Inspector Zende Review: मनोज बाजपेयी की मजेदार 'कॉप ड्रामा', जानिए क्यों देखने चाहिए फिल्म
Inspector Zende Review: इंस्पेक्टर झेंडे जब ये फिल्म बन रही थी, तब समझ नहीं आया किस पर क्या बन रहा है। लेकिन बाद में पता चला ये कि फिल्म एक ट्रिब्यूट है। सच्चे हीरो को, जिसका किरदार मनोज बाजपेयी निभा रहे हैं। तो इस्पेक्टर झेंडे के ऊपर बनी फिल्म कैसी है? हम आपको इस रिव्यू में बताते हैं।

इंस्पेक्टर झेंडे का पूरा नाम मधुकर बापुराव झेंडे है। फिल्म उन्हीं की कहानी और उनके जीवन के एक महत्वपूर्ण केस से इंस्पायर है। फिल्म की कहानी 1986 की मुंबई में सेट है। जिसमें इंस्पेक्टर झेंडे एक खतरनाक अपराधी को पकड़ने की कोशिश करते हैं। लोग उसे स्विमसूट किलर कहते थे यानी कार्ल भोजराज के नाम से जानते थे। होता कुछ ऐसा है कि कार्ल जेल से भाग जाता है। तब इसको पकड़ने की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर झेंडे को मिलती है। जिसे वो अपने कुछ साथियों के साथ अंजाम देने की कोशिश करते हैं। लेकिन ये पकड़म-पकड़ाई कहानी में थ्रिल भर देती है। जिसमें हंसी और मजाक है।
फिल्म में मनोज बाजपेयी का काम बहुत सधा और सटीक है। इस फिल्म में उनकी रॉ कॉमिक टाइमिंग सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है। जो फिल्म को और इंट्रेस्टिंग बनाती है। कार्ल भोजराज बने जिम सर्भ का काम भी देखने लायक है। उन्होंने स्मार्ट और खतरनाक अपराधी दोनों का ही किरदार अच्छा निभाया है। उनकी एक्टिंग में एक क्लास है, जो फिल्म में दिखता है। गिरिजा ओक एक मराठी एक्टर हैं, उन्होंने फिल्म में अपनी प्रजेंस दिखाई है। किरदार को भी अच्छे निभाया है।फिल्म के डायरेक्टर डी मांडलेकर ने इसे बड़े अच्छे से बनाया है। फिल्म में थ्रिल के साथ हंसी मजाक को भी संतुलित रखा है। फिल्म सच्ची घटना से प्रेरित है, गोवा और मुंबई में सेट है। ऐसे में उन्होंने दोनों ही लैंग्वेज और वहां के लहजे को अच्छे दिखाया था। चिन्मय ने पुलिसवालों को एकदम माचोमैन नहीं दिखाया है। बल्कि देसी और आम रखा है। फिल्म में बहुत कुछ ऐसा है, जो देखने लायक है। इसमें जो कुछ भी है, वो सब स्टाइलिश तरीके के है।
इस हफ्ते अगर आप कुछ लाइट, थ्रिल और अलग देखना चाहते हैं, तो फिर आप इसे देख सकते हैं। इस फिल्म को हमारी तरफ से 3.5 स्टार्स












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