JNU कैंपस में फिर गरमाया माहौल, UGC के नए नियमों पर SC की रोक के बाद लगे ब्राह्मण विरोधी नारे-फूंके गए पुतले
JNU Protest: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) एक बार फिर वैचारिक जंग का अखाड़ा बन गई है। इस बार विवाद की जड़ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियम पर आया सर्वोच्य न्यायालय का फैसला है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने और साल 2012 के पुराने नियमों को ही प्रभावी रखने के आदेश ने छात्रों के एक गुट को आक्रोशित कर दिया है।
देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहा था। 29 जनुअरी को अदालत ने तर्क दिया कि नए नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे इसके दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। इस फैसले के विरोध में JNU के साबरमती हॉस्टल के बाहर छात्रों ने जोरदार प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई में बाधा बताते हुए नारेबाजी की और ब्राह्मणवाद के प्रतीक स्वरूप पुतले का दहन भी किया। रात भर चली इस हलचल ने कैंपस के भीतर जातिगत भेदभाव और समानता के अधिकारों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
सुप्रीम कोर्ट का UGC के नए नियमों में हस्तक्षेप, क्यों लगाई गई रोक?
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल पुराने (2012 के) नियम ही लागू रहेंगे। अदालत की मुख्य चिंता नियमों की अस्पष्ट भाषा को लेकर है। पीठ का मानना है कि यदि शब्दावली साफ नहीं होगी, तो इन नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है। इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है, तब तक यूनिवर्सिटी कैंपस में कोई भी नया बदलाव लागू नहीं किया जा सकेगा।
JNU के साबरमती हॉस्टल में SC के फैसले का विरोध
कोर्ट के आदेश के आते ही JNU के करीब 50 छात्रों की टोली साबरमती हॉस्टल के बाहर जमा हो गई। हाथों में बैनर और जुबान पर तीखे नारों के साथ छात्रों ने अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने एक पुतले को आग के हवाले किया, जिसे उन्होंने 'ब्राह्मणवाद' का प्रतीक बताया। हालांकि कैंपस में अक्सर होने वाले वैचारिक टकराव के उलट, इस बार ABVP या किसी अन्य छात्र संगठन की ओर से कोई जवाबी विरोध देखने को नहीं मिला और प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हुआ।
छात्र संगठनों का तर्क, भेदभाव के खिलाफ जंग या दुरुपयोग का डर?
प्रदर्शनकारी छात्रों का सीधा आरोप है कि नए नियमों पर रोक लगाकर जातिगत भेदभाव के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। अपने भाषणों में छात्रों ने मंडल आयोग और SC-ST एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि ये नियम कैंपस में दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के छात्रों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य थे।
दूसरी ओर, जनरल कैटेगरी के छात्रों और विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि यूजीसी के इन नए नियमों की आड़ में किसी को भी बिना ठोस आधार के निशाना बनाया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी 'दुरुपयोग की आशंका' को समझते हुए नियमों को दोबारा परिभाषित करने की बात कही है।
क्या थे UGC के नए नियम?
UGC ने इन नियमों को कैंपस में 'इक्विटी कमेटी' बनाने के उद्देश्य से पेश किया था। इसका मुख्य कार्य जाति, जेंडर (लिंग) और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव की जांच करना और उसे रोकना था। पिछले कुछ वर्षों में देश की विभिन्न यूनिवर्सिटीज में भेदभाव के गंभीर मामले सामने आने के बाद इन सुधारों की रूपरेखा तैयार की गई थी। फिलहाल, 19 मार्च तक कैंपस में पुराने नियमों के तहत ही व्यवस्था चलती रहेगी।
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