डॉ. कर्ण सिंह जब इंदिरा का साथ छोड़ना चाहते थे!
नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह उन नेताओं में से हैं, जो प्रायः किसी विवाद में नहीं पड़ते। मगर करीब पांच दशक पहले जून, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाने का फैसला लिया था, तब वह इसके विरोध में मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना चाहते थे! डॉ. कर्ण सिंह उस समय इंदिरा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। हालांकि उन्होंने इस्तीफा देने का इरादा त्याग दिया था।

1970 के दशक पर केंद्रित एक नई किताब में इसका खुलासा किया गया है। प्रतिष्ठित राजकमल प्रकाशन समूह के सार्थक प्रकाशन से आ रही यह किताब है, 'दस सालः जिनसे देश की सियासत बदल गई।' वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर की यह नई किताब उतार-चढ़ाव से भरे सत्तर के दशक पर केंद्रित है, जिसमें उन्होंने उस दौर के राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों की गहराई से पड़ताल की है। ऐसे समय जब देश ने हाल ही में अपना 76 वां स्वतंत्रता दिवस मनाया है, सत्तर के दशक की राजनीति के बारे में जानना वाकई दिलचस्प है, जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया था। इंदिरा गांधी 1971 में गरीबी हटाओ के नारे के साथ भारी बहुमत से सत्ता में लौटी थीं। मगर कुछ वर्षों के भीतर ही महंगाई से उपजे छात्र आंदोलन ने उनके लिए चुनौती पेश कर दी। यह किताब बताती है कि कैसे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन विपक्ष के आंदोलन में बदल गया।
दरअसल 25 जून, 1975 को जेपी ने राजधानी दिल्ली में उस ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया था, जिसके बाद देर रात इंदिरा सरकार ने आपातकाल लगाने का फैसला किया। बहुत ही रोचक ढंग से लिखी गई इस किताब में उस समय के घटनाक्रम को दर्ज किया गया है। जम्मू-कश्मीर रियासत के पूर्व वारिस और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. कर्ण सिंह के हवाले से दिए गए ब्योरे बताते हैं कि राजनीतिक घटनाक्रम किस तेजी से घट रहे थे।

आपातकाल लगाए जाने के समय डॉ. कर्ण सिंह इंदिरा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। सुदीप ठाकुर ने अपनी किताब दस साल में आपातकाल की पड़ताल करते हुए कर्ण सिंह के हवाले से लिखा है कि 26 जून, 1975 को सुबह हुई कैबिनेट की बैठक से पहले कैसे कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था। किताब बताती है कि बैठक खत्म होने के बाद कर्ण सिंह एक अन्य मंत्री के साथ लांग ड्राइव पर चले गए थे। ये दोनों काफी असमंजस में थे। उसी दौरान उन्हें लगा कि उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए। किताब में कर्ण सिंह को इसके बाद यह कहते हुए दर्ज किया गया है,'... हमने कहा कि इस समय इंदिरा जी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।'
वास्तव में डॉ. कर्ण सिंह इंदिरा के विश्वसनीय मंत्रियों में से एक थे। आपातकाल लगाए जाने से कुछ वर्ष पहले जब इंदिरा गांधी ने राजा-महाराजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को खत्म करने का फैसला किया था, तब भी कर्ण सिंह इंदिरा सरकार में मंत्री थे और उन पर मंत्रिमंडल से हटने का दबाव बना था। लेकिन तब उन्होंने न केवल मंत्रिमंडल में बने रहने का फैसला किया था, बल्कि प्रिवी पर्स को हटाने के फैसले का जोरदार तरीके से समर्थन भी किया था। किताब में उन्होंने यह भी खुलासा किया कि कैसे उसके बाद 1971 के चुनाव में उन्हें हराने के लिए राजा-महाराजाओं ने उनके प्रतिदंव्द्वी को पैसे से मदद की थी। इसके बावजूद वह 1971 का चुनाव जीत गए। दिलचस्प यह भी है कि 1977 में इंदिरा विरोधी लहर में भी वह चुनाव जीतने में सफल हुए थे।












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