दिल्ली दंगा केस: आखिर किसी को कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है? Delhi HC ने उठाया सुनवाई की रफ्तार पर सवाल
Delhi Riots Case: क्या न्याय में देरी, वास्तव में न्याय से इनकार है? दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही 2020 दिल्ली दंगों से जुड़ी एक अहम सुनवाई के दौरान यह सवाल एक बार फिर केंद्र में आ गया है। अदालत ने बेहद गंभीर लहजे में पूछा है - "किसी व्यक्ति को कितने वर्षों तक विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में रखा जा सकता है, जब मुकदमे की कार्यवाही ही सालों तक लटकी रहे?"
यह सवाल अदालत ने तसलीम अहमद की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पूछा, जो कि 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों से जुड़ी कथित 'बड़ी साजिश' के आरोप में पिछले पांच सालों से जेल में बंद हैं। अहमद पर कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम - UAPA के तहत मामला दर्ज है, जिसे देश का एक सबसे कड़ा कानून माना जाता है।

दिल्ली दंगे के पांच साल, अभी तक चार्ज फ्रेमिंग: दिल्ली हाई कोर्ट
मंगलवार, 8 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर शामिल थे, ने यह सवाल दिल्ली पुलिस से पूछा कि, "पांच साल बीत चुके हैं। चार्ज पर बहस तक पूरी नहीं हुई। ऐसे मामलों में 700 गवाह हैं। तो किसी व्यक्ति को कितने साल तक जेल में रखा जाएगा?"
आरोपी के वकील ने कोर्ट में मुकदमे में देरी का मुद्दा उठाया है। तसलीम अहमद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा ने कहा कि वह मुकदमे की मेरिट पर कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन मुकदमे में हो रही देरी और समानता के आधार पर राहत की मांग करेंगे। उन्होंने अदालत को बताया कि अहमद की गिरफ्तारी 24 जून 2020 को हुई थी, और अब तक वह पांच साल जेल में बिता चुके हैं।
अधिवक्ता प्राचा ने कहा कि उनके मुवक्किल ने कभी भी मुकदमे की प्रक्रिया में देरी नहीं की और पहले से ही काफी समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में हैं। उन्होंने साथ ही अदालत को याद दिलाया कि देवांगना कलीता, आसिफ इकबाल तन्हा, और नताशा नरवाल जैसे सह-आरोपियों को भी 2021 में मुकदमे में देरी के आधार पर जमानत दी जा चुकी है।
सरकारी वकील ने कहा - देरी के लिए अभियोजन पक्ष जिम्मेदार नहीं
इस पर विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने जमानत याचिका का विरोध किया और कहा कि मुकदमे में हो रही देरी के लिए अभियोजन पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि कई बार सुनवाई की तारीखें आरोपियों की ओर से टाली गईं, जिसके कारण कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी।
हालांकि, प्राचा ने अपनी दलील मुकदमे में हो रही देरी तक सीमित रखते हुए कहा कि यह संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है कि किसी नागरिक को इतने वर्षों तक बिना सजा के जेल में बंद रखा जाए।
9 जुलाई को फिर होगी सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला नहीं सुनाया है और अब 9 जुलाई को अगली सुनवाई निर्धारित की गई है। अदालत ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि वह मामले में हो रही देरी को गंभीरता से देख रही है और यह तय करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को कब तक विचाराधीन बंदी बनाकर जेल में रखा जा सकता है।
फरवरी 2020 के दंगा क्या है पूरा मामला?
फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध और समर्थन को लेकर भड़की हिंसा ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली को झकझोर दिया था। इस हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में "बड़ी साज़िश" का आरोप लगाते हुए कई कार्यकर्ताओं, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया था। इन्हीं में से एक आरोपी तसलीम अहमद, एक कोचिंग सेंटर के संचालक है, जिन्हें दिल्ली दंगों की साजिश रचने का हिस्सा बताया गया है।
इस मामले ने एक बार फिर न्याय प्रणाली में तेजी लाने और विचाराधीन कैदियों के अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। जब कोई व्यक्ति वर्षों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रहता है, तो क्या उसे निर्दोष माना जाता है? और अगर हां, तो फिर उसकी सालों की कैद का हिसाब कौन देगा? अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय हो सकता है कि तसलीम अहमद को न्याय मिलेगा या उन्हें अभी और इंतजार करना होगा।












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