Durg : गौठान की बाड़ीयों में आलू की खेती, पाटन में किया जा रहा प्रयोग, महिलाओं को दिया गया प्रशिक्षण
प्रदेश में गौठान की बाड़ियों में अब नई तरह की सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसके तहत पाटन के जमराव में सामूहिक बाड़ी में आलू की खेती की जा रही है। कृषि विभाग ने इसके लिए महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी है।

छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में आलू की खेती की जा रही है। इसके लिए उद्यानिकी विभाग के सहयोग से गौठानो की सामूहिक बाड़ियों में इसका उत्पादन शुरू किया जा रहा है। सामूहिक बाड़ियों में महिला समुहें आलू खेती कर रहीं हैं। पाटन के जमराव में यह प्रयास किया जा रहा है। जिससे अन्य किसान भी आलू की पैदावार के लिए प्रेरित होंगे वहीं महियाएँ भी सक्षम बनेगीं। इस खेती के लिए जिला पंचायत, उद्यानिकी विभाग द्वारा ट्रेनिंग दी गई।

सामुदायिक बाड़ियों से समुहे बन रही आत्मनिर्भर
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर सामूहिक बाड़ियों में सब्जी उत्पादन कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया आज रहा है। पाटन क्षेत्र के सामुदायिक बाड़ी जमराव में अब आलू लगाए जा रहे हैं। प्रदेश में यह प्रयोग पहली बार हुआ कि सामुदायिक बाड़ी में आलू की फसल लगाई गई। इन सामूहिक बाड़ियों में कई तरह की पौष्टिक सब्जियां लगाई गई हैं। जिससे महिला समुहे आर्थिक रूप से सक्षम बन रहीं हैं।

30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होगा उत्पादन
इस संबंध में जानकारी देते हुए उप संचालक उद्यानिकी पूजा साहू ने बताया कि कलेक्टर पुष्पेंद्र कुमार मीणा के निर्देशानुसार और जिला पंचायत सीईओ अश्विनी देवांगन के मार्गदर्शन में सभी बाड़ियों के लिए प्लान बनाया गया है। इनमें जमीन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग तरह की सब्जी चुनी गई है। जमराव, केसरा और करेला के लिए हमने आलू चुना है और इसकी खेती आरंभ कर दी गई है। इसका उत्पादन 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है। इसका उत्पादन पांच से छह गुना होता है इसलिए लाभ की अच्छी गुंजाइश होती है।
महिलाओं को दी गई तकनीकी की जानकारी
उन्होंने बताया कि इसके अलावा घरेलू उपयोग के लिए भी यह काम आयेगा। घर की बाड़ी में दूसरी सब्जी हो जाती है लेकिन आलू अभी भी खरीदना होता है तो इसका खर्च बच जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए यह अच्छा सीजन है। तापमान भी अनुकूल है। इस संबंध में सारी तकनीकी जानकारी दे दी गई है। आलू का उत्पादन करने के इच्छुक किसानों को भी इसके बारे में बताया गया है।
मैदानी इलाकों में कम होती है खेती
यहां काम देख रहे उद्यानिकी परिक्षेत्र अधिकारी बीआर गुलेरी ने बताया कि पांच सौ बरस पहले पोलैंड से आलू भारत पहुंचा और अब बिना आलू की सब्जी की कल्पना कठिन है। लेकिन मैदानी इलाकों में इसकी खेती कम की जाती है। लेकिन अब स्व सहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से बाड़ियों में आलू लगाया जा रहा है। इसके नतीजे आने से अन्य किसान भी उत्साहित होंगे। इस संबंध में नव ज्योदि समूह की अध्यक्ष और इस कार्य में लगी दीपा साहू ने बताया कि नया काम करना अच्छा लगता है। इस बार आलू लगा रहे हैं। आलू का मार्केट कभी कम नहीं होता। उन्होंने कहा कि इसके खेती के लिए हमे तकनीक बताई गई है।












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