनी जुगाड़ू दिमाग लगाता है और कैरम बोर्ड को ही ऊइजा बोर्ड बना देता है। सब दोस्त शुरुआत में इसे मज़ाक ही समझते हैं, मनगढ़ंत भूत 'अनामिका', नकली सवाल-जवाब और जमकर हंसी-ठिठोली। लेकिन मस्ती-मस्ती में खेल अचानक असली हो जाता है। ग्लास अपने आप सरकने लगता है, और वो बातें बाहर आने लगती हैं जो किसी ने कभी किसी से नहीं कहीं थीं। देखते ही देखते उनका घर भूतों से मिलने-जुलने और अपने भूत-भविष्य के राज़ जानने की जगह बन जाता है।
तभी एंट्री होती है तुषार कपूर की, कबीर के रोल में - जो मनु का दोस्त है और कुछ दिन के लिए रहने की जगह ढूंढ रहा होता है। लेकिन जैसे ही वो इस घर में कदम रखता है, उसे समझ आता है कि वो किसी घर नहीं, पागल भूतों के सर्कस में आ गया है। तुषार का भूत अनामिका को लेकर जो रिएक्शन है, वो सुनकर हंसी छूटना तय है। जब भी तुषार स्क्रीन पर आते हैं, कुछ न कुछ उल्टा-पुल्टा ज़रूर होता है और वही तो मज़ा है!
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है इसका क्रेज़ी ईको-सिस्टम और अतरंगी कैरेक्टर्स। ये वो हॉरर-कॉमेडी नहीं है जिसमें कोई घिसा-पिटा भूत अंधेरे कॉरिडोर में रोता है। यहां डर भी मजाकिया है, और हंसी ऐसी कि रुकने का नाम नहीं लेती। पूरी कास्ट ने शूटिंग का जमकर मज़ा लिया है और वो देखने से ही समझ में आ जाता है, क्योंकि ऑडियंस को भी उतना ही मज़ा आता है। और एंडिंग... भाई, जो सोचा नहीं था, वही हो जाता है!
ऊपर फ्लोर की लड़कियां सिद्धि इडनानी और सोनिया राठी यानी नीचे के लड़कों की टपोरी और बेमतलब एनर्जी के सामने एक ताज़ा और मजेदार कंट्रास्ट देती हैं। लेकिन अच्छी बात ये है कि उन्हें सिर्फ "हीरो की लव इंटरेस्ट" बनाकर छोड़ नहीं दिया गया है। उनका भी अपना पागलपन, टशन और कॉमिक टाइमिंग है जो स्क्रीन पर खूब जंचता है। खासकर सिद्धि इडनानी, जो पहले द केरला स्टोरीnजैसी गंभीर और इमोशनल फिल्म में दिख चुकी हैं, यहां एकदम उल्टे जोन में कॉमिक रोल करते हुए भी अपने एक्टिंग टैलेंट से चौंका देती हैं।
'क्या कूल हैं हम' और 'यमला पगला दीवाना 2' जैसी मस्तमौला कॉमिक फिल्मों के लिए जाने जाने वाले डायरेक्टर संगीथ सिवन इस बार भी अपनी आखिरी फिल्म में वही मजेदार एनर्जी लेकर आए हैं। अफसोस की बात है कि ये उनकी आखिरी फिल्म है, लेकिन उन्होंने जाते-जाते भी ऐसा धमाल किया है कि हर सीन में उनकी छाप दिखती है। ये वो फिल्म नहीं है जिसे लॉजिक ढूंढने बैठें, बल्कि ये वो फिल्म है जिसमें दोस्त चीख-चीख के भागते हैं, कोई अचानक डराता है, और एक बंदा हमेशा कहता है, "छोड़ ना यार, कुछ नहीं होता", और उसी वक्त लाइट चली जाती है।
तुषार कपूर और श्रेयस तलपड़े, जो अपनी ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और गोलमाल सीरीज़ में साथ की केमिस्ट्री के लिए जाने जाते हैं, यहां भी पूरी महफिल लूट लेते हैं। दोनों की स्क्रीन प्रेजेंस ही काफी है आपके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए।
कुमार प्रियदर्शी और सौरभ आनंद के डायलॉग्स वहीं चुभते हैं जहां चुभना चाहिए, खासकर तब जब आम ज़िंदगी की बोरिंग-सी सिचुएशनों से ह्यूमर निकाला जाता है। हॉरर भी ऐसा है कि हल्का-सा झटका लगे, लेकिन ऐसा नहीं कि डर के मारे नींद उड़ जाए। यहां डर नहीं, हंसी बेचने आई है फिल्म।
और हां, जोक्स वाकई में हिट हैं। वो वाले नहीं कि बैकग्राउंड में हंसी बजानी पड़े, बल्कि वो वाले जहां आप खुद हंसते-हंसते एक लाइन फिर से सुनना चाहें, क्योंकि पहली बार में तो छूट गई हँसी में। जो मज़ा है, वो किरदारों की रियलनेस में है, हम सबकी लाइफ में एक ननकू होता है, और एक विजय लाल्या जैसा भी जो किसी अजीब से बिज़नेस में फेल होकर भी चुप नहीं रहता।
कपकपी का मकसद न तो कोई बड़ी सीख देना है, न ही अवॉर्ड जीतना इसका बस एक ही एजेंडा है, आपको हंसाते-हंसाते डरा देना। इसमें ये फिल्म पूरी तरह से पास हो जाती है। ये फिल्म पागलपंती, भूतिया माहौल और ठहाकों का ऐसा कॉम्बो है, जिसे दोस्तों के साथ देखकर, चिप्स खाते हुए, आप हफ्तों तक याद करेंगे और उसकी लाइनें दोहराते रहेंगे।












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